ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।दस साल में लेनदेन की संख्या 13,574 गुना बढ़ी, रकम 4,486 गुना। इन दोनों का फ़र्क़ ही बताता है कि यूपीआई असल में किसके काम आया।
यूपीआई की शुरुआत 25 अगस्त 2016 को हुई थी और इस हफ़्ते इसके दस साल पूरे हुए। वित्त मंत्रालय के आँकड़े कहते हैं कि सालाना लेनदेन 2016-17 के 1.78 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में 24,162 करोड़ से ऊपर पहुँच गया, और रकम करीब ₹7,000 करोड़ से बढ़कर लगभग ₹314 लाख करोड़ हो गई।
अब इन दोनों को बाँटकर देखिए। संख्या 13,574 गुना बढ़ी, पर रकम 4,486 गुना। इसका मतलब है कि हर लेनदेन का औसत आकार घट गया — 2016-17 में करीब ₹3,933 से गिरकर आज करीब ₹1,300, यानी लगभग एक तिहाई। शुरुआत में यूपीआई बड़े ट्रांसफ़र का ज़रिया था। आज यह सब्ज़ी, ऑटो, चाय और दवा की दुकान का ज़रिया है। देश में अब रोज़ करीब 66 करोड़ यूपीआई भुगतान होते हैं।
दस साल का सफ़र। यूपीआई, 25 अगस्त 2016 को शुरू। सबसे बड़ी बात कुल रकम नहीं, बल्कि यह है कि अब हर भुगतान कितना छोटा हो गया है।
कोई भुगतान प्रणाली उस दिन आम आदमी की बनती है, जिस दिन लोग उसे सिर्फ़ बड़ी रकम के लिए बचाकर रखना छोड़ देते हैं।
एक नज़र में
• शुरुआत: 25 अगस्त 2016 · दस साल पूरे
• लेनदेन: 1.78 करोड़ (2016-17) से 24,162 करोड़ (2025-26)
• रकम: करीब ₹7,000 करोड़ से लगभग ₹314 लाख करोड़
• ब्लिट्ज़ की गणना: संख्या 13,574 गुना, रकम 4,486 गुना
• औसत भुगतान: पहले करीब ₹3,933, अब करीब ₹1,300
• दुनिया में: 11 देशों में चालू; 2025 में दुनिया के रियल-टाइम भुगतान का करीब 49%
यूपीआई अब 11 देशों में चल रहा है — संयुक्त अरब अमीरात, फ़्रांस, भूटान, श्रीलंका, नेपाल, सिंगापुर, मॉरीशस, क़तर, कंबोडिया, ग्रीस और मालदीव। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इसे दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम भुगतान प्रणाली माना है, और 2025 तक दुनिया के ऐसे कुल लेनदेन का करीब 49 प्रतिशत अकेले यूपीआई से होता है। जिन घरों से कोई विदेश में काम करता है, उनके लिए यह ख़ास मायने रखता है — जितने देशों में यह रास्ता खुलेगा, पैसा भेजने की लागत उतनी घटेगी।
आगे का काम अब रास्ते का नहीं, उस पर चलने वाली चीज़ों का है। छोटे दुकानदार के पास अब हर भुगतान का रिकॉर्ड है, और यही रिकॉर्ड उसे बैंक से छोटा कर्ज़ दिलाने का सबसे मज़बूत आधार बन सकता है — बशर्ते उसकी सहमति से यह जानकारी सही जगह पहुँचे। दूसरी ज़रूरत भरोसे की है: जब औसत भुगतान ₹1,300 का हो, तो ₹40 का अटका हुआ ट्रांसफ़र भी रेहड़ी वाले के लिए बड़ी बात होती है, इसलिए शिकायत का निपटारा तेज़ और आसान होना चाहिए। दस साल में देश ने दुनिया का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला भुगतान रास्ता बना लिया। अगले दस साल इस बात के हैं कि उस पर क्या-क्या चलेगा।












