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सौ नए एयरपोर्ट, सब पुरानी हवाई पट्टियों पर

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 28, 2026
in the blitz
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मुंबई एयरपोर्ट के टर्मिनल पर एक विमान

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।देश में इस वक़्त 165 एयरपोर्ट चालू हैं। पिछले महीने अधिसूचित योजना सौ और जोड़ने की है — और उनमें से लगभग कोई भी ख़ाली ज़मीन पर नहीं बनेगा।

संशोधित उड़ान योजना, जो 4 जुलाई 2026 को अधिसूचित हुई, वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36 तक दस साल चलेगी और इसका कुल परिव्यय 28,840 करोड़ रुपये है — यानी औसतन क़रीब 2,884 करोड़ रुपये सालाना। लक्ष्य है पहले से मौजूद हवाई पट्टियों पर 100 नए एयरपोर्ट और 200 आधुनिक हेलीपैड, साथ ही कम यात्रियों वाले रूट पर उड़ान भरने वाली एयरलाइनों को आर्थिक मदद।

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देश भर में सैकड़ों हवाई पट्टियाँ हैं जो कभी सेना के लिए, कभी राज्य सरकार के लिए, कभी किसी सरकारी कारखाने या रियासत के लिए बनी थीं, और अब ख़ाली पड़ी हैं। पुरानी पट्टी को दोबारा चालू करना और नई ज़मीन लेकर एयरपोर्ट बनाना — दोनों का ख़र्च ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ रखता है। रनवे बना हुआ है, उसके ऊपर का रास्ता साफ़ है; ख़र्च सिर्फ़ टर्मिनल, एप्रन, नेविगेशन उपकरण और अग्निशमन पर आता है। इसीलिए इतनी रक़म में सौ एयरपोर्ट की बात हो पा रही है, जबकि उतने पैसे में तीन-चार बड़े नए एयरपोर्ट ही बनते।

74 से 165 तक। बारह साल में देश के चालू एयरपोर्ट दोगुने से ज़्यादा हुए हैं और भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है। अगले सौ एयरपोर्ट उन पट्टियों से आने हैं जो पहले से मौजूद हैं।

असल बात हवाई जहाज़ की नहीं है। असल बात यह है कि जो ज़िला आज अपनी ही राजधानी से चौदह घंटे दूर है, उसके लिए दो घंटे की उड़ान क्या बदल देती है।

एक नज़र में
• योजना: संशोधित उड़ान, 4 जुलाई 2026 को अधिसूचित
• अवधि: 2026-27 से 2035-36 तक, दस साल
• परिव्यय: 28,840 करोड़ रुपये — क़रीब 2,884 करोड़ सालाना
• लक्ष्य: मौजूदा पट्टियों से 100 एयरपोर्ट; 200 आधुनिक हेलीपैड
• चालू एयरपोर्ट: 15 जुलाई 2026 तक 165, 2014 में 74
• स्थिति: भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार
200 हेलीपैड पर उतनी बात नहीं होगी जितनी होनी चाहिए। हेलीपैड छोटा एयरपोर्ट नहीं होता — वह अलग क़िस्म की चीज़ है और अलग ज़रूरत पूरी करता है। उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर के जिन इलाक़ों में बरसात में सड़क का सफ़र दिनों में गिना जाता है और भूस्खलन के बाद हफ़्तों में, वहाँ एक प्रमाणित हेलीपैड सबसे पहले मरीज़ को निकालने का ज़रिया है, फिर आपदा राहत का, और उसके बाद पर्यटन का। योजना पैड बनाने का पैसा देती है। पैड तभी काम का है जब उस पर हेलिकॉप्टर नियमित उतरे — और यह सवाल ज़िला प्रशासन को अभी उठाना चाहिए, जब राज्य स्तर के क़रार लिखे ही जा रहे हैं।

यात्री के लिए एक व्यावहारिक बात। उड़ान योजना वाले रूट पर हर उड़ान में सीमित सीटें तय क़ीमत पर मिलती हैं और बाक़ी का अंतर सरकार भरती है। यानी सस्ती सीटें गिनती की होती हैं और जल्दी निकल जाती हैं। नए जुड़े शहर से सफ़र करना हो तो योजना की खिड़की खुलते ही बुक कीजिए, काउंटर पर पहुँचकर नहीं।

और जिस ज़िले को अगले सौ में आना है, उसके लिए तैयारी अभी से है — पट्टी के मालिकाना हक़ का रिकॉर्ड, रनवे की हालत का सर्वे, आसपास ऊँची इमारतों का ब्योरा, और यह अनुमान कि आसपास के कितने लोग इस एयरपोर्ट का इस्तेमाल करेंगे। सीधी बात यह है कि ये एयरपोर्ट उन ज़िलों को मिलेंगे जिनकी फ़ाइल तैयार होगी। और यह ऐसी दौड़ है जिसमें कोई भी ज़िला शामिल हो सकता है।

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