ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। धान की अच्छी पैदावार के लिए नाइट्रोजन सबसे जरूरी पोषक तत्वों में से एक है और यूरिया इसका सबसे प्रमुख स्रोत माना जाता है। फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. हादी हुसैन के अनुसार, सही समय और सही मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल करने से धान के पौधे मजबूत होते हैं, पत्तियां हरी-भरी रहती हैं और कल्लों से लेकर दानों के विकास तक बेहतर परिणाम मिलते हैं। हालांकि, ज्यादा मात्रा में यूरिया का उपयोग फसल और मिट्टी, दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
नाइट्रोजन सबसे मुख्य पोषक तत्व
डॉ हादी हुसैन ने बताया कि धान की फसल के उचित विकास और बेहतर पैदावार के लिए नाइट्रोजन सबसे मुख्य पोषक तत्व माना जाता है। यूरिया में लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन पाई जाती है, जो पौधों के लिए एक प्राथमिक भोजन का काम करती है। जब खेतों में यूरिया डाला जाता है, तो यह मिट्टी की नमी में घुलकर सूक्ष्मजीवों की मदद से अमोनियम और नाइट्रेट में बदल जाता है। इसी रूप में धान की जड़ें नाइट्रोजन को आसानी से अवशोषित करती हैं।
अमोनियम रूप को बहुत आसानी से सोखता है पौधा
धान की फसल जलमग्न खेत में उगाई जाती है, जहां यूरिया का अवशोषण विशेष प्रक्रिया द्वारा होता है। मिट्टी में घुलने के बाद यूरीएज एंजाइम यूरिया को अमोनियम कार्बोनेट में परिवर्तित करता है। धान का पौधा अमोनियम रूप को बहुत आसानी से और तेजी से सोखता है। यह रासायनिक परिवर्तन पौधों की कोशिकाओं तक पहुंचकर उनके जैविक कार्यों को सक्रिय करता है। समय पर मिला यह नाइट्रोजन धान के पौधों को शुरुआती अवस्था से ही मजबूत और निरोग बनाने में मदद करता है।
पत्तियों में क्लोरोफिल बनाने का मुख्य आधार
नाइट्रोजन पौधों की पत्तियों में क्लोरोफिल बनाने का मुख्य आधार है। जब धान के पौधों को यूरिया के माध्यम से पर्याप्त नाइट्रोजन मिलती है, तो पत्तियों में क्लोरोफिल का स्तर काफी बढ़ जाता है। इससे पत्तियां गाढ़ी हरी और चौड़ी हो जाती हैं। अधिक क्लोरोफिल होने से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया तेज होती है, जिससे पौधे अधिक मात्रा में भोजन बनाते हैं। नतीजा यह होता है कि पौधे तेजी से बढ़ते हैं और उनकी जीवन शक्ति बनी रहती है।
यूरिया पौधों के कोशिकीय विभाजन को बढ़ाता है
फसल की मजबूती उसके तने और जड़ों की बनावट पर निर्भर करती है। यूरिया पौधों के कोशिकीय विभाजन को बढ़ावा देता है, जिससे तना मोटा और मजबूत बनता है। मजबूत तने के कारण तेज हवा या बारिश में फसल के गिरने की संभावना काफी कम हो जाती है। इसके साथ ही, प्राथमिक अवस्था में यूरिया मिलने से जड़ों का फैलाव गहराई तक होता है, जिससे पौधे मिट्टी से अन्य आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों और पानी को आसानी से सोख पाते हैं।
कल्ले फूटने की अवस्था बहुत महत्वपूर्ण
धान की खेती में कल्ले फूटने की अवस्था बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। रोपाई के दो से तीन सप्ताह बाद यूरिया देने से पौधों में शाखाओं और कल्लों की संख्या में भारी वृद्धि होती है। जितने ज्यादा स्वस्थ कल्ले निकलेंगे, फसल में बालियों की संख्या भी उतनी ही अधिक होगी। इसके बाद बालियां बनते समय दिया गया यूरिया दानों का आकार बड़ा करने, उनमें चमक लाने और उनका वजन बढ़ाने में प्रत्यक्ष रूप से मदद करता है।
धान में यूरिया का छिड़काव कितना
धान में यूरिया का छिड़काव एक बार में करने के बजाय तीन अलग-अलग किस्तों में करना सबसे अधिक फायदेमंद रहता है। पहली खुराक रोपाई के समय, दूसरी खुराक कल्ले निकलते समय और तीसरी खुराक बालियां बनने की शुरुआती अवस्था में देनी चाहिए। यूरिया हमेशा खेत में हल्की नमी होने पर ही छिड़कना चाहिए। यदि खेत में बहुत अधिक पानी भरा हो, तो पहले पानी निकाल देना चाहिए, ताकि यूरिया बहकर बर्बाद न हो और जड़ें इसे सोख सकें।
नीम-कोटेड यूरिया
पारंपरिक यूरिया की तुलना में नीम-कोटेड यूरिया धान की फसल के लिए अधिक फायदेमंद साबित हुआ है। नीम का तेल यूरिया के घुलने की गति को धीमा कर देता है, जिससे नाइट्रोजन धीरे-धीरे और लंबे समय तक पौधों को मिलती रहती है। इससे नाइट्रोजन का वाष्पीकरण और पानी के साथ बहकर नुकसान होना काफी कम हो जाता है। इसके अलावा, नीम के प्राकृतिक गुणों के कारण मिट्टी में हानिकारक कीटों और रोगों का प्रकोप भी नियंत्रित रहता है।
यूरिया धान की फसल के लिए जितना फायदेमंद है, इसका अत्यधिक उपयोग उतना ही हानिकारक हो सकता है। जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से पौधा कोमल हो जाता है और उस पर कीट-पतंगों का हमला बढ़ जाता है।
इसलिए, मिट्टी की जांच करवाकर फास्फोरस और पोटाश के साथ संतुलित मात्रा में यूरिया का प्रयोग करना चाहिए। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता और किसान को न्यूनतम लागत में धान की अधिकतम उपज मिलती है।














