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ग्लासगो में 39 पदक, सात गोल्ड सिर्फ़ बॉक्सिंग से

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 5, 2026
in the blitz, खेल, खेल-फ़िल्म
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत चौथे नंबर पर रहा — 39 पदक, जिनमें 13 सोने के, 17 चांदी के और 9 कांस्य के। इनमें से 10 पदक और 7 गोल्ड सिर्फ़ एक ही रिंग से आए।

बॉक्सिंग में सात सोने के पदक — किसी भी देश ने एक कॉमनवेल्थ गेम्स में इस खेल में इतने गोल्ड कभी नहीं जीते। यह रिकॉर्ड है। पर इसी में एक सवाल भी छिपा है। भारत के कुल 13 गोल्ड में से 7 अकेली बॉक्सिंग से आए, यानी आधे से ज़्यादा। जिस देश के पदक दस-बारह खेलों में बंटे हों, उसका खेल ढांचा चौड़ा माना जाता है। जिस देश के पदक एक खेल में सिमटे हों, उसका मतलब है कि उस एक खेल का सिस्टम शानदार है — और सीधा सवाल यह है कि बाक़ी खेल वहां कैसे पहुंचें।

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एक खेल से आधे से ज़्यादा गोल्ड: भारत के मुक्केबाज़ों ने ग्लासगो में 10 पदक जीते, जिनमें सात सोने के — कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में किसी भी देश का बॉक्सिंग में सबसे अच्छा प्रदर्शन।

एक खेल में कमाल नतीजा होता है। कई खेलों में कमाल सिस्टम होता है। ग्लासगो बताता है कि भारत पहला बना चुका है, दूसरा बन रहा है।

एक नज़र में

• भारत: चौथा स्थान, कुल 39 पदक — 13 सोना, 17 चांदी, 9 कांस्य
• बॉक्सिंग: 10 पदक, जिनमें 7 सोने के — इस खेल में किसी भी देश का सर्वश्रेष्ठ
• पैरा खिलाड़ी: 7 पदक (3 सोना, 2 चांदी, 2 कांस्य) — पिछले सभी गेम्स के कुल पैरा पदकों के बराबर
• गुलवीर सिंह: चांदी और कांस्य — एक ही कॉमनवेल्थ में दो व्यक्तिगत पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलेटिक्स खिलाड़ी
• 31 जुलाई को मंज़ूर: नया खेलो इंडिया कार्यक्रम और खेल संघों को बढ़ी हुई मदद
• अगला पड़ाव: अहमदाबाद

दो नतीजे बताते हैं कि सिस्टम बन रहा है। पहला, पैरा खिलाड़ियों के सात पदक — तीन सोने के। यह अब तक हुए सारे कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को मिले पैरा पदकों को जोड़ दें, तो उतने हैं। एक ही बार में पिछले सब बराबर हो जाना धीरे-धीरे होने वाला सुधार नहीं होता; इसका मतलब है कि जो रास्ता पहले था ही नहीं, वह अब बन गया है। दूसरा, गुलवीर सिंह, जिन्होंने चांदी और कांस्य जीतकर इतिहास बना दिया — एक ही कॉमनवेल्थ में दो व्यक्तिगत पदक जीतने वाले वे पहले भारतीय एथलेटिक्स खिलाड़ी हैं। एथलेटिक्स में जगह बनाना सबसे मुश्किल है, क्योंकि वहां दुनिया भर के सबसे तेज़ लोग होते हैं। इसीलिए वहां का पदक असली गहराई की सबसे भरोसेमंद निशानी है।

और अब जो हुआ, उसका वक़्त भी देखिए। 31 जुलाई को ही कैबिनेट ने नया खेलो इंडिया कार्यक्रम और खेल संघों को बढ़ी हुई मदद मंज़ूर की। ये दोनों वही दो चीज़ें हैं जो ज़रूरी हैं — एक ज़मीन पर खिलाड़ी तैयार करता है, दूसरा उन्हें टीम में बदलता है। ग्लासगो से इनके लिए एक साफ़ सबक़ है। बॉक्सिंग भारत का सबसे मज़बूत कॉमनवेल्थ खेल किसी एक फ़ैसले से नहीं बना — उसके पीछे सालों की कोचिंग, लगातार मुक़ाबले और एक घरेलू सर्किट है जो नए मुक्केबाज़ देता रहता है। यही चीज़ दो-तीन और खेलों में दोहराई जा सकती है, पर एक साथ सब खेलों में नहीं। अहमदाबाद सामने है। अगले बारह महीनों में जिन खेलों को चुना जाएगा, वे पदक तालिका में तब दिखेंगे जब यह ख़बर पुरानी हो चुकी होगी।

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