ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।ग्लासगो के राष्ट्रमंडल खेल कल ख़त्म हुए। भारत 39 पदकों के साथ चौथे नंबर पर रहा — 13 सोने, 17 चाँदी और नौ काँसे के। पदकों की गिनती हर जगह छपी है। जो ख़बर लगभग नहीं छपी वह यह है कि इन खेलों के ख़त्म होने से दो दिन पहले मंत्रिमंडल ने खेलो इंडिया पर ₹36,441 करोड़ मंज़ूर किए हैं।
यह रक़म पिछली खेलो इंडिया योजना से क़रीब आठ गुना है, और 2026-27 से 2030-31 तक चलेगी। पर सबसे काम की बात रक़म नहीं, उसका ख़र्च का तरीक़ा है। दो चीज़ें नई हैं। पहली — खेलो इंडिया फीडर स्कूल और उत्कृष्ट विद्यालय, यानी खेल अब स्कूल के भीतर, पढ़ाई के साथ। दूसरी — उभरते खिलाड़ियों की एक नई श्रेणी, जिससे मदद पाने वाले खिलाड़ियों की संख्या क़रीब दस गुना हो जाएगी। बाक़ी सारा पैसा — कोचिंग, खेल विज्ञान, विदेशी कोच, कैंप, विदेश में मुक़ाबले — उन खिलाड़ियों पर ख़र्च होता है जो पहले ही मिल चुके हैं। ये दो चीज़ें नए खिलाड़ी ढूँढ़ने पर ख़र्च होती हैं। भारत की दिक़्क़त कभी प्रतिभा की नहीं रही, ढूँढ़ने की रही है।
पदक यहाँ तय होते हैं: नई योजना का ज़ोर स्कूल स्तर पर है — उसी उम्र पर, जहाँ खिलाड़ी या तो मिल जाता है या हमेशा के लिए छूट जाता है।
मुक्केबाज़ी के सात सोने किस्मत से नहीं आए। यह उस अनुशासन की शक्ल है जिसे दस साल पहले ठीक से पैसा मिलना शुरू हुआ था।
एक नज़र में
• ग्लासगो 2026: भारत चौथे स्थान पर, 39 पदक — 13 सोने, 17 चाँदी, नौ काँसे
• मुक्केबाज़ी: रिकॉर्ड 10 पदक, जिनमें सात सोने — इन खेलों में किसी भी देश का इस खेल में सर्वाधिक
• पैरा खिलाड़ी: सात पदक (तीन सोने, दो चाँदी, दो काँसे) — पिछले सभी संस्करणों के कुल के बराबर
• मीराबाई चानू: लगातार तीसरा राष्ट्रमंडल स्वर्ण
• मंज़ूरी: 31 जुलाई — खेलो इंडिया और खेल संघों की मदद के लिए ₹36,441 करोड़
• अवधि: 2026-27 से 2030-31 — पिछली योजना से क़रीब आठ गुना
• नया क्या: फीडर स्कूल, उत्कृष्ट विद्यालय, और उभरते खिलाड़ियों की दस गुना बड़ी सूची
ग्लासगो का नतीजा इसी बात की गवाही देता है। मुक्केबाज़ी में भारत को 10 पदक मिले, जिनमें सात सोने के — इन खेलों के इतिहास में किसी भी देश का इस खेल में सबसे बड़ा प्रदर्शन। यह 2026 में किए गए किसी काम का नतीजा नहीं है। यह उन दस सालों का नतीजा है जिनमें मुक्केबाज़ी को लगातार कैंप, विदेशी कोच और इतने मुक़ाबले मिले कि खिलाड़ी बड़े मंच पर पहुँचने से पहले ही हर तरह की शैली से लड़ चुका होता है। पैरा खिलाड़ियों की कहानी और भी साफ़ है — ग्लासगो में सात पदक, यानी पिछले सारे संस्करणों के कुल के बराबर।
इसलिए ₹36,441 करोड़ को 2030 का नहीं, 2034 का हिसाब समझना चाहिए। पैसा तेज़ी से चलता है, खिलाड़ी धीरे-धीरे तैयार होते हैं। अगले दो साल का असली काम पैसे का नहीं, इंतज़ाम का है — फीडर स्कूल उन ज़िलों में बनें जहाँ अभी कोई व्यवस्थित खेल नहीं है, बड़े शहरों में नहीं जहाँ पहले से है; उभरते खिलाड़ियों की सूची में चुने जाने का रास्ता इतना साफ़ छपे कि क़स्बे की पंद्रह साल की लड़की को पता हो कि उसे करना क्या है; और हर खेल संघ का ख़र्च अलग-अलग छपे, ताकि आठ गुना पैसा चुपचाप उन्हीं चार-पाँच संघों तक न सिमट जाए जो पहले से माँगना जानते हैं। मुक्केबाज़ी और पैरा खेल ने साबित कर दिया है कि तरीक़ा काम करता है। अब उसे पंद्रह और खेलों में एक साथ दोहराना है।














