दीपक द्विवेदी
नई दिल्ली।पुस्तक की भूमिका के शुरुआती पन्नों में ही राकेश द्विवेदी एक सहज लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देते हैं- सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने ब्रिटिश शासन और भारत के विभाजन के इतिहास पर इतना विस्तृत ग्रंथ लिखने की आवश्यकता क्यों महसूस की?
वे अत्यंत विनम्रता से लिखते हैं, “मैं इतिहासकार नहीं हूं; मैं पेशे से एक वकील हूं।”
पहली दृष्टि में यह वाक्य लेखक की विनम्रता का परिचायक लगता है, लेकिन जैसे-जैसे पुस्तक आगे बढ़ती है, स्पष्ट होता है कि यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता भी है।
इतिहासकार दस्तावेजों में दर्ज तथ्यों को समझने और उनके ऐतिहासिक संदर्भों की व्याख्या करने का प्रयास करता है, जबकि एक वकील उन्हीं दस्तावेजों को इस दृष्टि से परखता है कि वे क्यों तैयार किए गए, उनका वास्तविक उद्देश्य क्या था और वे वास्तव में किस सत्य की ओर संकेत करते हैं।
राकेश द्विवेदी का सबसे बड़ा योगदान कोई नया इतिहास गढ़ना नहीं है, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के आधिकारिक दस्तावेजों को एक अनुभवी अधिवक्ता की पैनी कानूनी दृष्टि से परखना है। उनकी यह विश्लेषणात्मक जिरह कई ऐसे दस्तावेजों की परतें खोलती है, जिन्हें अब तक निर्विवाद मान लिया गया था।
कानूनी दृष्टि से इतिहास की नई व्याख्या
पुस्तक के सबसे प्रभावशाली अध्यायों में लेखक की कानूनी समझ और विश्लेषण क्षमता पूरी मजबूती के साथ सामने आती है।
राकेश द्विवेदी वर्ष 1600 में ईस्ट इंडिया कंपनी को दिए गए शाही चार्टर को केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसकी कानूनी कसौटी पर जांच करते हैं। इसी दौरान वे एक ऐसे तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं जिस पर अधिकांश इतिहासकारों ने अपेक्षित गंभीरता से विचार नहीं किया।
चार्टर में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि किसी भी ईसाई शासक के क्षेत्र में उसकी अनुमति के बिना व्यापार नहीं किया जा सकता जबकि गैर-ईसाई क्षेत्रों के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था।
इतना ही नहीं, किले बनाने, बस्तियां बसाने और आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग करने की भी अनुमति दी गई थी लेकिन उसका लक्ष्य मुख्य रूप से गैर-ईसाई दुनिया थी।
इसी संदर्भ में राकेश द्विवेदी लिखते हैं-
“यह दरअसल धर्मयुद्ध (क्रूसेड) का ही एक नया स्वरूप था।”
यह निष्कर्ष किसी भावनात्मक प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों के गहन और तार्किक विश्लेषण पर आधारित है।
समुद्री कानून से साम्राज्यवादी राजनीति तक
लेखक प्रसिद्ध विधिवेत्ताओं ह्यूगो ग्रोटियस और जॉन सेल्डन के विचारों का भी अत्यंत रोचक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
वे ‘मारे लिबेरम’ और ‘मारे क्लॉजम’ को केवल राजनीतिक या दार्शनिक ग्रंथ नहीं मानते बल्कि अपने-अपने संरक्षकों के हितों की रक्षा के लिए तैयार किए गए कानूनी पक्ष-पत्रों के रूप में देखते हैं।
लेखक लिखते हैं-
“समुद्र की स्वतंत्रता का ग्रोटियस का सिद्धांत डच हितों के अनुकूल था, जबकि सेल्डन का तर्क ब्रिटेन को डचों के व्यापारिक लाभ अपने पक्ष में करने में मददगार साबित हुआ।” यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि उस दौर के कानूनी सिद्धांत भी साम्राज्यवादी राजनीति और राष्ट्रीय हितों से पूरी तरह अलग नहीं थे।
भारत के विभाजन को वैश्विक राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास
इस पुस्तक का मूल विचार यह है कि भारत का उपनिवेशीकरण और देश का विभाजन केवल भारत की आंतरिक राजनीतिक घटनाएं नहीं थीं।
राकेश द्विवेदी का मानना है कि ये दोनों घटनाएं उस दौर में विश्व की महाशक्तियों के बीच चल रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।
उनके अनुसार, ब्रिटिश नीति-निर्माताओं के निर्णय केवल लाहौर, दिल्ली या कराची को ध्यान में रखकर नहीं लिए जा रहे थे। उनकी रणनीतिक सोच का केंद्र मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और यूरेशिया के भू-राजनीतिक हित भी थे।
यही व्यापक दृष्टिकोण इस पुस्तक को भारत के विभाजन पर लिखी गई पारंपरिक पुस्तकों से अलग पहचान देता है और पाठक को इतिहास को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करता है।
इतिहास को नए नजरिए से समझने का प्रयास
राकेश द्विवेदी का उद्देश्य केवल स्थापित ऐतिहासिक धारणाओं को चुनौती देना नहीं है, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों का नए दृष्टिकोण से विश्लेषण करना है।
एक अधिवक्ता के रूप में वे हर दस्तावेज से प्रश्न पूछते हैं, हर दावे को तर्क और प्रमाण की कसौटी पर परखते हैं और पाठकों को भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अपनी स्वतंत्र राय बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। यही दृष्टिकोण इस पुस्तक को केवल इतिहास का विवरण नहीं रहने देता बल्कि इतिहास के दस्तावेजों, तथ्यों और स्थापित निष्कर्षों की गंभीर, निष्पक्ष और तार्किक पड़ताल में बदल देता है।
यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह पाठक को केवल इतिहास पढ़ने के लिए नहीं बल्कि इतिहास को नए दृष्टिकोण से समझने, प्रश्न करने और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वयं निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करती है।













