ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इस बार की बुवाई के आँकड़े पहली नज़र में डराते हैं, लेकिन पूरी तस्वीर देखने पर घबराने की वजह कम है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक़ 24 जुलाई तक देश में 826.19 लाख हेक्टेयर में खरीफ़ की बुवाई हुई थी। पिछले साल इसी तारीख़ तक 865.01 लाख हेक्टेयर थी — यानी 38.82 लाख हेक्टेयर कम।
पहले यह देखिए कि कमी कहाँ है, क्योंकि कुल आँकड़ा असली बात छिपा देता है। सबसे बड़ी गिरावट श्री अन्न और मोटे अनाजों में है — 19.28 लाख हेक्टेयर। यानी आधी से ज़्यादा कमी अकेले इसी वर्ग की है। इसके बाद दलहन 6.90 लाख हेक्टेयर, धान 6.19 लाख, कपास 3.99 लाख और तिलहन 3.45 लाख हेक्टेयर पीछे हैं। दूसरी तरफ़ गन्ना 0.86 लाख और जूट-मेस्ता 0.13 लाख हेक्टेयर आगे हैं। दरअसल बारिश की कमी और बुवाई की कमी का नक़्शा लगभग एक ही है — जून-जुलाई में देश में 13% कम पानी बरसा, और पंजाब, हरियाणा और यूपी में सबसे कम।
अभी देर नहीं हुई: खरीफ़ की बुवाई क़रीब 15 अगस्त तक चलती है — और मौसम विभाग ने अगस्त में सामान्य बारिश का अनुमान दिया है।
24 जुलाई का आँकड़ा आख़िरी आँकड़ा नहीं है। खरीफ़ का असली हिसाब 15 अगस्त के बाद बनता है।
एक नज़र में
• अब तक बुवाई: 826.19 लाख हेक्टेयर (24 जुलाई तक)
• पिछले साल: 865.01 लाख हेक्टेयर — 38.82 लाख हेक्टेयर की कमी
• सबसे ज़्यादा कमी: श्री अन्न और मोटे अनाज — 19.28 लाख हेक्टेयर
• बाक़ी: दलहन −6.90 · धान −6.19 · कपास −3.99 · तिलहन −3.45 लाख हेक्टेयर
• बढ़त: गन्ना +0.86 और जूट-मेस्ता +0.13 लाख हेक्टेयर
• बुवाई कब तक: क़रीब 15 अगस्त तक
• अगस्त का अनुमान: सामान्य का 97%, घट-बढ़ 9%
कृषि मंत्री का कहना है कि खरीफ़ की बुवाई क़रीब 15 अगस्त तक चलती है, इसलिए अंतर काफ़ी हद तक भरा जा सकता है। यह कोई दिलासा नहीं, खेती का सामान्य नियम है — जुलाई के आँकड़े हमेशा अधूरे होते हैं, और अगस्त के पहले पखवाड़े में अच्छी बारिश हो जाए तो देर से बोई गई फ़सल भी पूरी होती है। मौसम विभाग का अगस्त का अनुमान सामान्य के 97% का है, यानी इस बार वह पानी मिलने की उम्मीद है।
किसान के लिए काम की बात यह है कि अब देर से बोई जाने वाली और कम अवधि वाली क़िस्मों का वक़्त है। धान की जगह जहाँ पानी कम है, वहाँ मक्का, बाजरा, अरहर, मूँग और तिल जैसी फ़सलें बेहतर बैठती हैं — ये कम पानी में तैयार होती हैं और इनका बाज़ार भी मज़बूत है, क्योंकि दलहन और तिलहन दोनों भारत बाहर से मँगाता है। कृषि विज्ञान केंद्र और ब्लॉक स्तर के कृषि दफ़्तरों में इन क़िस्मों के प्रमाणित बीज इसी मौसम के लिए रखे जाते हैं, और यही पूछने का सही हफ़्ता है। जिन ज़िलों में बुवाई सबसे पीछे है, वहाँ बीज की उपलब्धता और समय पर सलाह — यही दो चीज़ें इस साल की भरपाई तय करेंगी।













