ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।लोकसभा ने आज ध्वनिमत से सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पास कर दिया। इससे सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़कर 37 हो जाएगी — यह गिनती मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर है। मुख्य न्यायाधीश को जोड़ दें तो अदालत की पूरी संख्या 34 से 38 हो जाएगी।
अब समझिए कि इसका असर कैसे पड़ता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का हिसाब आम अदालत जैसा नहीं है। यहाँ सारे जज एक साथ नहीं बैठते। मुक़दमे बेंच में सुने जाते हैं — आम तौर पर दो जजों की, कभी तीन या उससे ज़्यादा की। इसलिए जजों की संख्या यह तय नहीं करती कि आपका मुक़दमा कितने जज सुनेंगे; वह यह तय करती है कि एक दिन में कितनी बेंच एक साथ बैठ सकती हैं। चार जज बढ़ने का मतलब है क़रीब दो बेंच और — यानी अदालत की रोज़ाना सुनवाई की क्षमता में क़रीब बारह प्रतिशत की बढ़ोतरी। यह विधेयक 1956 के सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम में संशोधन करता है, और इसी साल मई में जारी अध्यादेश की जगह लेगा।
जज नहीं, बेंच गिनिए: दो-दो जजों की बेंच बैठती है, इसलिए चार जज बढ़ने का मतलब है हर दिन क़रीब दो कमरे और, जिनमें एक साथ सुनवाई हो सके।
जजों की संख्या यह तय नहीं करती कि आपको कौन सुनेगा। वह यह तय करती है कि हफ़्ते में कितनी सुबहें ऐसी होंगी जब कोई सुन सके।
एक नज़र में
• विधेयक: सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026
• कब पास: लोकसभा में 3 अगस्त 2026 को, ध्वनिमत से
• बदलाव: स्वीकृत संख्या 33 से 37 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर)
• कुल: मुख्य न्यायाधीश सहित 34 से 38
• किसमें संशोधन: सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956
• पेश किया: केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री ने
• इससे पहले: मई 2026 में राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश
आम मुक़दमेबाज़ के लिए इसका मतलब उतना बड़ा नहीं है जितना सुर्ख़ी से लगता है, और यही ईमानदार बात है। भारत की अदालतों का ढाँचा पिरामिड जैसा है और लंबित मुक़दमों का बड़ा हिस्सा नीचे, ज़िला अदालतों में है। ऊपर की क्षमता बढ़ाने से वे मामले तेज़ी से निपटेंगे जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचते हैं — अपील, संवैधानिक सवाल, तबादले की अर्ज़ियाँ — और सुनवाई की तारीख़ जल्दी मिलेगी, जो ज़मानत, ज़मीन-जायदाद और कारोबारी विवादों में सीधे फ़र्क़ डालती है। लेकिन ज़िला अदालत की क़तार इससे अपने आप छोटी नहीं होगी।
इसलिए इस बिल को अकेले उपाय की तरह नहीं, एक कड़ी की तरह देखना चाहिए। ऊपर की क्षमता तभी पूरा असर दिखाती है जब नीचे तीन काम साथ चलें — हाईकोर्ट में खाली पड़े पदों पर नियुक्तियाँ, मुक़दमों के काग़ज़ों का डिजिटलीकरण ताकि नई बेंच फ़ाइल के एक रजिस्ट्री से दूसरी तक पहुँचने का इंतज़ार न करे, और एक जैसे मामलों के लिए विशेष बेंच ताकि नज़ीर जल्दी तय हो। ये तीनों काम पहले से चल रहे हैं। चार जज बढ़ना अपने आप में अच्छी बात है — और अगर इनके नीचे की नियुक्तियाँ भी उतनी ही तेज़ी से हों, तो कहीं बेहतर।













