ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।केंद्रीय कैबिनेट ने ₹23,731 करोड़ की गोबरधन योजना को मंज़ूरी दे दी है। ख़बर सीबीजी यानी कंप्रेस्ड बायोगैस की है, लेकिन गांव के लिए असली बात दूसरी है — अब गोबर और पराली का एक दाम तय है, और वह दाम दस साल के लिए तय है।
दरअसल बायोगैस की योजनाएं पहले भी आई हैं। दिक़्क़त हर बार एक ही रही — प्लांट तो सब्सिडी से बन गया, पर गैस कौन ख़रीदेगा और किस भाव पर, यह किसी को पक्का पता नहीं था। इस बार सरकार ने दोनों बातें लिख दी हैं। सीबीजी का दाम ₹2,110 प्रति एमएमबीटीयू तय किया गया है और यह ढांचा कम से कम दस साल चलेगा। दूसरा, सिटी गैस कंपनियों के लिए इसे मिलाना ज़रूरी कर दिया गया है — 2026-27 में 3 फ़ीसदी, 2027-28 में 4 फ़ीसदी और 2028-29 से 5 फ़ीसदी, सीएनजी और घरों में आने वाली पाइप वाली गैस, दोनों में। यानी ख़रीदार भी तय, भाव भी तय। सीधी बात यह है कि गोबर और फ़सल के अवशेष अब कूड़ा नहीं, माल हैं।
कूड़े से कमाई: गोबर, पराली, प्रेस मड और गीला कचरा — जिस चीज़ को अब तक ठिकाने लगाना पड़ता था, पास का प्लांट अब उसे तय भाव पर ख़रीदेगा।
पराली इसलिए जलती है कि उसकी कोई क़ीमत नहीं और अगली बुआई का वक़्त सिर पर है। ख़रीदार पास में हो, तो जल्दबाज़ी अपने आप ख़त्म हो जाती है।
एक नज़र में
• योजना: गोबरधन — कंप्रेस्ड बायोगैस के लिए राष्ट्रीय एकीकृत योजना, कैबिनेट से मंज़ूर
• रक़म: ₹23,731 करोड़, वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36 तक
• दाम: ₹2,110 प्रति एमएमबीटीयू, कम से कम दस साल का ढांचा
• मिलाना ज़रूरी: 2026-27 में 3%, 2027-28 में 4%, 2028-29 से 5% — सीएनजी और घरेलू पाइप गैस में
• पूंजी मदद: नए प्लांट पर क्षमता के हिसाब से प्रति टन प्रतिदिन ₹2 करोड़ तक
• छोटे उद्यमी: एमएसएमई प्रोजेक्ट के लिए अलग क्रेडिट गारंटी की व्यवस्था
• लक्ष्य: देश में सीबीजी उत्पादन क़रीब दस गुना; लगभग 1.5 लाख नौकरियां
• कच्चा माल: गोबर, फ़सल अवशेष, प्रेस मड, शहरों का गीला कचरा और दूसरा बायोमास
अब सवाल यह कि इसका आप पर क्या असर पड़ेगा। जिस किसान के पास दो-चार जानवर हैं, उसके लिए गोबर अब तक या तो उपले थे या खेत की खाद। पास में प्लांट लगने पर वही गोबर हर महीने का एक छोटा, पक्का पैसा बन जाता है। धान और गेहूं की कटाई के बाद जो पराली खेत में पड़ी रहती है, उसे उठाने वाला अब कोई होगा। और एक फ़ायदा दिखता कम है, गिनती में ज़्यादा है — प्लांट में गैस निकलने के बाद जो बचता है, वह जैविक खाद है, जो उन्हीं खेतों में वापस जाती है। यानी किसान एक ही काम से दो बार कमाता है: अवशेष बेचकर, और खाद का ख़र्च घटाकर।
चुनौती भी साफ़ है और उसे छिपाने की ज़रूरत नहीं। बायोमास भारी होता है और उसका दाम प्रति टन कम होता है, इसलिए प्लांट का पूरा गणित 30-40 किलोमीटर के दायरे में ही बैठता है। इकट्ठा करना, गट्ठर बांधना और भंडारण — यही वह कड़ी है जो देश में सबसे कमज़ोर है। योजना में इसके लिए ज़िला स्तर पर एक चैलेंज फंड रखा गया है और प्लांट को गैस नेटवर्क से जोड़ने के लिए पाइपलाइन की मदद भी। बड़ी बात यह है कि दस साल का भाव तय होने से अब कोई सहकारी समिति या छोटा उद्यमी किसानों के साथ चार-पांच साल का करार करने की हिम्मत कर सकता है। पैसे से ज़्यादा, इस काम में भरोसे की कमी थी। वही अब भरा जा रहा है।














