ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।सीधी बात यह है कि रिज़र्व बैंक ने ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया, इसलिए आपकी ईएमआई अभी नहीं बढ़ेगी। लेकिन उसी बैठक में जो अनुमान लगाया गया, वह रसोई से जुड़ा है: महंगाई अक्टूबर से दिसंबर के बीच 5.9 प्रतिशत तक जा सकती है।
रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने 5 अगस्त 2026 को रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर ही रखा। यह लगातार चौथी बैठक है जिसमें दर नहीं बदली। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रुख़ को इन शब्दों में रखा — न ढीला, न सख़्त; समिति महंगाई की दिशा और उसकी बनावट पर और साफ़ तस्वीर चाहती है।
अब असली बात। दर भले न बदली हो, दो अनुमान बदले हैं। रिज़र्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया, और पूरे साल की महंगाई दर का अनुमान घटाकर 5.0 प्रतिशत। लेकिन साथ में यह भी कहा कि तिमाही-दर-तिमाही महंगाई ऐसी चलेगी — जुलाई-सितंबर में 4.7 प्रतिशत, अक्टूबर-दिसंबर में 5.9 प्रतिशत, और जनवरी-मार्च में 5.5 प्रतिशत।
चौथी बार कोई बदलाव नहीं। फ़रवरी 2026 से रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर टिका है। उसी बैठक में विकास दर का अनुमान बढ़ा और महंगाई का सालाना अनुमान घटा — पर बीच में एक ऊँचाई आनी बाकी है।
ब्याज दर से आटा-दाल सस्ता नहीं होता। जब बैंक ख़ुद कहे कि दबाव खाने और ईंधन का है, तो अगले चार महीने की असली नीति राशन और तेल के कैलेंडर में लिखी जाएगी।
एक नज़र में
• रेपो रेट: 5.25% — कोई बदलाव नहीं, लगातार चौथी बार
• फ़ैसले की तारीख़: 5 अगस्त 2026
• विकास दर अनुमान: बढ़ाकर 6.7% (2026-27)
• महंगाई अनुमान: पूरे साल 5.0%
• तिमाही अनुमान: जुलाई-सितंबर 4.7%, अक्टूबर-दिसंबर 5.9%, जनवरी-मार्च 5.5%
• जून 2026 की महंगाई दर: 4.4% — सोलह महीने बाद पहली बार 4% के लक्ष्य से ऊपर
• दबाव किससे: खाने-पीने की चीज़ें और ईंधन
इसका आप पर क्या असर पड़ेगा, यह तीन हिस्सों में समझिए। पहला — क़र्ज़ लेने वाले के लिए। देश में ज़्यादातर होम लोन अब रेपो रेट से जुड़े हैं। रेपो नहीं बदला, तो अगली रीसेट तारीख़ तक आपकी ईएमआई वहीं रहेगी। यह राहत है, पर इसे स्थायी मानकर नया बड़ा क़र्ज़ मत जोड़िए — समिति ने कहा है कि वह और साफ़ तस्वीर का इंतज़ार कर रही है, यानी दरवाज़ा दोनों तरफ़ खुला है।
दूसरा — बचत करने वाले के लिए, और यही वह हिसाब है जो ज़्यादातर लोग नहीं लगाते। अगर पूरे साल महंगाई 5.0 प्रतिशत रहने वाली है और दिसंबर तिमाही में 5.9 प्रतिशत तक जाएगी, तो जो एफ़डी आपको इससे कम ब्याज दे रही है, उसमें रक़म बढ़ने के बावजूद ख़रीदने की ताक़त घट रही है। पासबुक का नंबर बढ़ता दिखता है, थैले का वज़न घटता है। दर देखिए, पर महंगाई के मुक़ाबले देखिए।
तीसरा — घर के महीने के ख़र्च के लिए। रिज़र्व बैंक ने साफ़ नाम लिया है कि दबाव कहाँ से आ रहा है — खाने-पीने की चीज़ें और ईंधन। ये वे चीज़ें हैं जिन पर ब्याज दर का सीधा असर नहीं होता; इन पर असर पड़ता है फ़सल, आयात की खिड़की, बफ़र स्टॉक की निकासी और ड्यूटी में बदलाव से। अच्छी ख़बर यह है कि यही वे उपाय हैं जो सरकार के पास पहले से मौजूद हैं और इस साल इस्तेमाल भी हुए हैं। दरअसल यही वजह है कि बैंक ने साल भर का अनुमान घटाया है — उसे लग रहा है कि यह उछाल कुछ महीनों का है, टिकाऊ नहीं। आगे का काम सीधा है: त्योहारों से पहले आपूर्ति का कैलेंडर समय पर चले, ताकि दिसंबर तिमाही की यह ऊँचाई एक तिमाही में गुज़र जाए, अगले साल की आदत न बन जाए।













