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67 लाख करोड़ रुपये का है ‘व्हाइट गुड्स’ बाजार

घरों में आराम बढ़ा रही मशीनें, लेकिन धरती पर बढ़ रहा है संकट।

by Blitzindiamedia
July 4, 2026
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67 लाख करोड़ रुपये का है ‘व्हाइट गुड्स’ बाजार

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली । जून की तपती दोपहर, जयपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में खुशी का माहौल है। महीनों की बचत के बाद घर में नया इनवर्टर एसी लगा है। जैसे ही एसी चालू होता है, कमरे में ठंडी हवा फैल जाती है और परिवार के चेहरे खिल उठते हैं।

ऐसी ही लाखों कहानियां आज भारत के शहरों और कस्बों में लिखी जा रही हैं। कोई नया फ्रिज खरीद रहा है, कोई वॉशिंग मशीन, तो कोई पहली बार अपने घर में एसी लगवा रहा है।

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दूसरी तरफ, दुनिया की बड़ी कंपनियां ऐसे स्मार्ट उपकरण बना रही हैं जो आपके मोबाइल से चलेंगे, बिजली बचाएंगे और जरूरत पड़ने पर खुद आपको सूचना भी देंगे।

यही है दुनिया के तेजी से बढ़ते ‘व्हाइट गुड्स उद्योग’ की कहानी। व्हाइट गुड्स यानी वे घरेलू उपकरण जिनके बिना आधुनिक जीवन की कल्पना करना मुश्किल होता जा रहा है—फ्रिज, एयर कंडीशनर, वॉशिंग मशीन, डिशवॉशर, माइक्रोवेव और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण।

आज यह उद्योग दुनिया भर में करीब 804 अरब डॉलर (लगभग ₹67 लाख करोड़) का हो चुका है। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक इसका आकार बढ़कर 1.87 ट्रिलियन डॉलर (करीब ₹156 लाख करोड़) तक पहुंच जाएगा

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ने वाले बाजारों में शामिल होगा। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत को अपने भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में गिन रही हैं।

2035 तक हो जाएगा ₹156 लाख करोड़ का

लेकिन इस विकास की चमक के पीछे एक ऐसा सवाल खड़ा है, जो आने वाले वर्षों में पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। हमारी सुविधा और आराम की कीमत पर्यावरण चुका रहा है।

एसी अब शौक नहीं, जरूरत

कुछ साल पहले तक एसी को अमीरों की चीज माना जाता था लेकिन लगातार बढ़ती गर्मी और बदलती जीवनशैली ने तस्वीर बदल दी है। भारत के शहरों में अब एसी, फ्रिज और वॉशिंग मशीन की मांग तेजी से बढ़ रही है। आसान ईएमआई, बढ़ती आय और तेजी से फैलते शहरी क्षेत्रों ने घरेलू उपकरणों की पहुंच को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ने वाले बाजारों में शामिल होगा।

यही वजह है कि दुनिया की बड़ी कंपनियां भारत को अपने भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में गिन रही हैं।

अब मशीनें सिर्फ काम नहीं करतीं, सोचती भी हैं

तकनीक ने घरेलू उपकरणों की दुनिया पूरी तरह बदल दी है। आज का फ्रिज सिर्फ खाने-पीने की चीजें ठंडी नहीं रखता। कई स्मार्ट मॉडल आपको मोबाइल पर जानकारी भी दे सकते हैं।

एयर कंडीशनर आपके इस्तेमाल के अनुसार खुद को एडजस्ट कर सकता है। वॉशिंग मशीन कपड़ों की मात्रा देखकर पानी और बिजली की खपत तय कर सकती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और इंटरनेट तकनीक ने घरेलू उपकरणों को पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट बना दिया है।

उपभोक्ताओं को इससे सुविधा तो मिल ही रही है, साथ ही बिजली की बचत भी हो रही है।

कुछ बड़ी कंपनियों का दबदबा

वैश्विक बाजार में एलजी, सैमसंग, हायर और व्हर्लपूल जैसी कंपनियां प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।

इन कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल उत्पाद बेचने की नहीं रह गई है। मुकाबला इस बात का है कि कौन सबसे स्मार्ट, सबसे टिकाऊ और सबसे ऊर्जा-कुशल उपकरण बाजार में ला सकता है।

तकनीक और नवाचार ही अब इस उद्योग की असली ताकत बन चुके हैं।

विकास की रफ्तार के साथ बढ़ रहा है एक बड़ा खतरा

घरेलू उपकरणों की बिक्री जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है ई-कचरा।

हर फ्रिज, हर एसी और हर वॉशिंग मशीन की एक उम्र होती है। कुछ वर्षों बाद यही उपकरण कबाड़ बन जाते हैं। समस्या यह है कि दुनिया भर में निकलने वाले ई-कचरे का बहुत बड़ा हिस्सा सुरक्षित तरीके से रिसाइकिल नहीं हो पाता।

इन उपकरणों में मौजूद सीसा, पारा और अन्य हानिकारक तत्व मिट्टी और पानी को प्रदूषित कर सकते हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि इस समस्या पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में ई-कचरा प्लास्टिक प्रदूषण जितनी बड़ी चुनौती बन सकता है।

भारत भी चुनौती के मोड़ पर

भारत तेजी से बढ़ता हुआ उपभोक्ता बाजार है लेकिन इसके साथ इलेक्ट्रॉनिक कचरे की मात्रा भी तेजी से बढ़ रही है।

दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में हर साल लाखों टन ई-कचरा पैदा हो रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नई मशीनें खरीदना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उनके सुरक्षित निपटान और रिसाइक्लिंग की व्यवस्था बनाना भी है।

अगर अभी तैयारी नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

सवाल भविष्य का

विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल ज्यादा उत्पाद बेचने का दौर खत्म होना चाहिए।

कंपनियों को ऐसे उपकरण बनाने होंगे जो ज्यादा समय तक चलें, आसानी से ठीक हो सकें और बाद में दोबारा रिसाइकिल किए जा सकें।

यूरोप के कई देशों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारत में भी अब ऐसी नीतियों की जरूरत महसूस की जा रही है। आखिरकार सवाल भविष्य का है।

घरेलू उपकरणों ने हमारे जीवन को आसान बनाया है। उन्होंने समय बचाया है, मेहनत कम की है और जीवन स्तर बेहतर किया है लेकिन हर सुविधा के साथ जिम्मेदारी भी आती है। दुनिया आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां उसे यह तय करना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए क्योंकि आने वाली पीढ़ियां केवल यह नहीं पूछेंगी कि हमने कितने एसी और फ्रिज खरीदे थे। वे यह भी पूछेंगी कि हमने उनके लिए कैसी धरती छोड़ी थी।

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