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एमबीबीएस की सीटें 167 फ़ीसदी बढ़ीं

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 8, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।2026-27 सत्र में देश में एमबीबीएस की 1,36,939 सीटें हैं। 2014 में यह संख्या 51,348 थी। बारह साल में क़रीब 167 फ़ीसदी की बढ़ोतरी — और यही बढ़ोतरी अब अगला सवाल भी खड़ा करती है।

मेडिकल की सीट कोई कुर्सी-मेज़ नहीं होती। हर नए छात्र के लिए पहले साल शव-विच्छेदन की व्यवस्था चाहिए, दूसरे साल चालू प्रयोगशाला, तीसरे साल असली मरीज़ों वाला वार्ड, और हर साल साथ खड़ा एक शिक्षक। इमारत तीन साल में बन जाती है। सर्जरी का प्रोफ़ेसर पंद्रह साल में तैयार होता है — पहले छात्र, फिर पीजी, फिर डॉक्टर, तब जाकर शिक्षक। यानी जब सीटें बारह साल में 167 फ़ीसदी बढ़ती हैं, तो शिक्षकों की मांग अपने आप आगे निकल जाती है। यह किसी की लापरवाही नहीं, गणित है, और हर तेज़ी से बढ़ती शिक्षा व्यवस्था इससे गुज़रती है।

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सबसे धीमा हिस्सा: कक्षा तीन साल में बन जाती है, पढ़ाने वाला डॉक्टर पंद्रह साल में। मेडिकल शिक्षा की रफ़्तार इमारत नहीं, शिक्षक तय करते हैं।

मेडिकल कॉलेज तीन साल में खड़ा किया जा सकता है। उसमें पढ़ाने वाला प्रोफ़ेसर नहीं — उसे उगाना पड़ता है, और उसमें पंद्रह साल लगते हैं।

एक नज़र में

• एमबीबीएस सीटें, 2026-27: 1,36,939
• 2014 में: 51,348 — यानी क़रीब 167 फ़ीसदी की बढ़ोतरी
• एम्स नेटवर्क: इस साल संस्थानों में कुल 2,507 एमबीबीएस सीटें अधिसूचित
• ताज़ा मंज़ूरी: एम्स माजरा, रेवाड़ी (हरियाणा) में 2026-27 के लिए 50 एमबीबीएस सीटें
• असली अड़चन: कक्षाएं नहीं — पढ़ाने वाले विशेषज्ञ और मरीज़ों वाले बेड
• सबसे कारगर रास्ता: नए कॉलेजों को ज़िला अस्पतालों से जोड़ना, जहां मरीज़ पहले से मौजूद हैं

अच्छी बात यह है कि इसका हल पहले से चल रहा है और वह बहुत सीधा है — नए मेडिकल कॉलेज को ज़िला अस्पताल से जोड़ देना। ज़िला अस्पताल के पास वह चीज़ है जो नए कैंपस में बन ही नहीं सकती: मरीज़, और हर तरह के मरीज़। इससे दो काम एक साथ होते हैं। छात्र को असली अनुभव मिलता है, जो किसी सिमुलेशन से नहीं मिलता; और ज़िले को एक ऐसा अस्पताल मिलता है जहां पढ़ाई होने की वजह से इलाज का स्तर अपने आप ऊपर उठता है। एक बात और, जो आंकड़ों में साफ़ दिखती है — जो डॉक्टर छोटे शहर में पढ़ता है, उसके वहीं काम करने की संभावना कहीं ज़्यादा होती है।

बाक़ी काम शिक्षकों की पाइपलाइन का है, और उसके रास्ते भी तय हैं: पीजी सीटें बढ़ाना ताकि आज का एमबीबीएस कल का शिक्षक बने, ज़िला अस्पताल के अनुभवी डॉक्टरों को शर्तें पूरी होने पर पढ़ाने की मान्यता देना, और रिकॉर्डेड लेक्चर व टेली-मेंटरिंग से एक विशेषज्ञ का समय एक से ज़्यादा कॉलेज तक पहुंचाना। यह सब रातोंरात नहीं होगा और न ही ऐसा दावा करना चाहिए। पर क्रम सही है — पहले सीटें बनीं, अब पढ़ाई की गहराई बनेगी। 1.37 लाख सीटें तभी 1.37 लाख अच्छे डॉक्टर बनेंगी, और आख़िर में गिनती उसी की होगी, सीट की नहीं।

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