ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम की 436 बीघा से अधिक जमीन का स्वामित्व ग्राम पंचायत को बहाल कर दिया। शीर्ष अदालत ने 2007 में जमीन पर निजी स्वामित्व के दावों को मान्यता देने वाले पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को भी खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने गांव की साझा भूमि की अहमियत को हाई लाइट करते हुए गुरुग्राम में 436 बीघा से अधिक भूमि का मालिकाना हक ग्राम पंचायत को वापस दे दिया। शीर्ष अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 2007 के उस फैसले को रद कर दिया, जिसमें संबंधित भूमि पर निजी मालिकाना हक के दावों को स्वीकार कर लिया गया था।
जस्टिस संजय कुमार और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि भूमि को ‘नया सोना’ माना जाता है, खासकर तब, जब ऐसी भूमि गुरुग्राम जैसे तेजी से बढ़ते शहरी इलाकों के पास हो। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि विवादित भूमि हरियाणा कॉमन लैंड्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1961 के तहत गांव की साझा भूमि थी।
हाईकोर्ट का फैसला रद
पीठ ने हाईकोर्ट के 2007 के फैसले को रद कर दिया। पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि हाईकोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड में गांव की ‘पट्टियों'(मालिक समूहों) के नाम दर्ज होने के चलते भूमि को निजी मानकर भूल की थी।
हाईकोर्ट के फैसले को रद करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 13 सितंबर, 1955 को वजीराबाद ग्राम पंचायत के पक्ष में किए गए म्यूटेशन (मालिकाना हक के बदलाव) की पुष्टि कर दी है, जिसका फायदा उसके उत्तराधिकारी, नगर निगम, गुड़गांव (अब गुरुग्राम) को मिलेगा।
हैदरपुर की शामलात पट्टी का हिस्सा
शीर्ष अदालत ने कहा कि वादी 13 सितंबर, 1955 को वजीराबाद ग्राम पंचायत के पक्ष में किए गए म्यूटेशन में दखल देने के लिए कोई ठोस आधार पेश करने में नाकाम रहे। तथ्यों से पता चलता है कि संबंधित भूमि ‘शामलात पट्टी’ नहीं थी, बल्कि हैदरपुर की शामलात पट्टी का हिस्सा थी।
पंचायत के अधिकार में ऐसे आई
हालांकि मालिकों यानी चित्रू, रामरतन, मेधा, सदासुख और अहमद अली खान को अपने हिस्से के अनुसार बंटवारा कराने का अधिकार था, लेकिन 26 जनवरी 1950 से पहले ऐसा कोई बंटवारा नहीं हुआ। नतीजतन, 436 बीघा 18 बिस्वा की ‘शामिलात देह’ वैसी ही बनी रही, जिस पर 1961 के एक्ट की धारा 2(जी)(1) लागू हुई और वह वजीराबाद ग्राम पंचायत के अधिकार में आ गई।
क्या किया था दावा?
यह विवाद हैदरपुर के निर्जन गांव (जिसे बे-चिराग मौजा कहा जाता है) में 436 बीघा और 18 बिस्वा भूमि से जुड़ा था। यह गांव आज के गुरुग्राम में वजीराबाद से सटा हुआ है। गांव के कुछ लोगों ने भूमि पर मालिकाना हक का दावा करते हुए कहा था कि ‘भूमि निजी पट्टियों की थी और कभी भी पंचायत के अधिकार में नहीं आई थी।’














