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सुपर कंप्यूटर अब सोनीपत में

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 8, 2026
in शिक्षा-रोजगार
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IIT-Delhi

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।प्रधानमंत्री ने आज आईआईटी दिल्ली के 57वें दीक्षांत समारोह को संबोधित किया और सोनीपत कैंपस में बनी ‘परम प्रज्ञा’ सुपर कंप्यूटिंग सुविधा का उद्घाटन किया। ग़ौर करने वाली बात मशीन नहीं, उसका पता है — हौज़ ख़ास नहीं, हरियाणा।

समारोह में तीन हज़ार से ज़्यादा छात्रों को डिग्री मिली, जिनमें 587 पीएचडी वाले थे। यह दूसरा आंकड़ा ज़्यादा बताता है। इतने शोध छात्र साधारण कंप्यूटर पर काम नहीं करते, उन्हें साझा कंप्यूटिंग चाहिए, जिसका समय घंटों में बंटता है और हफ़्तों पहले बुक होता है। परम प्रज्ञा इसी काम के लिए है — आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और भारी सिमुलेशन। देश की राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत क्षमता 44 पेटाफ्लॉप पार कर चुकी है और लक्ष्य 90 पेटाफ्लॉप का है। आईआईएससी बेंगलुरु में परम प्रवेग 3.3, आईआईटी मद्रास में परम शक्ति 3.1 और आईआईटी रुड़की में परम गंगा 1.66 पेटाफ्लॉप की है।

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दूसरा कैंपस, दूसरा दर्जा नहीं: पुराने परिसर के पास ज़मीन और बिजली की जगह नहीं बची। नई क्षमता अब हाईवे पर चालीस किलोमीटर आगे बन रही है।

सुपर कंप्यूटर दरअसल एक बड़ा बिजली का बिल और एक ठंडा कमरा है, जिसमें प्रोसेसर लगे होते हैं। इसीलिए वह वहीं बनता है जहां ज़मीन और बिजली अब भी सस्ती हो।

एक नज़र में

• मौक़ा: आईआईटी दिल्ली का 57वां दीक्षांत समारोह, 8 अगस्त 2026
• डिग्री: तीन हज़ार से ज़्यादा छात्र, जिनमें 587 पीएचडी शोधार्थी
• सुविधा: ‘परम प्रज्ञा’ एआई आधारित हाई परफ़ॉर्मेंस कंप्यूटिंग सुविधा, सोनीपत कैंपस
• काम: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, उन्नत कंप्यूटिंग और अंतर-विषय शोध
• देश में: राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन की क्षमता 44 पेटाफ्लॉप पार, लक्ष्य 90 पेटाफ्लॉप
• दूसरी मशीनें: परम प्रवेग (आईआईएससी) 3.3, परम शक्ति (आईआईटी मद्रास) 3.1, परम गंगा (आईआईटी रुड़की) 1.66 पेटाफ्लॉप

अब इसका सीधा मतलब समझिए। दिल्ली-एनसीआर के बाहर, हरियाणा के एक ज़िले में इस दर्जे की रिसर्च सुविधा बनने से तीन चीज़ें बदलती हैं। पहली, वहां पढ़ने वाले छात्र को अब बड़ी मशीन के लिए दिल्ली नहीं आना पड़ेगा। दूसरी, जो प्रोफ़ेसर अब तक मुख्य कैंपस में ही बैठना चाहते थे, उनके लिए दूसरा कैंपस अब मजबूरी नहीं, विकल्प है। और तीसरी, जहां ऐसी मशीन होती है, उसके आसपास धीरे-धीरे कंपनियां बसती हैं — क्योंकि एआई और डेटा वाले कारोबार में सबसे महंगी चीज़ कंप्यूटिंग का समय ही है।

ईमानदारी से एक बात और कहनी चाहिए। मशीन लगाना आसान हिस्सा है, उसे चलाते रहना मुश्किल। किसी भी सुपर कंप्यूटर की रफ़्तार कुछ बरसों में पुरानी पड़ जाती है; जो पुराना नहीं पड़ता वह है उसे चलाने वाला स्टाफ़, सॉफ़्टवेयर और हर साल आने वाला बिजली का बिल। आगे का रास्ता साफ़ है — हर मशीन के साथ चलाने का पक्का बजट, इस्तेमाल का आंकड़ा सार्वजनिक करना ताकि ख़ाली पड़ी क्षमता दूसरे संस्थानों के शोधार्थियों को मिल सके, और बाहरी छात्रों के लिए भी दरवाज़ा खुला रखना। मशीन बन गई, यह अच्छी ख़बर है। उसका पूरा इस्तेमाल हो, यह अगली।

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