ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।2023 में CAG ने BSNL से जो तीन काम कहे थे, उनमें से दो का हिसाब अब साफ़ है और एक अब भी खुला।
ग्रामीण टेलीफ़ोन एक्सचेंजों पर लगे वाई-फ़ाई हॉटस्पॉट को लेकर 2023 की सिफ़ारिश तीन साल बाद आधी पूरी और आधी खुली पड़ी है। यह हिसाब CAG और संसदीय समिति के अपने रिकॉर्ड से निकलता है।
दिसंबर 2016 में टेलीकॉम कमीशन ने यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (USOF) से पैसा मंजूर किया, ताकि भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) के ग्रामीण एक्सचेंजों पर 25,000 वाई-फ़ाई हॉटस्पॉट लग सकें। तर्क किफ़ायत का था। एक्सचेंज पहले से खड़े थे, बिजली और बैकहॉल दोनों वहाँ मौजूद थे, और हॉटस्पॉट को गाँव और उसके पास से गुज़रते फ़ाइबर के बीच का आख़िरी सस्ता टुकड़ा बनना था। कंपनी के अपने अनुमान में इस योजना से 2018-19 में 75 करोड़ रुपये की कमाई होनी थी।
नौ साल बाद ये हॉटस्पॉट भारतीय टेलीकॉम की सबसे बारीकी से जाँची गई छोटी संपत्ति हैं। कागज़ पूरा है — CAG का एक पैराग्राफ़, एक संसदीय समिति जिसने इसे अलग विषय बनाया, कंपनी की अपनी गवाही, और 12 अगस्त 2026 को सदन में रखी गई एक नई निष्पादन लेखा-परीक्षा (performance audit)। पूरी कड़ी एक साथ पढ़िए तो यह उस सिफ़ारिश की कहानी है जिसका आधा हिस्सा तेज़ी से निपटा और आधा खुला रह गया।
सिफ़ारिश के तीन हिस्सों में से पहले पर कंपनी असहमत रही, दूसरा उसने पूरा किया, और तीसरा 9 अगस्त 2023 से खुला है।
सिफ़ारिश क्या थी
CAG की 2023 की अनुपालन लेखा-परीक्षा (compliance audit) रिपोर्ट, जो 9 अगस्त 2023 को सदन में रखी गई, एक ही वाक्य में तीन अलग माँगें रखती है। पहली, कोई योजना प्रस्तावित करने से पहले BSNL अमल की दिक्कतें आँकने का तंत्र बनाए। दूसरी, हॉटस्पॉट को अपने पैरों पर खड़ा करने लायक कमाई का ढाँचा तैयार करे, ज़रूरत पड़े तो उन्हें नई तकनीक पर ले जाए, और रखरखाव ठीक रखे। तीसरी, असर का आकलन करे, जिसका साफ़ मकसद डाउनटाइम पेनल्टी घटाना है।
लेखा-परीक्षा के अपने आँकड़ों ने समस्या का आकार भी बता दिया। मंजूर जगहों में से 13.77 प्रतिशत बाद में बंद हुईं या हटाई गईं, और उन पर हुआ खर्च बेकार गया। दस टेलीकॉम सर्किल में 700 हॉटस्पॉट देर से चालू हुए, सबसे लंबी देरी 790 दिन की रही। 2017-18 से 2021-22 के बीच कंपनी पर पड़ी पेनल्टी संशोधित परियोजना लागत के 9.45 प्रतिशत तक पहुँची, और वह लागत 642.58 करोड़ रुपये थी।
कंपनी ने क्या कहा
लोक उपक्रम समिति ने इस पैराग्राफ़ को अपने हाथ में लिया और 12 अगस्त 2025 को अपनी चौदहवीं रिपोर्ट लोकसभा में रखी। समिति ने दर्ज किया कि 25,000 में से 24,333 हॉटस्पॉट चालू हुए, संशोधित लागत 642.58 करोड़ रुपये रही, और लेखा-परीक्षा ने 957 जगहों की मौके पर जाँच की।
समिति ने वे आँकड़े भी दर्ज किए जो इस विषय को खबर बनाते हैं। 2017-18 से 2021-22 तक की कुल कमाई 3.09 लाख रुपये रही, जबकि अकेले 2018-19 का लक्ष्य 75 करोड़ रुपये था। देरी पर 81.84 लाख रुपये का हर्जाना वसूला गया, और डाउनटाइम पेनल्टी के रूप में कंपनी पर 60.71 करोड़ रुपये पड़े।
पहली माँग पर कंपनी सहमत नहीं हुई। उसने समिति से कहा कि प्रस्ताव उचित जाँच-परख और मंजूरी के बाद USOF को भेजा गया था, और दिक्कत आकलन में नहीं, बाज़ार में आई:
“टेलीकॉम क्षेत्र तेज़ी से बदल रहा है, इसलिए परियोजना के अमल के दौरान लैंडलाइन का इस्तेमाल घटता गया और ग्रामीण एक्सचेंज व्यावसायिक रूप से टिकाऊ नहीं रह गए।”
कमाई पर कंपनी का जवाब भी उतना ही सीधा था। उसने कहा कि ग्रामीण उपयोगकर्ताओं की आम धारणा यही है कि वाई-फ़ाई सेवा मुफ़्त होती है, और इसी वजह से ये हॉटस्पॉट आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं हैं। कंपनी के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक ने मौखिक गवाही में जोड़ा कि सिर्फ़ वाई-फ़ाई को कमाई का ज़रिया मानकर चलें तो यह जीतने वाली स्थिति नहीं बनती।
डाउनटाइम पेनल्टी के 60.71 करोड़ रुपये पर कंपनी ने जो जवाब दिया, वह अनुबंध की बनावट का मामला है। समिति से उसने कहा कि पेनल्टी इसलिए बनी क्योंकि BSNL पर डाउनटाइम पेनल्टी लगाने की कोई ऊपरी सीमा नहीं है। उसी अनुबंध में उसके विक्रेताओं को अपनी देनदारी पर 20 प्रतिशत की सीमा मिली हुई थी। यह फ़र्क मसौदे का है और एक मानक शर्त से सुलझ जाता है।
दूसरी और तीसरी माँग पर कंपनी ने बहस नहीं की। उसने समिति को बताया कि हॉटस्पॉट दूसरी जगहों पर ले जाए जाएँगे या BSNL की दूसरी वाई-फ़ाई परियोजनाओं में लगेंगे। PM-WANI पर काम चल रहा है, और करीब 1,600 हॉटस्पॉट पब्लिक डेटा ऑफ़िस के साथ कमाई-बँटवारे के इंतज़ाम में बदले जा चुके हैं। इसी दौरान कंपनी का ज़ोर 4G के पूरे फैलाव और संशोधित BharatNet के तहत फ़ाइबर-टू-द-होम पर चला गया।
नई लेखा-परीक्षा क्या दिखाती है
CAG इसी सवाल पर 2026 की उस रिपोर्ट में लौटा जो BharatNet की निष्पादन लेखा-परीक्षा है और 12 अगस्त 2026 को सदन में रखी गई। BharatNet के तहत लगे 1,04,675 वाई-फ़ाई कनेक्शनों में से मार्च 2024 तक 6,293 चालू थे, यानी 6.01 प्रतिशत। मार्च 2025 तक सभी राज्यों को मिलाकर 766 कनेक्शन काम कर रहे थे, यानी 0.7 प्रतिशत।
उसी रिपोर्ट की बड़ी तस्वीर एक ऐसे नेटवर्क की है जो बन काफ़ी हद तक चुका है, पर इस्तेमाल कम हो रहा है। मंजूर 42,068 करोड़ रुपये के मुकाबले खर्च 39,888 करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है। संशोधित दायरे की 2.26 लाख ग्राम पंचायतों में से 2.19 लाख सेवा-तैयार हैं। लेकिन सेवा-तैयार ग्राम पंचायतों में से असल में चालू का हिस्सा 33.20 प्रतिशत है, और उपलब्ध बैंडविड्थ का इस्तेमाल 17.91 प्रतिशत।
वजहें रहस्यमय नहीं, तकनीकी हैं, और रिपोर्ट उन्हें गिनाती भी है। कुल डाउनटाइम का करीब 48 प्रतिशत फ़ाइबर केबल की खराबी या उसके कटने से आता है, और एक फ़ाइबर फ़ॉल्ट ठीक होने में औसतन 17 दिन लगते हैं। जो फ़ाइबर फ़ॉल्ट लोकलाइज़ेशन सिस्टम इन कटों को अपने आप पकड़ लेता, उसकी योजना अप्रैल 2014 में बनी थी और जुलाई 2024 तक वह लगा नहीं था। फ़ॉल्ट लोकलाइज़ेशन के बिना नेटवर्क वही होता है जिसे कोई आदमी लाइन पर पैदल चलकर ठीक करता है।
मंत्रालय के जवाब, जो इसी रिपोर्ट में दर्ज हैं, इसी भाषा में बात करते हैं। मार्च 2025 में उसने कहा कि खराब अपटाइम की वजहें दूसरी विकास गतिविधियों से OFC को नुकसान, रैखिक नेटवर्क डिज़ाइन और कई ग्राम पंचायतों में बिजली कनेक्शन का न होना हैं। उसने यह भी दर्ज कराया कि BSNL के दावों में से 34.77 करोड़ रुपये की पेनल्टी काटी गई है। BharatNet के दूसरे चरण के जिन 2,001.43 करोड़ रुपये को कंपनी ने स्थापना खर्च और दूसरी परियोजनाओं में लगाया था, उन पर मंत्रालय ने नवंबर 2025 में कहा कि पूरी रकम लौटाई जा चुकी है। लेखा-परीक्षा यह भी दर्ज करती है कि छह राज्यों में लागत घटाने के आधार पर 16,271 ग्राम पंचायतें, वहाँ की कुल पंचायतों का 39 प्रतिशत, दायरे से बाहर रहीं।
जो ठीक हुआ
तकनीक और कमाई वाला आधा हिस्सा जवाब पा चुका है, और जवाब आँकड़ों के साथ है। दूरसंचार विभाग की 19 दिसंबर 2025 की सालाना समीक्षा के अनुसार, 31 अक्टूबर 2025 तक BSNL के 97,068 4G साइट लग चुके थे और 93,511 चालू थे, जिन्हें 5G पर ले जाया जा सकता है। फ़ाइबर-टू-द-होम कनेक्शन मार्च 2019 के 3.35 लाख से बढ़कर 31 जनवरी 2025 तक 41.12 लाख हो गए। संसदीय स्थायी समिति के रिकॉर्ड में 30 नवंबर 2025 तक BharatNet पर 13,92,767 फ़ाइबर-टू-द-होम कनेक्शन दर्ज हैं, और दूसरे चरण में करीब 5,200 ग्राम पंचायतों में वाई-फ़ाई हॉटस्पॉट लगाने का काम चल रहा है।
जिस बही-खाते से रखरखाव का पैसा आना है, वह भी पलटा है। कर्ज़ मार्च 2022 के 32,978 करोड़ रुपये से घटकर सितंबर 2023 में 19,568 करोड़ रुपये रह गया। 2024-25 में संपत्ति से कमाई 800 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले 812.27 करोड़ रुपये रही। उसी साल तीसरी तिमाही में शुद्ध मुनाफ़ा 262 करोड़ रुपये और चौथी तिमाही में 280 करोड़ रुपये रहा।
समिति की मशीनरी भी अपने ढंग से चली। BSNL पर समिति की छठी रिपोर्ट की 23 सिफ़ारिशों पर संचार मंत्रालय ने की गई कार्रवाई के नोट भेजे, और जो जवाब मिले उनमें से 17 को समिति ने स्वीकार किया।
एक नज़र में
● मंजूरी: BSNL के ग्रामीण एक्सचेंजों पर 25,000 वाई-फ़ाई हॉटस्पॉट, दिसंबर 2016, USOF से (CAG Report No. 16 of 2023, para 4.2)
● चालू: 24,333 हॉटस्पॉट, संशोधित लागत ₹642.58 करोड़ (COPU, Fourteenth Report, 12 अगस्त 2025)
● कमाई 2017-22: ₹3.09 लाख, जबकि अकेले 2018-19 का लक्ष्य ₹75 करोड़ (वही रिपोर्ट)
● डाउनटाइम पेनल्टी: ₹60.71 करोड़, विक्रेता की देनदारी पर 20% की सीमा, BSNL पर कोई नहीं (वही रिपोर्ट)
● BharatNet वाई-फ़ाई चालू, मार्च 2024: 1,04,675 में से 6,293, यानी 6.01% (CAG Report No. 19 of 2026, para 3.2.3)
● मार्च 2025 तक काम कर रहे: 766, यानी 0.7% (वही पैराग्राफ़)
● डाउनटाइम में फ़ाइबर फ़ॉल्ट का हिस्सा: 48%, औसत मरम्मत समय 17 दिन
● BharatNet बैंडविड्थ इस्तेमाल: 17.91%
● BSNL 4G साइट चालू, 31 अक्टूबर 2025: 97,068 में से 93,511 (DoT Year End Review, 19 दिसंबर 2025)
इसका मतलब क्या है
सेवा-तैयार ग्राम पंचायत का अर्थ यह है कि फ़ाइबर इमारत तक पहुँच गया। गाँव में कोई उसका इस्तेमाल कर पा रहा है या नहीं, यह अलग आँकड़ा है, और वह आँकड़ा 33.20 प्रतिशत है। इन दोनों के बीच की दूरी में वह स्कूल भी बैठा है जो पाठ स्ट्रीम नहीं कर पाता और वह उप-स्वास्थ्य केंद्र भी जो स्कैन अपलोड नहीं कर पाता।
इसीलिए यह किसी पर फ़ैसला नहीं है। कंपनी ने सिफ़ारिश का कठिन आधा हिस्सा उठाया और उस पर काम किया, वित्तीय हालत पलटी, और तकनीक आगे बढ़ी। जो बंद नहीं हुआ, वह संपत्तियों को चलती हालत में रखने वाला हिस्सा है। 12 अगस्त 2026 को लेखा-परीक्षक ने उसे लगभग उन्हीं शब्दों में दोहराया जो उसने 2023 में इस्तेमाल किए थे: वाई-फ़ाई एक्सेस पॉइंट चालू और ठीक रखरखाव वाले रहें, ताकि उनका इस्तेमाल बढ़े।
ब्लिट्ज़ की सलाह
दूरसंचार विभाग के लिए। फ़ाइबर फ़ॉल्ट लोकलाइज़ेशन सिस्टम और रिमोट फ़ाइबर मॉनिटरिंग को GIS और एक केंद्रीय नेटवर्क ऑपरेशंस सेंटर से जोड़कर लागू कीजिए, ताकि फ़ॉल्ट सॉफ़्टवेयर पकड़े, पैदल गश्त नहीं। 17 दिन के मरम्मत समय में सबसे बड़ी वसूली-योग्य कड़ी यही है।
BSNL और परियोजना के प्रशासनिक मंत्रालय के लिए। भुगतान को इंस्टॉलेशन से हटाकर सेवा-उपलब्धता से जोड़िए। चालू हुई संपत्ति पर दिया गया पैसा चालू होना खरीदता है, मापे गए अपटाइम पर दिया गया पैसा अपटाइम खरीदता है। लेखा-परीक्षा की अपनी कसौटी, यानी साझेदार प्रोत्साहनों में 95 प्रतिशत से ऊपर की उपलब्धता, शुरुआत की सही जगह है।
कंपनी के कॉन्ट्रैक्ट सेल के लिए। BSNL की डाउनटाइम देनदारी पर वही सीमा रखिए जो विक्रेता को मिली है। एक तरफ़ बिना सीमा की पेनल्टी और दूसरी तरफ़ 20 प्रतिशत की सीमा कोई कारोबारी स्थिति नहीं है, और इसकी कीमत 60.71 करोड़ रुपये पहले ही चुकाई जा चुकी है।
उन मंत्रालयों के लिए जो इस नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकते हैं। एंकर टेनेंसी सबसे सस्ती माँग है। स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि विभाग तयशुदा दरों पर समर्पित क्षमता लें तो बैंडविड्थ इस्तेमाल 17.91 प्रतिशत से ऊपर उस गाँव में भी उठेगा जहाँ उम्मीद यही रहती है कि वाई-फ़ाई मुफ़्त होगा।
ज़िलों के लिए। फ़ाइबर के रखरखाव का काम प्रदर्शन से जुड़ी शर्तों पर स्थानीय युवाओं और उद्यमियों को दीजिए, जैसा लेखा-परीक्षा भारत नेट उद्यमी मॉडल के तहत सुझाती है। जिस गाँव का कनेक्शन गया है, उसी गाँव में रहने वाली मरम्मत टीम सबसे तेज़ मरम्मत देती है।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने कमाया रिकॉर्ड मुनाफ़ा
समामेलन के बाद के पहले पूरे साल में 28 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का शुद्ध मुनाफ़ा और उनकी परिसंपत्ति गुणवत्ता, दोनों अपने सबसे अच्छे स्तर पर।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने 2025-26 में 10,176 करोड़ रुपये का समेकित शुद्ध मुनाफ़ा कमाया, जो एक साल पहले के 6,820 करोड़ रुपये से कहीं ऊपर है। यह जानकारी वित्तीय सेवा विभाग ने 25 अगस्त 2026 को दी।
3,356 करोड़ रुपये की यह बढ़त इस व्यवस्था की अब तक की सबसे बड़ी सालाना बढ़त है। कुल कारोबार 13.5 लाख करोड़ रुपये के पार चला गया।
परिसंपत्ति गुणवत्ता के आँकड़े भी उसी दिशा में हैं। सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ 5.3 प्रतिशत और शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ 2.1 प्रतिशत रहीं, जिन्हें विभाग ने इस व्यवस्था के अब तक के सबसे नीचे के स्तर बताया है। ऋण-जमा अनुपात (credit-deposit ratio) 75.2 प्रतिशत रहा, यानी जमा का जितना हिस्सा कर्ज़ में गया, वह अब तक का सबसे ऊँचा है।
इन अनुपातों के पीछे का पैमाना ही इन्हें बैंकिंग का नहीं, विकास का आँकड़ा बनाता है। ये 28 बैंक 26 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के करीब 700 ज़िलों में 22,273 शाखाएँ चलाते हैं। साल भर में इन्होंने प्रधानमंत्री जन धन योजना के 54.98 लाख नए खाते खोले।
तुलना के साथ एक शर्त चलती है। 2025-26 उस समामेलन के बाद का पहला पूरा साल है जिसने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की संख्या घटाकर 28 कर दी। इसलिए साल-दर-साल की यह तुलना कम संख्या वाले बड़े बैंकों को ज़्यादा संख्या वाले छोटे बैंकों के सामने रखती है। व्यवस्था के स्तर का जोड़ ठोस है, बैंक-दर-बैंक तुलना वैसी नहीं।
ब्लिट्ज़ की सलाह
28 संस्थाओं का समेकित मुनाफ़ा उनके आपसी फ़र्क को ढक देता है। रिज़र्व बैंक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के लिए यह पहले से करता है। कुल आँकड़े के साथ बैंक-दर-बैंक मुनाफ़ा और परिसंपत्ति गुणवत्ता भी छपे तो प्रायोजक बैंक और राज्य सरकारें देख सकेंगी कि औसत को कौन ऊपर उठा रहा है और कौन उसके सहारे चल रहा है।
28 ग्रामीण बैंकों तक पहुँचेगा SIDBI का सह-ऋण
तीन बैंकों में चला पायलट पूरे क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक नेटवर्क तक, और कर्ज़ की फ़ाइल कागज़ के बजाय एक प्लेटफ़ॉर्म पर।
छोटे उद्यम की कर्ज़ फ़ाइल अब शाखा और क्षेत्रीय दफ़्तर के बीच नहीं, दो कर्ज़दाताओं के सिस्टम के बीच चलेगी, और यह इंतज़ाम सभी 28 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तक पहुँचेगा। यह जानकारी वित्त मंत्रालय ने 26 अगस्त 2026 को दी।
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) ने 25 अगस्त 2026 को सभी 28 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के प्रमुखों को एक साथ बिठाया। मकसद MSME सह-ऋण (co-lending) के उस इंतज़ाम को पायलट से आगे ले जाना है, जो अब तक तीन बैंकों में चल रहा था।
असल बात तरीके की है। SIDBI का को-लेंडिंग ओरिजिनेशन प्लेटफ़ॉर्म कर्ज़ की फ़ाइल शुरू से आख़िर तक बिना कागज़ के ले जाता है और दस्तावेज़ पूरे होते ही सैद्धांतिक मंजूरी लौटा देता है। पैसा सीधे कर्ज़ लेने वाले के खाते में जाता है।
जिस नेटवर्क पर यह सवारी करेगा, वह इन बैंकों का अपना है — 22,273 शाखाएँ। विज्ञप्ति में जो नहीं है, वह पायलट का हिसाब है: न मंजूर रकम, न वितरण, न कर्ज़ लेने वालों की गिनती, और न विस्तार का कोई लक्ष्य।
ब्लिट्ज़ की सलाह
इंतज़ाम को बड़ा करने से पहले पायलट के आँकड़े सामने आने चाहिए। सिर्फ़ जुड़ने वाले बैंकों की गिनती से वित्तीय सेवा विभाग को यह पता नहीं चलता कि कर्ज़ उस ग्रामीण उद्यम तक पहुँचा या नहीं जिसे पहले नहीं मिलता था। मंजूर रकम, वितरित रकम, औसत कर्ज़ का आकार और पहली बार कर्ज़ लेने वालों का हिस्सा — तिमाही आधार पर छपी यह एक तालिका ही सवाल का जवाब दे देगी।
सड़क क्षेत्र में बैठा है सबसे ज़्यादा परियोजना-पैसा
सांख्यिकी मंत्रालय की जुलाई की फ़्लैश रिपोर्ट में केंद्रीय बुनियादी ढाँचे का पूरा बही-खाता, जहाँ पैसा ढाँचे से आगे चल रहा है।
सड़क और परिवहन ही वह जगह है जहाँ केंद्र सरकार का परियोजना-पैसा सबसे ज़्यादा बैठा है — 1,246 परियोजनाएँ, 19.81 लाख करोड़ रुपये। यह आँकड़ा सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की जुलाई 2026 की फ़्लैश रिपोर्ट (flash report) में है, जो 25 अगस्त 2026 को जारी हुई।
PAIMANA पोर्टल पर 150 करोड़ रुपये और उससे ऊपर की 1,775 केंद्रीय परियोजनाएँ चल रही हैं, जिनकी कुल संशोधित लागत 37.11 लाख करोड़ रुपये है। इन पर अब तक 19.26 लाख करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, यानी संशोधित लागत का 51.91 प्रतिशत। रिपोर्ट 17 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों की परियोजनाएँ समेटती है।
क्षेत्र के हिसाब से रजिस्टर का झुकाव साफ़ है। परिवहन और लॉजिस्टिक्स की 1,246 परियोजनाएँ 19.81 लाख करोड़ रुपये की हैं, ऊर्जा की 205 परियोजनाएँ 10.66 लाख करोड़ रुपये की, और पानी-स्वच्छता की 53 परियोजनाएँ 2.05 लाख करोड़ रुपये की। अकेले सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के पास 993 परियोजनाएँ हैं, जिनकी संशोधित लागत 9.62 लाख करोड़ रुपये है — रजिस्टर का सबसे बड़ा एक हिस्सा।
आकार के हिसाब से 735 मेगा परियोजनाएँ 1,000 करोड़ रुपये या उससे ऊपर की हैं और उन पर 28.77 लाख करोड़ रुपये लगे हैं। बाक़ी 1,040 बड़ी परियोजनाएँ 150 करोड़ से 1,000 करोड़ रुपये के बीच की हैं, कुल 4.93 लाख करोड़ रुपये की।
पकड़ने लायक जोड़ी रिपोर्ट के अपने दो कॉलम में है। 675 परियोजनाएँ, यानी करीब 38 प्रतिशत, 80 प्रतिशत या उससे ज़्यादा भौतिक प्रगति पर हैं, जबकि 305 परियोजनाएँ, करीब 17 प्रतिशत, 80 प्रतिशत या उससे ज़्यादा वित्तीय पूर्णता पर। पैसा ढाँचे से आगे चलता है, और संशोधित लागत के रजिस्टर में यही अपेक्षित भी है। 37.11 लाख करोड़ रुपये पहले से बढ़ी हुई लागत है, इसलिए इसका बढ़ना अपने आप क्षमता का बढ़ना नहीं है।
ब्लिट्ज़ की सलाह
फ़्लैश रिपोर्ट उन गिनी-चुनी मासिक दस्तावेज़ों में है जो किसी नागरिक को पूरे मंत्रालय की परियोजना-किताब एक साथ दिखा देते हैं, और इसे पढ़ा बहुत कम जाता है। सारांश विज्ञप्ति के साथ नीचे की परियोजना-दर-परियोजना तालिका भी मशीन-पठनीय आँकड़े के रूप में खुले डेटा प्लेटफ़ॉर्म पर आनी चाहिए। तब वही जानकारी राज्यों के नियोजन विभागों और कर्ज़ देने वाली संस्थाओं के सामने होगी, जो अभी उसे हाथ से जोड़ते हैं।

आयात अब भी निर्यात से आगे, उत्पादन बढ़ा
इस्पात मंत्रालय के चार महीने के आँकड़े, और व्यापार का पलड़ा दूसरी तरफ़।
अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच भारत ने जितना तैयार इस्पात बाहर भेजा, उससे 473.9 हज़ार टन ज़्यादा मँगाया। यह आँकड़ा इस्पात मंत्रालय ने 25 अगस्त 2026 को जारी किया।
उत्पादन उसी दौर में ऊपर रहा। कच्चे इस्पात का उत्पादन 56.2 मिलियन टन रहा, जो एक साल पहले के इन्हीं चार महीनों से 2.4 प्रतिशत ज़्यादा है। हॉट मेटल 31.9 मिलियन टन रहा, 2.7 प्रतिशत की बढ़त के साथ, और तैयार इस्पात 54.7 मिलियन टन, 4.7 प्रतिशत की बढ़त के साथ।
व्यापार का हिसाब अलग दिशा में जाता है। इन्हीं चार महीनों में देश ने 2,766.2 हज़ार टन तैयार इस्पात मँगाया और 2,292.3 हज़ार टन बाहर भेजा। चीन से 855.8 हज़ार टन आया, यानी कुल आयात का 30.9 प्रतिशत और सबसे बड़ा अकेला स्रोत। वियतनाम ने 354.0 हज़ार टन लिया, यानी निर्यात का 15.4 प्रतिशत और सबसे बड़ा अकेला ठिकाना।
अगस्त 2026 में TMT बार का भाव 58,003 रुपये प्रति टन, हॉट-रोल्ड कॉइल का 70,448 रुपये, कोल्ड-रोल्ड कॉइल का 76,463 रुपये और गैल्वनाइज़्ड प्लेन शीट का 86,668 रुपये रहा।
मंत्रालय ने ग्रीन स्टील सर्टिफ़िकेट का हिसाब भी दर्ज किया। 15 राज्यों के 98 इस्पात उत्पादकों को ये प्रमाणपत्र (green steel certificate) मिल चुके हैं। यह जारी हुए प्रमाणपत्रों की गिनती है, कम-उत्सर्जन वाले इस्पात का उत्पादन नहीं, और दोनों को एक आँकड़ा नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
ये चार महीने के संचयी आँकड़े हैं। ये सालाना दर नहीं हैं और इन्हें साल भर के हिसाब से नहीं बढ़ाया जा सकता।
ब्लिट्ज़ की सलाह
ग्रीन स्टील सर्टिफ़िकेट मंत्रालय का अपना वह औज़ार है जो उत्सर्जन तीव्रता को बाज़ार का संकेत बनाता है, और 98 उत्पादकों की गिनती किसी खरीदार को यह नहीं बताती कि खरीदने लायक प्रमाणित इस्पात कितना उपलब्ध है। उत्पादकों की गिनती के साथ स्टार रेटिंग के हिसाब से प्रमाणित टनभार भी छपे तो सरकारी खरीद, जहाँ से कम-उत्सर्जन इस्पात की पहली माँग आनी है, ऐसा विनिर्देश लिख सकेगी जिस पर सचमुच खरीद हो सके।
भारतीय झंडे पर जहाज़ चलाना 16-20% महँगा
राष्ट्रीय पोत परिवहन बोर्ड के पहले सागर संवाद में माल ढुलाई पर बाहर जाती रकम, और उसके सामने रखा गया रोडमैप।
भारतीय झंडे के नीचे जहाज़ चलाना विदेशी जहाज़ के मुकाबले 16 से 20 प्रतिशत महँगा पड़ता है। यह बात 25 अगस्त 2026 के पहले सागर संवाद में दर्ज हुई।
यह फ़र्क आयात टैक्स, नाविकों के वेतन पर कटौती, माल ढुलाई पर टैक्स और ऊँची पूँजी लागत से बनता है। जब तक यह फ़ासला घटता नहीं, बेड़े का लक्ष्य चाहे जो हो, टनभार दूसरे झंडों पर ही दर्ज होता रहेगा।
पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग राज्य मंत्री शांतनु ठाकुर ने इसी बैठक में कहा कि भारत अपना माल ढोने के लिए विदेशी शिपिंग कंपनियों को हर साल करीब 75 अरब डॉलर देता है। बैठक में पाँच स्तंभों वाला एक रोडमैप रखा गया, जिससे पाँच साल के भीतर भारतीय व्यापारी बेड़े में 100 जहाज़ जुड़ सकते हैं।
बैठक में आगे की दो लकीरें भी खींची गईं। पत्तन मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने 2047 तक सालाना 10,000 मिलियन टन बंदरगाह क्षमता का लक्ष्य रखा, और संवाद में 10,000 करोड़ रुपये की कंटेनर विनिर्माण सहायता योजना पर भी बात हुई।
एक शर्त साथ चलती है। 100 जहाज़ एक प्रस्तावित रोडमैप का संभावित नतीजा हैं। यह न ऑर्डर बुक है, न किसी शिपयार्ड को दिया गया काम, न कोई मंजूरी, और इसके साथ न टनभार जुड़ा है न कोई वित्त-व्यवस्था।
ब्लिट्ज़ की सलाह
पूरी समस्या इसी लागत-अंतर की है और उसकी जड़ पूरी तरह राजकोषीय है। भारतीय झंडे वाले टनभार पर टैक्स के बर्ताव का एक ब्योरा बने — जहाज़ों और भंडार पर आयात ड्यूटी, नाविकों के वेतन का बर्ताव, और माल ढुलाई पर टैक्स की स्थिति। इसे उन झंडों के सामने रखकर देखा जाए जिन पर भारतीय मालिक असल में जहाज़ दर्ज कराते हैं। तब मंत्रालय को पता चलेगा कि 16 से 20 प्रतिशत में से कितने अंक उसके अपने हाथ में हैं। इस हिसाब के बिना बेड़े का लक्ष्य मालिकों से यही कहता है कि वे यह फ़र्क अपनी जेब से भरें।
AMRUT का 36% पैसा गया सीवर लाइनों में
शहरी मंत्रालय की समीक्षा में सीवर और सेप्टेज का हिस्सा मंजूर निवेश का 36 प्रतिशत, और परियोजनाओं की गिनती का 6.8 प्रतिशत।
देश के 500 शहरों में सीवर का काम AMRUT की मंजूर रकम का 36 प्रतिशत ले रहा है। यह जानकारी आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने 25 अगस्त 2026 को दी।
सीवर और सेप्टेज प्रबंधन के खाते में 71,133 करोड़ रुपये हैं, जबकि AMRUT के तहत कुल मंजूर परियोजना लागत 1,97,191 करोड़ रुपये है। परियोजनाओं की गिनती में यही काम सिर्फ़ 6.8 प्रतिशत बैठता है। यह समीक्षा AMRUT 2.0 और CITIIS 2.0 पर हुई, जिसकी अध्यक्षता राज्य मंत्री टोखन साहू ने की।
यही अनुपात असली खबर है। सीवर का काम पूँजी-भारी और धीमा होता है — थोड़ी-सी बड़ी परियोजनाएँ एक-तिहाई से ज़्यादा पैसा सोख लेती हैं, और उनके सामने पानी की सप्लाई और हरित क्षेत्र की कहीं ज़्यादा, पर सस्ती परियोजनाएँ खड़ी रहती हैं।
अभी 47,230 करोड़ रुपये की 394 सीवर परियोजनाएँ चल रही हैं। पूरी होने पर इनसे 48.76 लाख घरों को नया सीवर कनेक्शन मिलने और मौजूदा व्यवस्था के उन्नयन से 60.59 लाख घरों को फ़ायदा पहुँचने की उम्मीद है, यानी कुल मिलाकर करीब 1.09 करोड़ घर। AMRUT जिन 500 शहरों में चल रहा है, वहाँ शहरी घरों की संख्या करीब 7.41 करोड़ है।
दोनों घरेलू आँकड़े परियोजना पूरी होने पर अपेक्षित नतीजे हैं। इनमें से कोई भी दिए जा चुके कनेक्शनों की गिनती नहीं है, और 71,133 करोड़ रुपये मंजूर रकम है, खर्च हुई नहीं।
ब्लिट्ज़ की सलाह
मंजूर सीवर परियोजना और चालू घरेलू कनेक्शन के बीच का फ़ासला ही वह जगह है जहाँ इस कार्यक्रम की परख होती है, और मंत्रालय अभी पहला आँकड़ा ही देता है। शहर-दर-शहर एक तिमाही सार्वजनिक डैशबोर्ड, जिसमें मंजूर कनेक्शनों के सामने सचमुच दिए गए कनेक्शन दिखें, नगर आयुक्त और निवासी दोनों को एक ही आँकड़ा पढ़ने देगा। यही आख़िरी छोर के कनेक्शन चार्ज को भी सामने लाएगा, जो बिछी हुई सीवर लाइन को घर तक पहुँचने से सबसे ज़्यादा रोकता है।
भारत-कनाडा ने खोला वित्त मंत्रियों का चैनल
किसी G7 देश के साथ पहला स्थायी वित्त संवाद, और औज़ार के तौर पर सामने रखी गई एक भुगतान लाइन।
टोरंटो में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2030 तक भारत-कनाडा के बीच 70 अरब कनाडाई डॉलर के दोतरफ़ा कारोबार का लक्ष्य रखा। पहला आर्थिक संवाद 27 अगस्त 2026 को है।
भारत और कनाडा के वित्त मंत्रियों का यह पहला आर्थिक और वित्तीय संवाद कनाडा के वित्त मंत्री फ़्रांस्वा-फ़िलिप शैंपेन की मेज़बानी में हो रहा है। कनाडा के वित्त विभाग की 21 अगस्त 2026 की सूचना के अनुसार, भारत में कनाडा का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष निवेश 2024 में 110 अरब डॉलर के पार जा चुका है।
26 अगस्त 2026 को टोरंटो में भारतीय समुदाय और कारोबारियों को संबोधित करते हुए सीतारमण ने 2025-26 के लिए भारत की वास्तविक वृद्धि 7.6 प्रतिशत बताई, यह जानकारी बिज़नेस स्टैंडर्ड ने अपनी रिपोर्ट में दी। उन्होंने कैमेको के साथ इसी साल हुए 2.6 अरब कनाडाई डॉलर के यूरेनियम आपूर्ति समझौते को ऐसे रिश्ते की मिसाल बताया। भारत-कनाडा डिजिटल वित्त के लिए उन्होंने यूनिफ़ाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (UPI) को एक लाइन के तौर पर सामने रखा।
इस पेशकश का आकार भी देख लेना चाहिए। वित्त मंत्रालय ने 24 अगस्त 2026 को बताया कि 2025-26 में UPI पर 24,162 करोड़ लेन-देन हुए, जिनका मूल्य 314 लाख करोड़ रुपये रहा। इस पर अब 703 बैंक चालू हैं, जबकि 2016-17 में यह संख्या 44 थी। जुलाई 2026 इसका सबसे ऊँचा महीना रहा — 2,366 करोड़ लेन-देन, 29.88 लाख करोड़ रुपये। मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की मान्यता के हवाले से 2025 में वैश्विक रियल-टाइम भुगतान मात्रा में UPI का हिस्सा 49 प्रतिशत बताया, और यह 11 देशों में चल रहा है।
इन आँकड़ों के साथ दो शर्तें चलती हैं। 49 प्रतिशत मात्रा का हिस्सा है, मूल्य का नहीं — मंत्रालय की अपनी विज्ञप्ति दर्ज करती है कि UPI पर व्यापारी लेन-देन में से 86 प्रतिशत 500 रुपये से कम के सूक्ष्म भुगतान हैं। और 11 देशों में चलने का मतलब मुख्य रूप से भारतीय यात्रियों के लिए चुनिंदा दुकानों पर स्वीकार्यता है, उन देशों की घरेलू भुगतान व्यवस्था नहीं।
ब्लिट्ज़ की सलाह
किसी संवाद का असली मूल्य वह कैलेंडर है जो वह पीछे छोड़ जाता है। अगली बैठक और उसके एजेंडा शीर्षक इसी पहली बैठक में तय हो जाएँ, बाद में नहीं। यही किसी शुरुआत को संस्था बनाता है, और पहली बैठक के साझा बयान से यही सबसे ज़्यादा छूटता है। भारतीय बुनियादी ढाँचे में पेंशन फंड की पहुँच और भुगतान लाइन के लिए निपटान का इंतज़ाम, ये दो शीर्षक दूसरी बैठक को अपने आप ज़रूरी बना देंगे।

सेशेल्स ने माँगा भारत के साथ मत्स्य समझौता
नीली अर्थव्यवस्था की एक बैठक, जिसमें माल नहीं, प्रयोगशाला और हैचरी की इंजीनियरिंग का लेन-देन है।
इस बैठक की असल पूँजी माल नहीं, प्रयोगशाला है — दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की जाँच सुविधाओं तक आपसी पहुँच पर काम करना तय किया। यह बैठक 25 अगस्त 2026 को हुई।
सेशेल्स ने मत्स्य पालन और जलकृषि पर भारत से एक द्विपक्षीय समझौता ज्ञापन माँगा है। मत्स्य पालन विभाग के अनुसार, इस उच्चस्तरीय बैठक में समुद्री जलकृषि, आधुनिक हैचरी, टूना मत्स्य पालन, भंडार आकलन और कटाई के बाद की इंजीनियरिंग पर बात हुई। दोनों पक्ष एक ढाँचागत सालाना कार्ययोजना, आपसी प्रयोगशाला पहुँच और साझा पायलट परियोजनाओं की दिशा में बढ़ने पर सहमत हुए।
भारत की तरफ़ से मेज़ पर पैमाना रखा गया। विभाग के मुताबिक देश का मछली उत्पादन 19.7 मिलियन टन और समुद्री खाद्य निर्यात 8.46 अरब डॉलर है। विज्ञप्ति इनमें से किसी आँकड़े के साथ कोई संदर्भ वर्ष नहीं जोड़ती, इसलिए दूसरा स्रोत मिलने तक दोनों बिना तारीख़ के हैं।
दोनों देशों के बीच कारोबार छोटा है। सेशेल्स ने 2024 में भारत से 91.73 मिलियन डॉलर का आयात किया और 2.46 मिलियन डॉलर का निर्यात, ये आँकड़े सेशेल्स के प्रतिनिधिमंडल के हैं और ANI ने इन्हें दर्ज किया। असली मूल्य माल में नहीं, तकनीकी लेन-देन में है। प्रयोगशालाओं की आपसी मान्यता ही तय करती है कि भारत की जाँच रिपोर्ट किसी विदेशी निरीक्षण एजेंसी को मंजूर होगी या नहीं, और भारतीय समुद्री खाद्य निर्यात उसी दरवाज़े से गुज़रता है।
अभी कुछ भी हस्ताक्षरित नहीं हुआ। समझौता ज्ञापन सेशेल्स की तरफ़ से रखी गई माँग भर है।
ब्लिट्ज़ की सलाह
इस सूची में प्रयोगशालाओं की आपसी मान्यता ही वह चीज़ है जिसका रास्ता बैठक से पैसे तक सबसे छोटा है, और यही सबसे ज़्यादा कार्ययोजना में पड़ी रह जाती है। मत्स्य पालन विभाग और निर्यात निरीक्षण परिषद इसे अपनी अलग समयसीमा वाली स्वतंत्र उपलब्धि की तरह लें। किसी बड़े समझौते के भीतर की उस शर्त की तरह नहीं, जिस पर अभी दस्तखत ही नहीं हुए।
15 मीटर स्लीपर बस को मिला पहला प्रमाणपत्र
एक टाइप अप्रूवल, जो तय करता है कि सबसे लंबी इंटरसिटी बस में कितने यात्री कैसे बैठेंगे।
देश की सबसे लंबी इंटरसिटी बस अब 42 बर्थ ले जा सकेगी, और एक हाइब्रिड रूप में 21 बर्थ के साथ 42 सीटें भी। भारी उद्योग मंत्रालय ने यह जानकारी 26 अगस्त 2026 को दी।
अंतरराष्ट्रीय ऑटोमोटिव तकनीक केंद्र (ICAT) ने 15 मीटर की बहु-धुरी स्लीपर बस के लिए देश का पहला अनुपालन प्रमाणपत्र जारी किया है। वाहन की जाँच संरचनात्मक मजबूती, आपातकालीन सुरक्षा, आग से सुरक्षा और यात्री सुविधा पर हुई, ऑटोमोटिव मानक AIS-119 और AIS-153 के तहत, और केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के लागू प्रावधानों के तहत भी।
लंबाई से ज़्यादा मायने बनावट रखती है। पूरी स्लीपर बस में 42 बर्थ हैं, जबकि हाइब्रिड रूप में 21 बर्थ के साथ 42 सीटें रहती हैं। किसी लंबे इंटरसिटी रूट पर यही फ़र्क एक फेरे और दो फेरों के बीच का होता है।
यह एक निर्माता के एक मॉडल का टाइप अप्रूवल (type approval) है। यह नियामकीय मंजूरी है, न उत्पादन, न ऑर्डर, न सड़क पर तैनाती। किसी रूट पर 15 मीटर का वाहन चलाने की इजाज़त अब भी राज्य के परिवहन प्राधिकरण का फ़ैसला है।
ब्लिट्ज़ की सलाह
केंद्र का ऐसा टाइप अप्रूवल जिसे राज्यों के परमिट नियम पहचानते न हों, एक ऐसा प्रमाणित वाहन बना देता है जिसे कोई चला नहीं सकता। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय और राज्य सरकारें 15 मीटर की बहु-धुरी बसों के लिए रूट और परमिट का बर्ताव प्रमाणन के साथ-साथ तय कर लें, ताकि यह खाई पहले खरीदार को ही न पता चले।
IICT में 100 छात्रों को मिलेंगी नेटफ़्लिक्स छात्रवृत्तियाँ
एक स्ट्रीमिंग मंच सरकारी संस्थान में एनिमेशन, VFX और गेमिंग की फ़ीस और पाठ्यक्रम, दोनों में पैसा लगा रहा है।
एनिमेशन, VFX और गेमिंग पढ़ने वाले 100 छात्रों की फ़ीस का 80 प्रतिशत तक हिस्सा अब छात्रवृत्ति से भरेगा। यह जानकारी सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 26 अगस्त 2026 को दी।
भारतीय रचनात्मक तकनीक संस्थान (IICT) और नेटफ़्लिक्स मिलकर छह व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में ये छात्रवृत्तियाँ देंगे — दो एक-साल के डिप्लोमा और चार छह-महीने के सर्टिफ़िकेट कोर्स। ये पाठ्यक्रम VFX, वर्चुअल आर्ट डिपार्टमेंट वर्कफ़्लो, कैरेक्टर एनिमेशन, इंटरैक्टिव कॉमिक्स, मीडिया तकनीक वर्कफ़्लो और ई-स्पोर्ट्स प्रबंधन तक फैले हैं, और इनमें से दो पाठ्यक्रम नेटफ़्लिक्स की सिफ़ारिशों और अंतरराष्ट्रीय उद्योग मानकों पर बनाए गए हैं।
यह इंतज़ाम प्रधानमंत्री और नेटफ़्लिक्स के सह-मुख्य कार्यकारी टेड सरांडोस की 5 अगस्त 2026 की मुलाकात के बाद आया है। संस्थान का परिसर गोरेगाँव की फ़िल्म सिटी में 10 एकड़ में फैला है और अभी बन रहा है।
विज्ञप्ति में दो चीज़ें नहीं हैं। मंच के योगदान का कोई रुपये में मूल्य नहीं दिया गया, और नौकरी का कोई वादा भी नहीं है। 80 प्रतिशत ऊपरी सीमा है, हर छात्र को मिलने वाली मदद नहीं।
ब्लिट्ज़ की सलाह
एक ही मंच के विनिर्देश पर लिखा पाठ्यक्रम एक ही खरीदार के लिए तैयार करता है। संस्थान नेटफ़्लिक्स की सिफ़ारिशों पर बने दोनों पाठ्यक्रम खुले तौर पर छापे, ताकि दूसरे स्टूडियो और एनिमेशन, VFX, गेमिंग और कॉमिक्स उद्योग के संगठन भी उसी मानक पर आ सकें। सौ छात्रवृत्तियाँ इसी से ऐसी योग्यता बनती हैं जिसे पूरा क्षेत्र पहचाने।
स्टेशन लेखा-परीक्षा ने माँगी समयबद्ध कार्ययोजना
ओवरसाइट डेस्क। गैर-उपनगरीय स्टेशनों पर यात्री सुविधाओं पर CAG की रिपोर्ट, रेल मंत्रालय का जवाब, और लेखा-परीक्षा की अपनी सात माँगें।
न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं की कीमत यात्री किराए में चुका चुका होता है, और 512 में से 458 स्टेशनों पर इनमें कमी मिली। यह CAG की 12 अगस्त 2026 को सदन में रखी रिपोर्ट का निष्कर्ष है।
न्यूनतम आवश्यक सुविधाएँ (Minimum Essential Amenities) कोई इच्छा नहीं, स्टेशन की श्रेणी से जुड़ा दर्ज हक़ हैं। लेखा-परीक्षा ने 16 ज़ोनल रेलवे के 512 गैर-उपनगरीय स्टेशन चुने — 187 अमृत भारत स्टेशन और 325 दूसरे — और 2019-20 से 2023-24 तक का धन और सुविधा-कार्य देखा।
केंद्रीय निष्कर्ष यही है कि 512 में से 458 स्टेशन, यानी 89 प्रतिशत, एक या उससे ज़्यादा न्यूनतम आवश्यक सुविधा में कम पाए गए, और 54 स्टेशनों पर कोई कमी नहीं मिली।
सुविधा-दर-सुविधा तस्वीर भी रिपोर्ट में है। नमूने के 42 प्रतिशत स्टेशनों पर पंखे कम थे, 40 प्रतिशत पर वाटर कूलर और 27 प्रतिशत पर पीने के पानी के नल। 379 स्टेशनों पर सामान्य द्वितीय श्रेणी के डिब्बों वाले हिस्से के ऊपर प्लेटफ़ॉर्म शेड नहीं था। स्वच्छता में 512 में से 491, यानी 96 प्रतिशत स्टेशनों पर न बायो-टॉयलेट थे न बिना पानी वाले शौचालय। लेखा-परीक्षा ने पीने के पानी में कुल कोलीफ़ॉर्म और एशेरिकिया कोलाई (Escherichia coli) की मौजूदगी, और अवशिष्ट क्लोरीन की जाँच में कमियाँ भी दर्ज कीं।
सुगम्यता पर आँकड़े अलग से दिए गए हैं। 227 स्टेशन, यानी 44 प्रतिशत, दिव्यांगजन के लिए रैंप के मामले में कम थे और 128 पर व्हीलचेयर नहीं थी। NSG-1 से NSG-3 श्रेणी के जिन 159 स्टेशनों को देखा गया, उनमें से 82 प्रतिशत पर सहायता बूथ नहीं था। लेखा-परीक्षा ने जिन 374 दिव्यांगजन यात्रियों से बात की, उनमें से 131, यानी 35 प्रतिशत ने सुविधाओं को अपर्याप्त बताया।
रेल मंत्रालय का जवाब
रेल मंत्रालय ने सितंबर और नवंबर 2025 में लेखा-परीक्षा को जवाब भेजे, और ये जवाब निष्कर्षों के साथ-साथ इसी रिपोर्ट में दर्ज हैं। सुविधाओं की कमी मंत्रालय ने स्वीकार की और इन विचलनों को “अस्थायी प्रकृति” का बताया, जिनकी वजह उसने “स्टेशनों के पुनर्वर्गीकरण और उन्नयन, यार्ड रीमॉडलिंग” बताई। उसने यह भी जोड़ा कि “आम तौर पर पर्याप्त अनुपालन सुनिश्चित किया जाता है”। उसने यह भी माना कि काम पूरा होने पर “वैधानिक मंजूरियों और ब्राउनफ़ील्ड चुनौतियों” का असर पड़ता है।
> “सुगम्यता की सुविधाएँ दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और नवंबर 2023 के दिशानिर्देशों के तहत चरणबद्ध ढंग से दी जा रही हैं, जो प्राथमिकता और धन की उपलब्धता के अधीन है।”
मंत्रालय ने अपना काम भी रिकॉर्ड पर रखा। 30 सितंबर 2025 तक 419 स्टेशनों पर 1,673 एस्केलेटर और 714 स्टेशनों पर 1,889 लिफ़्ट लगाई जा चुकी थीं।
लेखा-परीक्षा की आपत्ति संकरी है। उसका कहना यह नहीं कि काम नहीं हो रहा, बल्कि यह कि जवाबों के साथ कोई कार्ययोजना या समयसीमा नहीं आई, जिसके सामने रखकर मंत्रालय खुद भी प्रगति नाप सके।
निष्कर्षों के नीचे का निष्कर्ष
रिपोर्ट के अपने दो कॉलम साथ पढ़िए तो दिक्कत पैसे की नहीं दिखती। यात्री सुविधाओं के बजट अनुदान 2019-20 से 2023-24 के बीच 36 से 44 प्रतिशत तक कम इस्तेमाल हुए। इसी दौर में जिन 395 सुविधा-कार्यों की समयबद्धता देखी गई, उनमें से 59 प्रतिशत एक साल से लेकर चार साल से भी ज़्यादा देर से चले, और 41 प्रतिशत समय पर पूरे हुए। कोई कार्यक्रम एक साथ धन की कमी और मौजूद धन खर्च न कर पाने, दोनों में नहीं हो सकता। यह जोड़ी नियोजन और क्रम की अड़चन बताती है।
जो मशीनरी इसे पहले पकड़ लेती, वह घूमना बंद कर चुकी थी। लेखा-परीक्षा दर्ज करती है कि 2022-24 के दौरान किसी भी ज़ोनल रेलवे में ज़ोनल और मंडल रेल उपयोगकर्ता परामर्शदात्री समिति की बैठकें तय आवृत्ति पर नहीं हुईं। कई A1 और A श्रेणी स्टेशनों पर सेवा सुधार समूह के निरीक्षण भी नहीं हुए। मार्च 2024 तक किसी ज़ोनल रेलवे ने सुविधाओं और स्वच्छता पर स्टेशन-दर-स्टेशन वेबपेज चालू नहीं किए थे, जिनका निर्देश उसे मिल चुका था।
रिपोर्ट की स्थिति
ये संसद में रखी गई रिपोर्ट के अंतिम निष्कर्ष हैं, मसौदा पैराग्राफ़ नहीं। रेल मंत्रालय अपना जवाब दे चुका है और वह रिकॉर्ड पर है। रिपोर्ट पर अभी किसी संसदीय समिति की राय नहीं आई, और इस ब्योरे में किसी समिति का मत नहीं है।
लेखा-परीक्षा की अपनी सिफ़ारिशें
● तय समयसीमा में सभी स्टेशनों पर न्यूनतम आवश्यक सुविधा के मानक पूरे हों
● बाक़ी सुविधाओं के लिए स्टेशन-दर-स्टेशन समयबद्ध कार्ययोजना बने और लागू हो
● दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के सुगम्यता प्रावधान लागू हों
● स्वच्छता और कचरा प्रबंधन मजबूत हो, ताकि सुविधाएँ चौबीसों घंटे चालू रहें
● एकसमान पेयजल गुणवत्ता प्रोटोकॉल के हर मानक पर जाँच की तय प्रक्रिया का पालन हो
● परामर्शदात्री समितियों और सेवा सुधार समूहों का नियमित कामकाज बहाल हो
● यात्री से जुड़ी निगरानी मजबूत हो — कूड़े पर रोक, शिकायत निवारण, शिकायत रजिस्टर का प्रचार
ब्लिट्ज़ की सलाह
शुरुआत कैलेंडर से कीजिए, क्योंकि वह मुफ़्त है। ज़ोनल और मंडल परामर्शदात्री समितियों की बैठकें तय आवृत्ति पर लौटाना और A1 और A श्रेणी स्टेशनों पर सेवा सुधार समूह के निरीक्षण बहाल करना पूँजी नहीं, एक डायरी माँगता है। सातों सिफ़ारिशों में यह सबसे सस्ती है और बाक़ी छह को सामने भी यही लाएगी।
वेबपेज चालू कीजिए। हर स्टेशन को क्या मिलना चाहिए, यह छप जाए तो लेखा-परीक्षा का पैराग्राफ़ ऐसी जाँच बन जाता है जो कोई भी यात्री खुद कर सकता है। निर्देश पहले ही जारी है, इसे नए फ़ैसले की नहीं, अमल की ज़रूरत है।
पीने के पानी को पहले रखिए। पाँचवीं सिफ़ारिश सिर्फ़ उस प्रोटोकॉल के पालन की माँग करती है जो पहले से मौजूद है। लेखा-परीक्षा ने कुल कोलीफ़ॉर्म और एशेरिकिया कोलाई पकड़े हैं, इसलिए यह रिपोर्ट का सबसे तुरंत करने लायक और सबसे ज़रूरी काम है।
और हर स्टेशन को तारीख़ वाली योजना दीजिए। मंत्रालय के जवाब एस्केलेटर और लिफ़्ट पर असली काम दिखाते हैं, पर उसे नापने के लिए कोई समयसीमा साथ नहीं है। स्टेशन-दर-स्टेशन समयबद्ध योजना छप जाए तो मंत्रालय अपनी प्रगति सबूत के साथ बता सकेगा। लेखा-परीक्षा के निष्कर्ष का जवाब यही होता है, रियायत नहीं।
CSIR-NAL ने सामने रखे तीन स्वदेशी जेट इंजन
रिसर्च डेस्क। छोटे गैस टरबाइन इंजनों का एक परिवार, और प्रयोगशाला के अपने डेटाशीट से यह साफ़ कि कौन-सा कितनी दूर पहुँचा है।
भारत ड्रोन का ढाँचा तो देश में बनाने लगा है, पर उसे उड़ाने वाला इंजन अब तक बाहर से आता रहा है। CSIR-राष्ट्रीय एयरोस्पेस प्रयोगशाला ने 25 अगस्त 2026 को तीन स्वदेशी गैस टरबाइन इंजन सामने रखे।
बेंगलुरु की इस प्रयोगशाला ने तीनों इंजन नई दिल्ली में CSIR मुख्यालय में प्रदर्शित किए, जहाँ एकीकृत रक्षा स्टाफ़ के प्रमुख एयर मार्शल तेजिंदर सिंह मौजूद थे। विज्ञान और टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने ब्योरा उसी दिन जारी किया। तीनों एक बढ़ती हुई थ्रस्ट सीढ़ी हैं — NJ-05 का थ्रस्ट 5 किलोग्राम, NJ-50 का 50 किलोग्राम और NJ-100 का 100 किलोग्राम।
ये विमान इंजन उस अर्थ में नहीं हैं जिसमें यात्री या लड़ाकू विमान के इंजन होते हैं। ये वे प्रणोदन इकाइयाँ हैं जो जेट से चलने वाले लक्ष्य ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन, ड्रोन इंटरसेप्टर या छोटी मिसाइल के भीतर बैठती हैं। भीतर एक कंप्रेसर, एक दहन कक्ष और एक टरबाइन होते हैं, जो कॉफ़ी के मग जितने चौड़े खोल में करीब एक लाख चक्कर प्रति मिनट पर घूमते हैं। विज्ञप्ति के मुताबिक इंजीनियरिंग तेज़ गति की टर्बोमशीनरी और ऊँचे तापमान के दहन में है।
तकनीकी प्रस्तुति प्रयोगशाला के आर. प्रतापनायक ने दी। निदेशक अभय ए. पशिलकर ने कहा कि एयरोस्पेस स्टार्टअप समेत भारतीय उद्योग में इन इंजनों को बड़े पैमाने पर बनाने की क्षमता है। मूल परिषद की महानिदेशक एन. कलैसेल्वी हैं।
डेटाशीट क्या जोड़ता है
PIB की विज्ञप्ति सिर्फ़ थ्रस्ट बताती है। प्रयोगशाला का अपना डेटाशीट NJ-5 के लिए है — यही वह इंजन है जिसे PIB NJ-05 लिखता है, क्योंकि 50 न्यूटन करीब 5.1 किलोग्राम-बल होता है — और वह विनिर्देश के साथ स्थिति भी बताता है। यह इंजन 50 न्यूटन डिज़ाइन और 75 न्यूटन अधिकतम थ्रस्ट देता है और 1,00,000 चक्कर प्रति मिनट पर चलता है। इसका दाब अनुपात (pressure ratio) 2.0 है, द्रव्यमान प्रवाह 0.20 किलोग्राम प्रति सेकंड और विशिष्ट ईंधन खपत (specific fuel consumption) 0.234 किलोग्राम प्रति न्यूटन-घंटा — यह सब 116 मिलीमीटर के खोल में 1.2 किलोग्राम वज़न के साथ। डेटाशीट इसे तकनीकी तैयारी स्तर (technology readiness level) 9 पर दर्ज करता है — विकास पूरा, उड़ान में परखा, उत्पादन के लिए तैयार। यह 2019 से 2022 के बीच विकसित हुआ और इसका व्यावसायीकरण “प्रगति पर” है।
यह स्थिति तीनों में से सबसे छोटे इंजन की है और किसी और की नहीं। NJ-50 और NJ-100 के लिए किसी दस्तावेज़ में न कोई परीक्षण रिकॉर्ड है, न सहनशक्ति का आँकड़ा, न तैयारी स्तर। उड़ान में परखे जाने का दावा इन दोनों पर नहीं ले जाया जा सकता।
इसी प्रयोगशाला के भीतर तुलना का एक और बिंदु है। CSIR-NAL का 50 न्यूटन श्रेणी का वाल्वरहित पल्सजेट, जो 2023 में विकसित हुआ, तैयारी स्तर 5 पर बैठा है — परखा हुआ, व्यावसायिक नहीं।
यह क्यों मायने रखता है
खाई खुद विकसित करने वाली प्रयोगशाला ने अपने पन्ने पर दर्ज की है: भारतीय बाज़ार में कोई स्वदेशी सूक्ष्म गैस टरबाइन उपलब्ध नहीं है। नीति ने एक दरवाज़ा बंद किया, दूसरा खुला छोड़ा। DGFT की अधिसूचना संख्या 54/2015-2020 ने 9 फ़रवरी 2022 से ड्रोन के CBU, CKD और SKD रूप में आयात पर रोक लगाई, अनुसंधान और रक्षा के लिए छूट रखी, पर कलपुर्ज़ों का आयात खुला रखा। यानी देश ने एयरफ़्रेम मँगाना बंद किया और प्रणोदन मँगाना जारी रखा।
जिस पारिस्थितिकी को यह इंजन परिवार सेवा देगा, वह गिनी जा सकती है। PIB के फ़रवरी 2026 के पृष्ठभूमि नोट में 9 फ़रवरी 2026 तक DGCA रजिस्टर पर 38,575 नागरिक ड्रोन, 39,890 प्रमाणित रिमोट पायलट, 244 मंजूर प्रशिक्षण संगठन और ड्रोन के लिए 120 करोड़ रुपये की उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन राशि दर्ज है।
जो इंजन अभी बाज़ार में है, उसकी पहचान भी साफ़ है। चेक गणराज्य की PBS अपना TJ40-G2 बेचती है — थ्रस्ट 395 से 425 न्यूटन, वज़न 3.80 किलोग्राम, सीमा-ऊँचाई 9,000 मीटर, ओवरहॉल के बीच 50 घंटे तक। यह सब निर्माता के अपने पन्ने पर है, और वह इसे PBS India के ज़रिये भारत में बेचती है। NJ-50 करीब 490 न्यूटन का है, यानी उसी श्रेणी का जो यहाँ पहले से बिक रही है।
जो अभी रिकॉर्ड पर नहीं
पैसा, पेटेंट और उत्पादन, तीनों खाली हैं। विज्ञप्ति, CSIR के ब्योरे या डेटाशीट में न कोई योजना है, न एजेंसी, न रकम। पेटेंट आवेदन, स्वीकृति, हस्तांतरण या लाइसेंसधारक कहीं दर्ज नहीं। न कोई साझेदार कंपनी नाम से है, न ऑर्डर, न समयसीमा।
सबसे ईमानदार अड़चन इंजन की उम्र है। इस श्रेणी के छोटे टर्बोजेट कम उम्र वाली चीज़ें होती हैं — सबसे नज़दीकी प्रकाशित तुलना ओवरहॉल के बीच 50 घंटे तक का समय बताती है — और CSIR-NAL तीनों में से किसी के लिए कोई उम्र नहीं बताता। दोनों बड़े इंजनों के लिए किसी अर्हता अभियान का रिकॉर्ड भी नहीं है, और प्रदर्शन अर्हता नहीं होता।
ब्लिट्ज़ की सलाह
तीनों इंजनों की तैयारी सीढ़ी छापिए। प्रयोगशाला यह काम NJ-5 के लिए पहले से अच्छे ढंग से करती है। NJ-50 और NJ-100 के लिए भी तैयारी स्तर, चले हुए घंटे, ऊँचाई और सहनशक्ति के आँकड़े आ जाएँ तो भारतीय एयरफ़्रेम इंटीग्रेटर इंतज़ार के बजाय उसी के हिसाब से डिज़ाइन कर सकेगा। इसमें एक डेटाशीट के सिवा कोई खर्च नहीं।
उम्र का आँकड़ा बताइए। ओवरहॉल के बीच का समय ही वह संख्या है जिस पर इस श्रेणी का खरीदार खरीद करता है। थ्रस्ट नहीं, इसी की गैरमौजूदगी खरीद आदेश को बाहर भेजती है।
कलपुर्ज़ों वाली खाई उसी क्रम में बंद कीजिए जिसमें वह खुली थी। 2022 की अधिसूचना ने ड्रोन आयात पर रोक लगाते हुए कलपुर्ज़े खुले रखे, और जिस उद्योग के पास इंजन ही नहीं था, उसके लिए वही सही क्रम था। अब जब इंजन परिवार तैयारी तक पहुँच रहा है, रक्षा उत्पादन विभाग और नागरिक विमानन मंत्रालय के पास खरीद में प्रणोदन-सामग्री की शर्त चरणबद्ध ढंग से जोड़ने का आधार है। मोहलत इतनी हो कि साझेदार लाइन खड़ी कर सके।
साझेदार का नाम सामने लाइए। अपने व्यय-योग्य टर्बोजेट पर DRDO के गैस टरबाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान का किसी निजी परिशुद्धता-इंजीनियरिंग कंपनी के साथ चला रास्ता इसका खाका है। बनाने की क्षमता अनुबंध नहीं होती, और इन दोनों के बीच की दूरी में ही 2022 का तैयारी स्तर 9 अब तक बैठा है।
चूहों में फ़ोन ने पढ़ा अल्ज़ाइमर का संकेत
रिसर्च डेस्क। बेंगलुरु की प्रयोगशाला का प्रतिदीप्त अणु और स्मार्टफ़ोन रीडर, और यह ठीक-ठीक कि अब तक क्या दिखाया गया है और क्या नहीं।
बेंगलुरु की एक प्रयोगशाला का बनाया अणु अल्ज़ाइमर-मॉडल चूहों के सीरम में एमिलॉयड-बीटा का बोझ पकड़ लेता है, और उसे पढ़ने वाला यंत्र एक स्मार्टफ़ोन है। यह काम अब तक चूहों तक सीमित है।
किसी जीवित इंसान में एमिलॉयड का जमाव पक्का करने के लिए पॉज़िट्रॉन उत्सर्जन टोमोग्राफ़ी स्कैन या चुंबकीय अनुनाद प्रतिबिंब चाहिए — मशीनें जो देश के गिने-चुने अस्पतालों में हैं और ज़्यादातर परिवारों की पहुँच से बाहर। जवाहरलाल नेहरू सेंटर फ़ॉर एडवांस्ड साइंटिफ़िक रिसर्च (JNCASR), बेंगलुरु के एक समूह ने ठीक इसी अड़चन पर काम प्रकाशित किया है।
अणु का नाम TZ-48 है। यह तब तक अँधेरा रहता है जब तक एमिलॉयड-बीटा तंतुओं से जुड़ न जाए, और जुड़ते ही चमकने लगता है। दो गुण इसे साधारण अभिरंजक से आगे ले जाते हैं। यह सिर्फ़ चमकीला नहीं होता, अपना प्रतिदीप्ति जीवनकाल (fluorescence lifetime) बदल देता है — वह अरबवें हिस्से जितना समय जिसमें उसकी चमक बुझती है। यह हस्ताक्षर इससे स्वतंत्र रहता है कि अणु कितना डाला गया या रंग कितना फीका पड़ा। दूसरा, यह रक्त-मस्तिष्क अवरोध (blood-brain barrier) पार कर लेता है, इसलिए इसे स्लाइड पर ही नहीं, जीवित प्राणी में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
अणु के ऊपर समूह ने ADxFluor नाम का एक स्मार्टफ़ोन रीडर बनाया है। फ़ोन का कैमरा सीरम के नमूने में अणु की प्रतिक्रिया पकड़ता है और एक ऐप उसे एमिलॉयड-बीटा के बोझ के आँकड़े में बदल देता है।
यह काम ACS Chemical Neuroscience में 18 जून 2026 को ऑनलाइन आया और 5 अगस्त 2026 के अंक में छपा। इसके छह लेखक बेंगलुरु के इसी केंद्र में हैं — क्रिथी के. भागवत, मधु रमेश, योगेंद्र कुमार, सब्यसाची मंडल, हिरियक्कनवर इला और संवाददाता लेखक टी. गोविंदराजू, जो वहाँ न्यू केमिस्ट्री यूनिट के अध्यक्ष हैं और बायोऑर्गेनिक केमिस्ट्री लैब चलाते हैं। विज्ञान और टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने इसका ब्योरा 25 अगस्त 2026 को जारी किया।
पेपर क्या साबित करता है
प्रकाशित सार में आँकड़े दर्ज हैं। TZ-48 का वियोजन स्थिरांक (dissociation constant) 41 नैनोमोल प्रति लीटर और संसूचन सीमा (limit of detection) 68 नैनोमोल प्रति लीटर बताई गई है। सार में लक्ष्य से इतर अणुओं के मुकाबले चयनात्मकता, जमाव की वास्तविक समय में निगरानी और रक्त-मस्तिष्क अवरोध पार करना दर्ज है। इसके साथ अल्ज़ाइमर-मॉडल चूहों के मस्तिष्क में एमिलॉयड बोझ की शुरुआती पहचान और अवस्था-निर्धारण भी, और सीरम में वह मात्रात्मक पहचान जो अल्ज़ाइमर-मॉडल चूहों को स्वस्थ चूहों से अलग करती है।
जीवित शरीर में जो कुछ दिखाया गया है, वह पूरा का पूरा चूहों में है। सार में न कोई मानव रोगी है, न मानव समूह, न किसी नैदानिक संदर्भ मानक के मुकाबले संवेदनशीलता या विशिष्टता, और न एमिलॉयड इमेजिंग से कोई तुलना। यह न इलाज है, न इस समय उपलब्ध कोई जाँच।
चूहे के सीरम और इंसान के सीरम के बीच की दूरी भी दर्ज करनी चाहिए। बीच में मानव रक्त प्रोटीनों का हस्तक्षेप, उम्र और दूसरी बीमारियों का असर, और किसी स्वीकृत मानक के मुकाबले परखा गया सत्यापन समूह खड़ा है। 68 नैनोमोल प्रति लीटर की संसूचन सीमा ठीक वही जगह है जहाँ यह सवाल तय होगा, क्योंकि मानव रक्त में एमिलॉयड-बीटा इससे कहीं कम सांद्रता पर घूमता है। बाहर की पेशेवर स्थिति भी यही है। 16 मई 2025 को अमेरिका ने अल्ज़ाइमर की पहचान के लिए अपनी पहली रक्त-आधारित जाँच को मंजूरी दी, जो लक्षण दिखा रहे 50 साल और उससे ऊपर के वयस्कों के लिए है। तब भी अल्ज़ाइमर एसोसिएशन का बयान यही था कि इस बीमारी की पहचान के लिए कोई अकेली स्वतंत्र जाँच नहीं है।
भारत में यह क्यों मायने रखता है
यहाँ डिमेंशिया बड़ा है, कम पहचाना जाता है और देर से पहचाना जाता है। अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के फ़ोगार्टी इंटरनेशनल सेंटर ने 13 जनवरी 2023 को प्रकाशित एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन के हवाले से यह आँकड़ा दिया। 60 साल और उससे ऊपर के 8.8 मिलियन भारतीय डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं, यानी इस आयु वर्ग में 7.4 प्रतिशत। यह अनुमान भारत में वृद्धावस्था के दीर्घकालिक अध्ययन के 2,528 प्रतिभागियों की नैदानिक सर्वसम्मत रेटिंग पर टिका है, जिसे 28,949 वरिष्ठ नागरिकों पर मॉडल किया गया। देर इसलिए होती है कि पुष्टि की मशीन दुर्लभ है। फ़ोन से पढ़ी जाने वाली सीरम जाँच, अगर इंसानों में सत्यापित होती है, इसी अड़चन को छूती है।
जो दर्ज नहीं है
● पैसा: पेपर के वित्तपोषण रिकॉर्ड में चार संस्थाएँ हैं — भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), अनुसंधान नेशनल रिसर्च फ़ाउंडेशन (ANRF), वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद, और बेंगलुरु का यह केंद्र। कोई रकम दर्ज नहीं
● पेटेंट: TZ-48 या ADxFluor के लिए कोई पेटेंट आवेदन, स्वीकृति, तकनीक हस्तांतरण या लाइसेंसधारक विज्ञप्ति, मंत्रालय के ब्योरे या लेख के मेटाडेटा में नहीं है
● मानव परीक्षण: कोई मानव सत्यापन अध्ययन, नैदानिक साझेदार, अस्पताल समूह, नियामक रास्ता या समयसीमा कहीं दर्ज नहीं
● नियामक: भारत में इन-विट्रो नैदानिक उत्पाद के लिए चिकित्सा उपकरण नियमों के तहत CDSCO का लाइसेंस चाहिए, और कोई आवेदन रिकॉर्ड पर नहीं
● अलग अणु: इसी प्रयोगशाला का इलाज वाला उम्मीदवार TGR63 उसके संकाय पन्ने पर एक दवा कंपनी के साथ नैदानिक अध्ययन में बताया गया है, पर वह दूसरा अणु है और TZ-48 के बारे में कुछ नहीं कहता
ब्लिट्ज़ की सलाह
मानव सत्यापन समूह के लिए पैसा अभी दीजिए, अगले पेपर के बाद नहीं। इस नतीजे और किसी काम लायक भारतीय जाँच के बीच एक ही कदम है — पर्याप्त आकार का मानव सीरम अध्ययन, जो किसी स्वीकृत संदर्भ मानक के मुकाबले परखा गया हो। ICMR और ANRF रसायन के लिए पैसा दे चुके हैं, और यह समूह खोज के मुकाबले छोटी माँग है।
प्रयोगशाला को किसी मेमोरी क्लिनिक से जोड़िए। संज्ञानात्मक विकारों के क्लिनिक चलाने वाले संस्थानों के पास वही संचित सीरम और वही नैदानिक अवस्था-निर्धारण है जो सत्यापन अध्ययन को चाहिए। नाम से एक अस्पताल साझेदार इसमें कई साल बचा देगा, और वित्तपोषकों को इसका कोई खर्च नहीं देना।
पेटेंट की स्थिति दाख़िल कीजिए और बता भी दीजिए। जिस नैदानिक मंच की बौद्धिक संपदा की स्थिति दर्ज न हो, उस पर कोई दूसरा देश निर्माण कर सकता है। पेपर के साथ दाख़िले की स्थिति छापना सामान्य चलन है, और लाइसेंस लेने वाला साझेदार सबसे पहले यही पूछता है।













