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विदेश में पढ़ाई चुनने वाले भारतीय छात्रों पर एनईपी का असर

- छात्रों की संख्या में भारी गिरावट विदेश में पढ़ाई के ट्रेंड में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 24, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) 2020 उन भारतीय छात्रों के फैसलों पर असर डालने लगी है जो पहले हायर एजुकेशन के लिए विदेश का रुख करते थे। ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन और शिक्षा मंत्रालय के सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि हायर एजुकेशन के लिए देश छोड़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में लगभग 31% की कमी आई है । 2023 में महामारी के बाद के सबसे ज्यादा स्तर 9.08 लाख से घटकर 2025 में यह संख्या लगभग 6.26 लाख हो गई है। हालांकि, लगभग 18.8 लाख भारतीय छात्र अभी भी विदेश में रह रहे हैं और पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन विदेश जाने वाले नए छात्रों की संख्या में भारी गिरावट पारंपरिक विदेश में पढ़ाई के ट्रेंड में एक बड़े बदलाव का संकेत देती है।

इस बदलाव के पीछे एक अहम वजह एनईपी 2020 के तहत भारत में हायर एजुकेशन के मौकों का बढ़ना है। इस पॉलिसी ने मल्टी-डिसिप्लिनरी एजुकेशन, फ्लेक्सिबल एकेडमिक रास्ते, स्किल-ओरिएंटेड प्रोग्राम, रिसर्च और इनोवेशन, इंटरनेशनल लेवल पर जुड़ाव और भारतीय व विदेशी संस्थानों के बीच बेहतर सहयोग को बढ़ावा दिया है। भारत में अच्छी क्वालिटी वाली यूनिवर्सिटीज, खास प्रोग्राम, इंटरनेशनल सहयोग और विदेशी यूनिवर्सिटी कैंपस के आने से छात्रों को देश में ही ज्यादा आकर्षक विकल्प मिल रहे हैं।

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साथ ही, छात्र और माता-पिता विदेश में पढ़ाई के खर्च और उससे मिलने वाले फायदे (आरओआई) को लेकर ज्यादा सावधान हो रहे हैं। ट्यूशन और रहने-सहने के बढ़ते खर्च, भारतीय रुपये की गिरती कीमत और विदेश में नौकरी को लेकर अनिश्चितता ने विदेश में पढ़ाई को काफी महंगा बना दिया है। जब भारत में ही वैसे ही प्रोग्राम और बेहतर करियर के मौके मिल रहे हों, तो पढ़ाई पर ₹30–50 लाख या उससे ज्यादा खर्च करने को सही ठहराना मुश्किल हो सकता है।

इमिग्रेशन पॉलिसी में बदलाव भी छात्रों की पसंद पर असर डाल रहे हैं। कनाडा, यूके और यूएस जैसे देशों ने वीजा, इमिग्रेशन या आश्रितों (डिपेंडेंट) से जुड़ी सख्त पॉलिसी लागू की हैं। नतीजतन, पहले जो उम्मीद थी कि विदेश में पढ़ाई करने से अपने आप नौकरी और स्थायी रूप से बसने का मौका मिल जाएगा, वह अब कम निश्चित होती जा रही है।

इससे छात्रों की सोच में एक अहम बदलाव आ रहा है। ज्यादा से ज्यादा छात्र अब विदेश में पढ़ाई को सफल करियर का एकमात्र रास्ता नहीं मान रहे हैं। इसके बजाय, कई छात्र यह सोच रहे हैं कि क्या वे भारत में ही अच्छी क्वालिटी वाली और ग्लोबल लेवल पर काम आने वाली शिक्षा पा सकते हैं, और साथ ही विदेश की महंगी ट्यूशन फीस, करेंसी रिस्क, वीजा की अनिश्चितता और घर से दूर रहने की सामाजिक कीमत से भी बच सकते हैं। इसलिए, विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में कमी को सिर्फ सख्त विदेशी नीतियों या आर्थिक दबावों का नतीजा नहीं माना जाना चाहिए। यह एनईपी 2020 के बढ़ते असर को भी दिखाता है, जो धीरे-धीरे भारतीय उच्च शिक्षा को ज़्यादा प्रतिस्पर्धी, लचीला, अंतरराष्ट्रीय और छात्र-केंद्रित बना रहा है।

इसका एक बड़ा और अहम संदेश है। एनईपी इस सोच को बदलने में मदद कर रही है कि बेहतर शिक्षा के लिए मैं विदेश कहां जाऊं? से बदलकर यह सवाल हो जाए कि क्या मुझे भारत में ही वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धी शिक्षा मिल सकती है? अगर भारतीय संस्थान गुणवत्ता, शोध, रोजगार की क्षमता और अंतरराष्ट्रीय अनुभव को बेहतर बनाते रहते हैं, तो ज्यादा छात्र उच्च शिक्षा के लिए देश छोड़ने के बजाय भारत में ही रहना पसंद कर सकते हैं।
इसलिए, भारत के सामने भविष्य की चुनौती सिर्फ छात्रों के विदेश जाने को कम करना नहीं है, बल्कि यह पक्क ा करना है कि घरेलू शिक्षा प्रणाली वह गुणवत्ता, इनोवेशन, वैश्विक अनुभव और करियर के अवसर दे, जिनकी तलाश में छात्र विदेश जाते हैं। एनईपी 2020 इस बदलाव को लाने के लिए एक जरूरी ढांचा प्रदान करती है।

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