ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारत की खेती का सबसे अहम वक्त एक सतर्क अनुमान के साये में आया है। मौसम विभाग (IMD) का कहना है कि जुलाई में बारिश सामान्य से कम — औसत के 94% से नीचे — रह सकती है, और अब तक के आंकड़े भी यही कह रहे हैं: जुलाई की शुरुआत तक कुल बारिश औसत से करीब पांचवां हिस्सा कम रही। इसी बीच खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल से पीछे चल रही है, जबकि धान, दलहन और तिलहन बोने का सबसे ज़रूरी वक्त अभी है।
असल कहानी बारिश के बंटवारे की है। पूरब और पूर्वोत्तर भारत में भारी कमी है, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में थोड़ी कम, जबकि दक्षिण भारत में बारिश सामान्य से ज़्यादा हुई है। यही असमानता योजनाकारों को चिंता में डालती है, क्योंकि यही तय करती है कि किस ज़िले के खेत समय पर बोए जाएं और किसे बारिश लौटने का इंतज़ार करना पड़े। इसी माहौल का असर थाली पर भी दिखा — जून में खुदरा महंगाई 4.38% रही, जिसमें खाने-पीने की महंगाई 5.32% तक पहुंच गई।
मानसून को कभी एक हफ्ते से नहीं आंका जाता। असली सवाल यह है कि क्या पूरा इंतज़ाम किसान को सूखे दिनों से बरसात तक संभाल ले जाए — और अब यह पहले से बेहतर हो पाता है।
राहत की ठोस वजहें भी हैं। मानसून अक्सर सीज़न के दूसरे हिस्से में रफ्तार पकड़ता है, और भारत की तैयारी अब पहले से मज़बूत है — अनाज का पर्याप्त भंडार, बढ़ती सिंचाई सुविधा जो किसी एक बारिश पर निर्भरता घटाती है, और खेती का डिजिटल ढांचा जो मौसम की सलाह, मिट्टी की सेहत और मंडी के भाव किसान तक पहुंचाता है। दस साल पहले जो झटका बड़ा लगता था, ये चीज़ें अब उसकी चोट कम कर देती हैं। यही वजह है कि महंगाई भी रिज़र्व बैंक के 2–6% के दायरे में, लक्ष्य के करीब बनी हुई है।
आगे का रास्ता इसी मज़बूती के सहारे चलने में है — जब तक बारिश रफ्तार पकड़े, तब तक सबसे सूखे ज़िलों के लिए पानी और बीज की तैयारी पहले से रखी जाए, देर से बोने वाले खेतों में कम समय में पकने और कम पानी में टिकने वाली किस्में भेजी जाएं, और डिजिटल सलाह वहीं पहुंचे जहां कमी सबसे ज़्यादा है। समय रहते संभाल लिया जाए, तो कमज़ोर जुलाई एक झटका नहीं, बल्कि संभालने लायक चुनौती बन जाती है — और सीज़न के पास अभी भी वक्त है।













