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बिजली क्षमता का आधा हिस्सा अब साफ़ ईंधन

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 28, 2026
in the blitz, ऊर्जा
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।भारत ने गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता में 300 गीगावॉट का आँकड़ा पार कर लिया है। बड़ी बात यह नहीं कि यह लक्ष्य से आगे है — बड़ी बात यह है कि बनाने वाली मशीन भी अब देश के भीतर है।

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार 31 जुलाई 2026 तक देश की गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता 300.50 गीगावॉट हो गई। कुल स्थापित क्षमता क़रीब 552 गीगावॉट है, यानी साफ़ ईंधन का हिस्सा 54.44 प्रतिशत। 2030 तक 500 गीगावॉट के लक्ष्य का यह 60.1 प्रतिशत है।

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इसका ब्योरा यूँ है — सौर 164.59 गीगावॉट, पवन 58.14, पनबिजली (बड़ी और छोटी मिलाकर) 57.24, जैव-ऊर्जा 11.75 और परमाणु 8.78 गीगावॉट। दरअसल सबसे बड़ा बदलाव सौर में आया है: 2014 में यह सिर्फ़ 2.8 गीगावॉट थी, आज 164.59 — यानी क़रीब उनसठ गुना।

क्षमता भी बढ़ी, बिजली भी। नवीकरणीय स्रोतों से बनी बिजली 2014-15 के 190.96 अरब यूनिट से बढ़कर 2025-26 में 477.79 अरब यूनिट हो गई — ढाई गुना। यानी पैनल सिर्फ़ लगे नहीं, चले भी।

पैनल लगाना एक बात है। पैनल बनाना दूसरी। इस साल का असली आँकड़ा यही है कि मंज़ूर सूची में दर्ज मॉड्यूल क्षमता अब देश की पूरी लगी हुई सौर क्षमता से ज़्यादा है।

एक नज़र में

• कुल गैर-जीवाश्म क्षमता: 300.50 गीगावॉट (31 जुलाई 2026)
• कुल स्थापित क्षमता में हिस्सा: 54.44% (लगभग 552 गीगावॉट में से)
• सौर: 164.59 गीगावॉट — 2014 में 2.8 थी
• पवन: 58.14 · पनबिजली: 57.24 · जैव-ऊर्जा: 11.75 · परमाणु: 8.78
• 2025-26 में जुड़ी क्षमता: रिकॉर्ड 55.29 गीगावॉट
• नवीकरणीय बिजली उत्पादन: 477.79 अरब यूनिट, 2014-15 में 190.96
• एएलएमएम में दर्ज मॉड्यूल क्षमता: 200 गीगावॉट पार, 2014 में 2.3
यहाँ एक फ़र्क़ समझ लेना ज़रूरी है, क्योंकि दोनों आँकड़े साथ-साथ छपते हैं और लोग उन्हें एक मान लेते हैं।

क्षमता का मतलब है कितनी बिजली बन सकती है; उत्पादन का मतलब है कितनी बनी। दोनों साथ बढ़े हैं, और यही तसल्ली की बात है — नवीकरणीय स्रोतों से बिजली उत्पादन 2014-15 के 190.96 अरब यूनिट से बढ़कर 2025-26 में 477.79 अरब यूनिट हो गया, यानी ढाई गुना। अगर सिर्फ़ क्षमता बढ़ती और उत्पादन नहीं, तो इसका अर्थ होता कि पैनल लगे हैं पर ग्रिड उन्हें ले नहीं पा रहा।

अब उस बात पर आइए जिसका असर सीधे रोज़गार पर है। सोलर मॉड्यूल की मंज़ूर सूची — जिसे एएलएमएम कहते हैं — में दर्ज क्षमता 200 गीगावॉट पार कर गई है, जो 2014 में सिर्फ़ 2.3 गीगावॉट थी। इसका मतलब यह हुआ कि पैनल बनाने का काम अब बड़े पैमाने पर देश के भीतर है। पहले हर बड़े सौर प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा ख़र्च आयातित पैनल पर जाता था और उसकी क़ीमत बाहर तय होती थी। अब वह पैसा और वे नौकरियाँ काफ़ी हद तक यहीं रहती हैं।

घर के लिए इसका क्या मतलब है? दो चीज़ें। पहली, छत पर सोलर लगवाने में पैनल की उपलब्धता अब अड़चन नहीं है; अड़चन आमतौर पर वितरण कंपनी की मंज़ूरी और नेट मीटरिंग की प्रक्रिया रह जाती है, इसलिए आवेदन करते समय वही कागज़ पहले पूरे रखिए। दूसरी, यह सारा निर्माण जिस रफ़्तार से चल रहा है — 2025-26 में अकेले 55.29 गीगावॉट जुड़ी — उसका असर लंबी अवधि में बिजली की दर पर पड़ता है, क्योंकि सूरज की लागत ईंधन की तरह हर साल नहीं बदलती। आगे का काम अब क्षमता जोड़ने से आगे का है: ट्रांसमिशन लाइनें और भंडारण, ताकि दिन में बनी बिजली शाम को भी काम आए।

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