ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।अगर आपके खाते में हर चार महीने पर दो हज़ार रुपये आते हैं, तो सबसे पहले यह जान लीजिए — वह अब 2031 तक आते रहेंगे। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) को 2026-27 से 2030-31 तक जारी रखने की मंज़ूरी दे दी है। इसके लिए ₹3.15 लाख करोड़ रखे गए हैं।
सीधी बात यह है कि योजना में कुछ बदला नहीं है, और यही इसकी सबसे बड़ी ख़बर है। पात्र किसान परिवार को साल में ₹6,000 मिलेंगे, तीन बराबर किस्तों में, सीधे बैंक खाते में। न कोई नया फ़ॉर्म, न कोई नई शर्त। बड़ी बात यह है कि अब तक यह योजना हर कुछ साल पर बजट के भरोसे चलती थी — अब पाँच साल का पैसा पहले से तय है। किसान के लिए इसका मतलब बहुत साफ़ है: खरीफ़ की बुवाई के वक़्त बीज-खाद के लिए जो दो हज़ार रुपये की उम्मीद रहती है, वह उम्मीद अब अगले पाँच साल तक टिकी रहेगी। छोटे किसान के लिए यही निश्चितता सबसे क़ीमती चीज़ है, क्योंकि उसी पर वह साहूकार से क़र्ज़ लेने या न लेने का फ़ैसला करता है।
दो हज़ार रुपये की तारीख़: छोटे किसान के लिए यह रक़म बड़ी नहीं होती — लेकिन बुवाई के हफ़्ते में आ जाए तो यही बीज और खाद का इंतज़ाम बन जाती है।
₹6,000 से खेती नहीं चलती। लेकिन तय तारीख़ पर आने वाले ₹2,000 से यह तय होता है कि बीज नक़द में आएगा या उधार में।
एक नज़र में
• कब तक: 2026-27 से 2030-31 तक
• कितना पैसा: ₹3.15 लाख करोड़
• किसे: पात्र भूमिधारक किसान परिवार — 9.49 करोड़ से ज़्यादा
• कितना: साल में ₹6,000, तीन बराबर किस्तों में, सीधे खाते में (डीबीटी)
• अब तक: 23 किस्तों में ₹4.47 लाख करोड़ से ज़्यादा भेजे जा चुके
• महिला किसान: ₹1.06 लाख करोड़ से ज़्यादा — हर चार में से क़रीब एक लाभार्थी महिला
• असर: स्वतंत्र आकलनों के मुताबिक़ 92% से ज़्यादा लाभार्थियों ने यह पैसा खेती में ही लगाया
अब आँकड़ों में एक बात पर ग़ौर कीजिए, जिसे ज़्यादातर जगह छोड़ दिया गया। अब तक 23 किस्तों में ₹4.47 लाख करोड़ से ज़्यादा किसानों के खातों में गए हैं। इसमें से ₹1.06 लाख करोड़ से ज़्यादा अकेले महिला किसानों को मिले हैं — यानी हर चार लाभार्थियों में क़रीब एक महिला है। यह आँकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि योजना ज़मीन के काग़ज़ पर चलती है, और भारत में ज़मीन के काग़ज़ पर महिला का नाम कम ही होता है। इसके बावजूद चौथाई हिस्सेदारी का मतलब है कि पिछले कुछ सालों में नामांतरण और वारिसाना दर्ज कराने का काम ज़मीन पर हुआ है।
दूसरी बात जो किसान के काम की है — स्वतंत्र आकलनों में पाया गया कि 92 प्रतिशत से ज़्यादा लाभार्थियों ने यह पैसा खेती में ही लगाया, कहीं और नहीं। इसी दौर में, 2020-21 से 2025-26 के बीच, देश का अनाज उत्पादन 21.18 प्रतिशत बढ़ा। दोनों को जोड़कर यह नहीं कहा जा सकता कि पैदावार पीएम-किसान की वजह से बढ़ी — बीच में अच्छी बारिश, बेहतर बीज और सिंचाई का भी हाथ है। लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि पैसा सही जगह गया। आगे का असली काम अब सूची का है: गाँव-गाँव में ई-केवाईसी और ज़मीन के रिकॉर्ड की जाँच पूरी हो जाए, ताकि जिनका नाम छूट गया है वे जुड़ें और किसी पात्र किसान की किस्त तकनीकी वजह से न रुके। पाँच साल का पैसा तय हो चुका है — अब सारी मेहनत यह पक्का करने में लगनी चाहिए कि वह सही किसान तक पहुँचे।













