ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।एक तारीख़ इस समय भारत की सबसे अहम बातचीत को घेरे हुए है। शुक्रवार, 24 जुलाई को भारत और अमेरिका के बीच एक अस्थायी टैरिफ़ व्यवस्था की मियाद ख़त्म हो रही है — और इसी घड़ी के सामने वार्ताकार द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण को “आख़िरी एक फ़ीसदी” पर बताते हैं: बेहद क़रीब, पर न दस्तख़त हुए हैं और न मसौदा सार्वजनिक हुआ है।
सौदे की रूपरेखा अब दिखने लगी है। अमेरिका पहले ही भारतीय सामान पर अपनी जवाबी टैरिफ़ दर 25% से घटाकर 18% कर चुका है, और दोनों देशों ने साझा “मिशन 500” तय किया है — यानी 2030 तक आपसी व्यापार दोगुना कर 500 अरब डॉलर तक ले जाना। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर के बीच बाज़ार पहुंच, कृषि और ग़ैर-टैरिफ़ बाधाओं पर कई दौर हो चुके हैं। भारत का रुख़ साफ़ है: वह तभी दस्तख़त करेगा जब शर्तें भारतीय निर्यातकों को असल बढ़त दें, सिर्फ़ समयसीमा से पहले सौदा निपटाने के लिए नहीं।
समय से ज़्यादा शर्तें अहम: 24 जुलाई को अस्थायी टैरिफ़ खिड़की बंद हो रही है और दर 25% से 18% पर आ चुकी है — भारत कपड़ा, इंजीनियरिंग, रत्न, दवा और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी पहुंच पर अड़ा है।
किसी भी बातचीत में आख़िरी एक फ़ीसदी सबसे कठिन होता है, क्योंकि असली फ़ायदा वहीं छिपा होता है। इसे सही करने का धैर्य, जल्दी निपटाने की रफ़्तार से ज़्यादा क़ीमती है।
एक नज़र में
• समयसीमा: अस्थायी अमेरिकी टैरिफ़ व्यवस्था 24 जुलाई को ख़त्म
• स्थिति: पहले चरण का समझौता “आख़िरी एक फ़ीसदी” पर
• टैरिफ़: जवाबी दर पहले ही 25% से घटकर 18%
• लक्ष्य: “मिशन 500” — 2030 तक 500 अरब डॉलर का आपसी व्यापार
आम भारतीय के लिए दांव कूटनीति से कहीं ज़्यादा ठोस है। एक सोचा-समझा समझौता उन श्रम-आधारित उद्योगों के लिए टैरिफ़ की दीवार नीची करता है जो करोड़ों को रोज़गार देते हैं — कपड़ा, रत्न-आभूषण, इंजीनियरिंग सामान, चमड़ा — और दवा व इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे ऊंचे मूल्य वाले निर्यातकों के लिए भी। अच्छी शर्तों और जल्दबाज़ी में की गई शर्तों का फ़र्क़ कारख़ानों के ऑर्डर और नौकरियों में गिना जाता है — यही वजह है कि भारत सुर्ख़ी के लिए नहीं, अपनी शर्त पर टिका है।
सकारात्मक रास्ता है मज़बूती से बातचीत जारी रखना। भारत सबसे तेज़ बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है, ब्रिटेन के साथ एक जीवंत समझौता और यूरोपीय संघ के साथ पूरा हुआ करार पहले से उसके विकल्प बढ़ा रहे हैं — इसलिए कोई एक समयसीमा उसे घेर नहीं सकती। मसौदा इसी हफ़्ते तय हो या थोड़ा बाद, इनाम एक ही है: टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी पहुंच जो भारतीय सामान को विदेशी बाज़ारों में उसकी योग्यता के दम पर जगह दिलाए।











