ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।देश के 6,01,328 आबाद गांवों में से 6,00,868 गांवों से पांच किलोमीटर के भीतर अब बैंक शाखा, बैंक मित्र या इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक का केंद्र मौजूद है। यानी 99.92 प्रतिशत। बचे हैं सिर्फ़ 460 गांव।
यह आंकड़ा जितना बड़ा लगता है, उससे बड़ी बात यह है कि यह पहुंचा कैसे। इसके पीछे 1.81 लाख बैंक शाखाएं हैं, पर उनसे कहीं ज़्यादा 17.36 लाख बैंक मित्र (बिज़नेस कॉरेस्पॉन्डेंट) हैं और 1.65 लाख इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक केंद्र। सीधी बात यह है कि यह काम शाखाएं खोलकर नहीं हुआ — शाखा महंगी पड़ती है और गांव में उसका खर्च नहीं निकलता। यह काम उस आदमी या औरत के भरोसे हुआ जो अपने ही गांव में एक मशीन लेकर बैठता है और खाते से पैसा निकलवा देता है। जन धन खातों की संख्या अब 58.77 करोड़ है और उनमें ₹3,12,414 करोड़ जमा हैं।
असली नेटवर्क: 1.81 लाख शाखाओं के मुक़ाबले 17.36 लाख बैंक मित्र — गांव तक बैंकिंग ईंट-गारे से नहीं, आदमी और मशीन से पहुंची है।
खाता खुल जाना पहुंच है। खाते से कर्ज़ मिल जाना समावेश है। दोनों के बीच अब भी एक अच्छी-ख़ासी दूरी बाकी है।
एक नज़र में
• कवरेज: 6,01,328 आबाद गांवों में से 6,00,868 — 99.92 प्रतिशत
• मापदंड: पांच किलोमीटर के भीतर कोई बैंकिंग आउटलेट
• नेटवर्क: 1.81 लाख शाखाएं, 17.36 लाख बैंक मित्र, 1.65 लाख आईपीपीबी केंद्र (17 जुलाई 2026 तक)
• आंकड़ों का स्रोत: बैंकों द्वारा जन धन दर्शक ऐप पर अपलोड किया गया डेटा
• जन धन खाते: 58.77 करोड़, कुल जमा ₹3,12,414 करोड़
• घोषणा: वित्त मंत्रालय, 3 अगस्त 2026
अब लंबी नज़र वाली बात, जो हर साल दोहराने लायक है। बैंकिंग तक पहुंच और वित्तीय समावेश एक चीज़ नहीं हैं। पहुंच का मतलब है कि पैसा जमा और निकाला जा सकता है। समावेश का मतलब है कि उसी रिश्ते के आधार पर कर्ज़, बीमा और पेंशन भी मिल सके। भारत ने पहला काम असाधारण रफ़्तार से किया है — दुनिया में शायद ही किसी देश ने इतने कम समय में इतने खाते खोले हों। दूसरा काम अभी बीच में है, और उसका सबूत यही है कि गांव में छोटा कारोबारी आज भी कर्ज़ के लिए बैंक से पहले किसी और के पास जाता है। इसकी वजह नीयत नहीं, जानकारी है: खाते में लेन-देन का रिकॉर्ड बन तो रहा है, पर वह रिकॉर्ड अब तक कर्ज़ के फ़ैसले में उतना काम नहीं आता जितना आ सकता है।
बड़ी बात यह है कि इसका रास्ता भी अब दिख रहा है, और वह इसी हफ़्ते की दो ख़बरों में छिपा है। केसीसी पर आया आकलन बताता है कि ब्याज सहायता का असली फ़ायदा डेयरी और पशुपालन जैसी उन गतिविधियों में निकला जिनकी कमाई हर महीने आती है — यानी वह कमाई जिसका रिकॉर्ड बैंक खाते में बनता है। और यूपीआई तथा जन धन के लेन-देन का डेटा अब इतना गहरा हो चुका है कि उसी के आधार पर छोटी रकम का कर्ज़ देने की व्यवस्था तकनीकी रूप से मुमकिन है। अगला पड़ाव इसलिए एक नई शाखा नहीं है। अगला पड़ाव यह है कि गांव के उसी बैंक मित्र की मशीन से, बिना कागज़ों के बंडल के, पहली बार एक छोटा कर्ज़ मंज़ूर हो जाए। 460 गांव जोड़ने का काम आसान बचा है। असली काम अब उन छह लाख गांवों में शुरू होता है जो जुड़ चुके हैं।














