विनोद शील
नई दिल्ली। पिछले कुछ सालों से (जब से विपक्ष सत्ता से बाहर है) लोकतंत्र की जननी कहे जाने वाले भारत में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना कुछ खास समूहों और वैचारिक संगठनों का स्थायी स्वभाव बन चुका है लेकिन जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प वैश्विक मंच से भारतीय चुनाव प्रणाली की खुलकर सराहना करते हैं तो भारत के भीतर बैठे संशयवादियों के नैरेटिव की चूलें हिल जाती हैं।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस अंतरराष्ट्रीय सराहना ने उन तत्वों को गहरे संकट और बेचैनी में डाल दिया है जिन्हें अक्सर देश की संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयासों के कारण ‘दिमागी नक्सल’ या ‘अर्बन नक्सल’ की संज्ञा दी जाती है।
ज्ञानेश कुमार का सवाल और अमेरिकी राजनीति में हलचल
डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका में कड़े चुनावी सुधारों और ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पारित कराने के समर्थन में भारत के चुनाव प्रबंधन को एक आदर्श वैश्विक बेंचमार्क के रूप में पेश किया है।
ट्रंप ने अपने पोस्ट में बताया कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से एक बेहद तार्किक और तीखा सवाल पूछा था: आप बिना किसी वैध फोटो आईडी के अमेरिका में चुनाव कैसे करा सकते हैं? ट्रम्प ने इस बात को रेखांकित किया कि भारत के पिछले आम चुनाव में 64.6 करोड़ (646 मिलियन) मतदाताओं ने हिस्सा लिया था जिनमें से 1% से भी कम लोगों ने डाक मतपत्र (पोस्टल बैलट) का उपयोग किया और प्रत्येक मतदाता के पास एक वैध फोटो पहचान-पत्र अनिवार्य रूप से मौजूद था। जब दुनिया की सबसे पुरानी और बड़ी महाशक्ति का राष्ट्रपति भारत की चुनावी प्रामाणिकता से सीख लेने की वकालत कर रहा हो तो वैश्विक मंच पर यह भारतीय नौकरशाही और प्रशासनिक व्यवस्था की बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है।
2024 के आम चुनाव के अभूतपूर्व आंकड़े और प्रबंधकीय कौशल
भारत का 2024 का आम चुनाव मानव इतिहास का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक आयोजन था जिसकी भव्यता और शुचिता को ट्रम्प के बयान ने पुन: प्रमाणित किया है। दिमागी नक्सलियों की ‘वोट चोरी’ वाली थ्योरी को ध्वस्त करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा प्रबंधित ये आंकड़े ही काफी हैं:
विशाल मतदाता आधार: देश भर में कुल 96.8 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता थे जिनमें से रिकॉर्ड 64.2 करोड़ से अधिक लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।
मतदान केंद्रों की विशाल श्रृंखला: देश के कोने-कोने में निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए 10.5 लाख से अधिक मतदान केंद्र बनाए गए थे।
सुरक्षा और पारदर्शिता: पूरी चुनावी प्रक्रिया में 55 लाख से अधिक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और वोटर वेरीफ़ाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल यानी (वीवीपैट या वीवीपीएट) का उपयोग किया गया। इस व्यवस्था के तहत वोटर को वोट डालने के तुरंत बाद कागज की एक पर्ची बनती है। इस पर जिस उम्मीदवार को वोट दिया गया है उनका नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है।
अधिकारियों की तैनाती: लगभग 1.5 करोड़ चुनाव कर्मियों और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया था ताकि बिना किसी हिंसा या धांधली के शांतिपूर्ण मतदान संपन्न कराया जा सके। इतने विशाल स्तर पर बिना किसी तकनीकी विफलता या बड़े विवाद के चुनाव कराना ज्ञानेश कुमार और उनकी टीम की असाधारण सफलता को दर्शाता है।
‘वोट चोरी’ और ‘ईवीएम विलाप’ करने वालों को करारा झटका
भारत में एक ऐसा तथाकथित बौद्धिक और राजनीतिक वर्ग सक्रिय है जिसका अस्तित्व ही देश की स्वायत्त संस्थाओं के प्रति जनता में अविश्वास पैदा करने पर टिका है। इन्हें ‘दिमागी नक्सली’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये जंगलों में हथियार लेकर नहीं लड़ते बल्कि वातानुकूलित कमरों में बैठकर देश की लोकतांत्रिक रीढ़ पर वैचारिक प्रहार करते हैं। हर चुनाव परिणाम के बाद इनका एक ही रोना होता है—ईवीएम हैक हो गई, जनादेश चुरा लिया गया। दिलचस्प बात यह है कि जब यही ईवीएम और यही चुनाव आयोग विपक्षी दलों को विभिन्न राज्यों में सत्ता दिलाते हैं, तब चुनावी तकनीक बिल्कुल पाक-साफ हो जाती है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पराजय मिलते ही ‘वोट चोरी’ का पुराना राग फिर से अलापा जाने लगता है। ट्रम्प के इस बयान ने इस दोहरे रवैये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेनकाब कर दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय चुनाव मशीनरी की विश्वसनीयता और मजबूती वैश्विक स्तर पर स्थापित तथ्य हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव व्यवस्था के खिलाफ दायर किए गए वादों को समय-समय पर खारिज कर दिया है।
दिमागी नक्सलियों की बेचैनी
अंतरराष्ट्रीय सराहना व ज्ञानेश कुमार के कड़े रुख से तथाकथित नैरेटिव-मेकर्स में मची बेचैनी के पीछे ठोस रणनीतिक कारण हैं:
वैश्विक कार्ड का फेल होना: ये समूह अक्सर विदेशी मीडिया, पश्चिमी विचारकों और मानवाधिकार संगठनों की आड़ लेकर भारत सरकार और भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं को वैश्विक मंचों पर घेरने की कोशिश करते थे। ट्रम्प जैसी शीर्ष वैश्विक हस्ती द्वारा भारतीय चुनाव प्रणाली को एक रोल मॉडल के रूप में पेश करने से इनका यह अंतरराष्ट्रीय कार्ड पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।
जनता के बीच साख का संकट: भारतीय मतदाता पहले ही चुनावों में भारी हिस्सेदारी दिखाकर इन ईवीएम-विरोधी और ‘संस्था-विरोधी’ विलापों को खारिज कर चुका है। अब जब वैश्विक स्तर पर भी भारत के चुनाव प्रबंधन की दृढ़ता (यूनिवर्सल फोटो आईडी) की तारीफ हो रही है, तो आम नागरिकों के बीच इन दुष्प्रचार करने वालों की बची-खुची वैचारिक प्रामाणिकता भी समाप्त हो गई है।
संस्थागत मजबूती से खीझ: दिमागी नक्सली हमेशा चाहते हैं कि देश की संवैधानिक संस्थाएं कमजोर, संदेहास्पद और विवादित दिखें ताकि वे देश के भीतर अराजकता या अविश्वास का माहौल बना सकें लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग की इस वैश्विक स्वीकार्यता ने यह प्रमाणित कर दिया है कि भारतीय संवैधानिक तंत्र किसी भी बाहरी या आंतरिक दबाव से मुक्त और अभूतपूर्व रूप से सशक्त है।
विपक्ष की हताशा और तंज
ट्रम्प की इस प्रशंसा से बौखलाए राजनीतिक तत्वों और नैरेटिव-मेकर्स की हताशा उनके बयानों में भी साफ नजर आई। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा जैसे प्रवक्ताओं ने इस पर तंज कसते हुए यहां तक कह दिया कि ‘ज्ञानेश कुमार और ईवीएम दोनों को अमेरिका ले जाइए और वहीं चुनाव कराइए’। यह प्रतिक्रिया दर्शाती है कि जब कोई तर्क नहीं बचता तो संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों का उपहास उड़ाना ही इस वर्ग की अंतिम शरणस्थली बन जाता है।
भारतीय लोकतंत्र का ऊंचा कद
डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की यह सराहना केवल एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं है बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक ऊंचे कद का एक अंतरराष्ट्रीय प्रमाणपत्र है। अमेरिका ही नहीं; इंडोनेशिया सहित कई अन्य देशों ने भी भारत की ईवीएम और चुनाव व्यवस्था को अपनाने में रुचि दिखाई है। इसने पूरी दुनिया के सामने यह साफ कर दिया है कि भारत में सत्ता का परिवर्तन किसी ‘वोट चोरी’ या ‘तकनीकी धांधली’ से नहीं बल्कि करोड़ों नागरिकों के वैध और प्रमाणित मतों के अधिकार से होता है। ईवीएम और चुनाव आयोग का रोना रोने वाले दिमागी नक्सलियों को अब यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि देश की संस्थाओं पर कीचड़ उछालकर वे भारतीय जनमानस को और अधिक गुमराह नहीं कर सकते। भारत की चुनावी व्यवस्था अपनी पारदर्शी प्रक्रियाओं, सख्त पहचान नियमों और निष्पक्ष प्रशासनिक नेतृत्व के दम पर आज पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुकी है। यह समय अपनी ही संस्थाओं पर संदेह करने का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की इस वैश्विक गूंज पर गर्व करने का है।
भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के साथ चुनावी सहयोग और ईवीएम तकनीक साझा करने या अपनाने में नेपाल, भूटान, नामीबिया और हाल ही में इंडोनेशिया समेत कई देशों ने विशेष रुचि दिखाई है और समझौते किए हैं। इसके अलावा, भारत के चुनाव प्रबंधन निकाय ने दुनिया भर के 28 से अधिक देशों के साथ चुनावी सहयोग के लिए समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं।
ईवीएम और तकनीकी सहयोग प्राप्त करने वाले प्रमुख देश
भूटान: भारत से तकनीकी सहायता और अनुकूलित ईवीएम अपनाने वाला पहला देश।
नेपाल: प्रायोगिक और संस्थागत तौर पर भारत से ईवीएम और चुनावी सहायता प्राप्त की है।
नामीबिया: राष्ट्रीय चुनावों में भारतीय निर्मित ईवीएम और वीवीपैट का व्यावसायिक रूप से उपयोग करने वाला प्रमुख अफ्रीकी देश।
• इंडोनेशिया: दुनिया के तीसरे सबसे बड़े लोकतंत्र ने 2029 के चुनावों में डिजिटल वोटिंग और ईवीएम प्रणाली को लागू करने के लिए भारत के साथ समझौता किया है।
चुनावी स्याही और अन्य सहयोग
• भारत की प्रसिद्ध चुनावी (अमिट) स्याही मंगोलिया, मेडागास्कर, म्यांमार, कंबोडिया, फिजी और सिएरा लियोन जैसे देशों को भी भेजी जाती है। • भारत का निर्वाचन आयोग विभिन्न देशों के अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ फिजी, कंबोडिया, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों के चुनावों में पर्यवेक्षक भी भेज चुका है।













