ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल की बच्ची की गवाही के आधार पर व्यक्ति को पत्नी की हत्या का दोषी माना है । मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा कि गवाह बच्चा है, सिर्फ इस आधार पर उसकी गवाही को नकारा नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग गवाह की गवाही को निर्णायक मानते हुए कहा, साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत, यदि बच्चा प्रश्नों को समझ सकता है और तर्कपूर्ण जवाब दे सकता है, तो वह गवाही देने के लिए योग्य माना जाता है। जस्टिस जेबी पारदीवाला की अगुआई वाली बेंच ने कहा, अगर बच्चे की गवाही स्पष्ट और तार्किक हो, तो उसे अन्य सबूतों से पुष्टि करवाने की जरूरत नहीं होती। बाल गवाह की गवाही में विसंगतियां या विरोधाभास पाए जाते हैं, तो अदालतें पुष्टि की मांग कर सकती हैं। बाल गवाह को प्रभावित करना आसान होता है, इसलिए अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी गवाही किसी बाहरी प्रभाव में न दी गई हो।
यह है पूरा मामला
आरोपी पर अपनी पत्नी की हत्या कर चुपचाप उसका अंतिम संस्कार करने का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराया था। हालांकि, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने उसे बरी कर दिया, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। मुख्य मुद्दा यह था कि क्या आरोपी की 7 साल की बेटी की गवाही विश्वसनीय थी या सिखाई गई थी? सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी को दिए फैसले में कहा कि बच्ची की गवाही स्पष्ट और निरंतर थी। गौरतलब है कि यह घटना 15 जुलाई 2003 की है।













