ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।सीधी बात यह है कि पीएम-किसान बंद नहीं हो रही। कैबिनेट ने 31 जुलाई को इस योजना को 2026–27 से 2030–31 तक जारी रखने की मंज़ूरी दे दी है, और इसके लिए 3.15 लाख करोड़ रुपये तय किए हैं। देश के 9.49 करोड़ से ज़्यादा किसान परिवारों को साल में 6,000 रुपये, तीन किस्तों में, सीधे बैंक खाते में मिलते रहेंगे।
अब वह हिसाब जो ज़्यादातर जगह नहीं छपा। 3.15 लाख करोड़ रुपये पांच साल के लिए हैं। यानी हर साल करीब 63,000 करोड़ रुपये। यह रकम लगभग उतनी ही है जितनी अभी हर साल खर्च हो रही है। मतलब साफ़ है — सरकार ने योजना को आगे बढ़ाया है, किस्त की रकम नहीं बढ़ाई। 6,000 रुपये सालाना का मतलब महीने के 500 रुपये। किसी भी परिवार का खर्च इससे नहीं चलता, और सरकार ने कभी दावा भी नहीं किया कि इससे खर्च चलेगा।
किस्त का असली फ़ायदा वक़्त में है: बुवाई से पहले खाते में आए 2,000 रुपये का मोल इसलिए है कि उस हफ़्ते किसान के पास और कोई नक़द नहीं होता।
500 रुपये महीना कमाई नहीं है। लेकिन बुवाई वाले हफ़्ते में खाते में आ जाए, तो यह सीज़न के पहले उधार की जगह ले लेता है — और वही सबसे महंगा उधार होता है।
एक नज़र में
• मंज़ूरी: 31 जुलाई 2026, केंद्रीय कैबिनेट
• अवधि: 2026–27 से 2030–31 तक
• कुल रकम: 3.15 लाख करोड़ रुपये — यानी हर साल करीब 63,000 करोड़
• कितने किसान: 9.49 करोड़ से ज़्यादा परिवार
• कितना मिलेगा: साल में 6,000 रुपये, 2,000-2,000 की तीन किस्तों में, सीधे खाते में
• अब तक: 23 किस्तों में 4.47 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा भेजे जा चुके
• महिला किसान: 1.06 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा — हर चार में से करीब एक लाभार्थी महिला
तो फिर इस पैसे का असली काम क्या है? दरअसल यह कमाई बढ़ाने की योजना नहीं, समय की योजना है। खेती की कमाई साल में दो बार आती है — फ़सल कटने पर। लेकिन खर्च उससे पहले होता है, बुवाई के हफ़्तों में, जब बीज, खाद और डीज़ल खरीदना होता है। यही वह गड्ढा है जिसमें छोटा किसान हर साल गिरता है और गांव के साहूकार से ब्याज पर पैसा उठाता है। 2,000 रुपये की किस्त उस पूरे खर्च के सामने छोटी है, पर उस ख़ास गड्ढे के सामने बड़ी है। और चूंकि पैसा सीधे खाते में आता है, किसान उसे जहां ज़रूरत हो वहां लगाता है — किसी को यूरिया चाहिए, किसी को पंप की मरम्मत।
एक बात साफ़ कहनी ज़रूरी है, और यह शिकायत नहीं, आगे का रास्ता है। यह पैसा ज़मीन के काग़ज़ पर मिलता है। इसलिए बटाईदार किसान और खेत में काम करने वाला मज़दूर, जो असल में खेती करता है पर जिसके नाम ज़मीन नहीं है, इस योजना के दायरे से बाहर रह जाता है। कई राज्य अब बटाईदारों का अलग रजिस्टर बनाने लगे हैं — अगले पांच साल इसी काम को पूरा करने का सही मौका हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि पीएम-किसान ने चुपचाप देश का सबसे भरोसेमंद किसान रिकॉर्ड तैयार कर दिया है — आधार से जुड़ा, बैंक खाते से जुड़ा, ज़मीन के रिकॉर्ड से मिलाया हुआ। फ़सल बीमा, मिट्टी की जांच, मौसम की चेतावनी और सस्ते कर्ज़ — ये सब इसी एक सूची पर खड़े किए जा सकते हैं। किस्त छोटी रहेगी। जो सूची इस किस्त ने बनाई है, वह छोटी नहीं है।














