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एच-1बी पर एक लाख डॉलर की नई फ़ीस का प्रस्ताव

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 26, 2026
in the blitz
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भारत उच्च शिक्षा

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।अमेरिका ने हर एच-1बी अर्ज़ी पर 1,03,265 डॉलर की अतिरिक्त फ़ीस का प्रस्ताव रखा है। भारतीय पेशेवरों के लिए रकम से ज़्यादा अहम यह है कि यह फ़ीस कब ली जाएगी।

अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने प्रस्ताव रखा है कि कैप के दायरे में आने वाली हर एच-1बी अर्ज़ी पर मौजूदा सभी शुल्कों के ऊपर 1,03,265 डॉलर की अतिरिक्त फ़ीस ली जाए — उच्च डिग्री वालों की अर्ज़ियों पर भी। विभाग के मुताबिक यह रकम अर्ज़ी दाख़िल करते समय देनी होगी, और 85,000 अर्ज़ियों के अनुमान पर इससे साल में करीब 8.8 अरब डॉलर जुटेंगे। ब्लिट्ज़ ने यह गणित ख़ुद जाँचा — 85,000 × 1,03,265 डॉलर = 8.78 अरब डॉलर। आँकड़ा सही बैठता है।

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बड़ी बात यह है कि फ़ीस लॉटरी से पहले लगेगी। यानी कंपनी को पैसा तब देना होगा जब यह तय भी नहीं है कि उसकी अर्ज़ी चुनी जाएगी या नहीं। बड़ी कंपनियाँ सैकड़ों अर्ज़ियों में यह जोखिम बाँट सकती हैं; छोटी कंपनियाँ, स्टार्टअप और अस्पताल नहीं बाँट सकते। इसलिए असर सबसे पहले उन नौकरियों पर पड़ेगा जो छोटी कंपनियाँ देती थीं।

असर कहाँ पड़ेगा। भारत का एक आईटी परिसर। अर्ज़ी के वक़्त ली जाने वाली फ़ीस का बोझ छोटी कंपनियों पर सबसे ज़्यादा पड़ता है — और उन्हीं के ज़रिए मिलने वाली नौकरियों पर भी।

छूट की सूची पढ़िए तो मंशा समझ आती है। विश्वविद्यालय और शोध संस्थान इस फ़ीस से बाहर हैं। यह पढ़ाई पर नहीं, व्यावसायिक भर्ती पर शुल्क है।

एक नज़र में

• प्रस्तावित फ़ीस: 1,03,265 डॉलर प्रति कैप-अधीन एच-1बी अर्ज़ी
• कब देनी होगी: अर्ज़ी दाख़िल करते समय, बाक़ी सभी शुल्कों के ऊपर
• DHS का अनुमान: करीब 8.8 अरब डॉलर सालाना, 85,000 अर्ज़ियों पर
• ब्लिट्ज़ की जाँच: 8.78 अरब डॉलर — अनुमान सही
• छूट किसे: विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षा संस्थान और कुछ शोध संस्थानों की अर्ज़ियाँ
• स्थिति: यह अभी प्रस्ताव है, लागू नियम नहीं

भारतीय छात्रों और परिवारों के लिए इसका सीधा मतलब क्या है? अमेरिका में पढ़ाई ख़त्म करने के बाद विश्वविद्यालय और उससे जुड़े अस्पताल-शोध संस्थान का रास्ता पहले जैसा ही रहेगा, क्योंकि वे इस फ़ीस से बाहर हैं। पर मँझोली निजी कंपनियों तक पहुँचना मुश्किल होगा। यानी रास्ता बंद नहीं हुआ, संकरा हुआ है — और अब वह कुछ ही तरह के नियोक्ताओं से होकर जाता है।

दूसरी तरफ़ एक दरवाज़ा उसी महीने चौड़ा हुआ है। भारत-ब्रिटेन दोहरा अंशदान समझौता (DCC) 15 जुलाई 2026 से लागू है, जिसके बाद ब्रिटेन में अस्थायी तैनाती पर गए भारतीय पेशेवरों और उनकी कंपनियों को सामाजिक सुरक्षा अंशदान दो बार नहीं देना पड़ता, और यह छूट अब तीन साल की जगह पाँच साल की है। वाणिज्य मंत्रालय का अनुमान है कि इससे 75,000 से ज़्यादा भारतीय पेशेवरों और 900 से ज़्यादा कंपनियों को फ़ायदा होगा। सीधी बात यह है कि विदेश में काम का रास्ता अब एक देश पर टिका नहीं रहना चाहिए। जिनकी योजना अमेरिका की है, वे प्रस्ताव पर टिप्पणी की अवधि और अंतिम नियम का इंतज़ार करें; और ब्रिटेन, यूरोप, जापान और खाड़ी के विकल्प भी साथ में देखते चलें।

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