ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।एमबीबीएस सीटों का आँकड़ा हर जगह छपता है। पीजी सीटों का नहीं छपता — और असल में ज़िला अस्पताल में डॉक्टर मिलेगा या नहीं, यह वही तय करता है।
सरकार ने 7 अगस्त 2026 को लोकसभा में बताया कि देश में अब 846 मेडिकल कॉलेज और 1,39,864 एमबीबीएस सीटें हैं। 2014 से पहले ये आँकड़े 387 कॉलेज और 51,348 सीटें थे। यानी 88,516 सीटें जुड़ीं और क्षमता 2.72 गुना हुई।
अब वह नंबर जो कम चर्चा में आता है। पीजी यानी स्नातकोत्तर मेडिकल सीटें 31,185 से बढ़कर 86,360 हो गई हैं — 55,175 सीटों की बढ़ोतरी और 2.77 गुना का इज़ाफ़ा। ग़ौर कीजिए, यह एमबीबीएस के 2.72 गुना से थोड़ा ज़्यादा है। बड़ी बात यह है कि पिछले तीन दशक में ज़्यादातर वक़्त उलटा चलता रहा — देश डॉक्टर तेज़ी से बनाता रहा और विशेषज्ञ धीरे-धीरे।
फ़ाइल तस्वीर। पुराने दौर के एक मेडिकल कॉलेज का बैच। देश के मेडिकल कॉलेज 387 से बढ़कर 846 हो चुके हैं। घोषित अपवाद, परिपत्र BIMG/CIR/2026/02 के अंतर्गत: 7 अगस्त 2026 के संसदीय उत्तर के साथ कोई कार्यक्रम-चित्र नहीं है, इसलिए फ़ाइल चित्र।
एमबीबीएस सीट से देश को डॉक्टर मिलता है। पीजी सीट से विशेषज्ञ मिलता है — और ज़िला अस्पताल विशेषज्ञ से चलता है, डॉक्टर से नहीं।
एक नज़र में
• मेडिकल कॉलेज: 846, पहले 387 — 459 की बढ़त
• एमबीबीएस सीटें: 1,39,864, पहले 51,348 — 88,516 की बढ़त, 2.72 गुना
• पीजी सीटें: 86,360, पहले 31,185 — 55,175 की बढ़त, 2.77 गुना
• एम्स: 20 चालू, 6 और निर्माणाधीन
• दाख़िला: 2026-27 में सभी एम्स में एमबीबीएस दाख़िला नीट से
• स्रोत: लोकसभा में सरकार का उत्तर, 7 अगस्त 2026
नीट देने वाले छात्र और उसके माता-पिता के लिए तीन काम की बातें। पहली — यह बढ़ोतरी ज़्यादातर नए कॉलेज खुलने से आई है, पुराने कॉलेजों में सीटें बढ़ने से नहीं। इसका मतलब यह कि जो सीट मिलेगी, अच्छी संभावना है कि वह कॉलेज उम्मीदवार से भी नया हो। यह ख़राब बात नहीं है — हर पुराना कॉलेज कभी नया था — पर इससे सवाल बदल जाते हैं। कॉलेज का नाम मत पूछिए; फ़ैकल्टी कितनी है, अस्पताल में कितने बिस्तर हैं और मरीज़ कितने आते हैं, यह पूछिए। मेडिकल की पढ़ाई किताब से नहीं, वार्ड से होती है।
दूसरी — 2026-27 सत्र के लिए सभी एम्स में एमबीबीएस दाख़िला नीट से ही होगा। अलग से कोई प्रवेश परीक्षा नहीं है, इसलिए तैयारी की योजना उसी हिसाब से बनाइए। तीसरी — 20 एम्स चालू हैं और छह और बन रहे हैं, यानी अच्छे संस्थानों का नक़्शा अब भी बदल रहा है। किस राज्य से कोशिश करनी है, यह फ़ैसला इस साल की सीट मैट्रिक्स देखकर कीजिए, दस साल पुरानी सुनी-सुनाई साख के भरोसे नहीं।
आगे का असली काम तीसरी चीज़ से जुड़ा है, जो न कॉलेज है न सीट — शिक्षक। हर नए मेडिकल कॉलेज को इमारत से पहले पढ़ाने वाले चाहिए, और पढ़ाने वाले उसी पीजी व्यवस्था से निकलते हैं जिसके आँकड़े अभी आए हैं। इसलिए पीजी का एमबीबीएस से थोड़ा आगे निकलना अच्छा संकेत है — यही वह क्रम है जिससे अगले दौर के कॉलेजों में शिक्षक मिल पाएँगे। बचा हुआ काम एक ही है: हर कॉलेज की स्वीकृत और भरी हुई फ़ैकल्टी की संख्या सार्वजनिक हो जाए। बस यही एक जानकारी है जिससे कोई परिवार नए संस्थान को प्रॉस्पेक्टस से नहीं, सबूत से परख सकेगा।













