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फार्मासिस्ट कैडर नियम की संवैधानिक वैधता सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी

राज्यों को सरकारी पद के लिए न्यूनतम योग्यता तय करने का अधिकार - बिहार में फार्मासिस्ट के 2,473 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया से बाहर किए जाने को चुनौती दी थी

by ब्लिट्ज़ इंडिया
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। यह देखते हुए कि राज्यों को सरकारी पद के लिए न्यूनतम योग्यता तय करने का अधिकार है, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार फार्मासिस्ट कैडर नियम, 2014 के नियम 6(1) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जो राज्य में ‘फार्मासिस्ट’ के पद पर भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यता के तौर पर ‘फार्मेसी में डिप्लोमा’ तय करता है। पटना हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि करते हुए जस्टिस एमएम सुंदरेश और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने बी.फार्मा/एम. फार्मा डिग्री धारकों द्वारा दायर याचिका खारिज की, जिन्होंने राज्य में फार्मासिस्ट के 2,473 पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया से बाहर किए जाने को चुनौती दी थी, सिर्फ इसलिए कि उनके पास ज़रूरी योग्यता, यानी फार्मेसी में डिप्लोमा नहीं है।
अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि नियम 6(1) फार्मेसी अधिनियम, 1948 और फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन, 2015 के खिलाफ है, जो डिप्लोमा और डिग्री धारकों दोनों को योग्य फार्मासिस्ट के रूप में मान्यता देते हैं। इसके अलावा, उन्होंने नियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि यह मनमाना और अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है, जो समान रूप से रजिस्टर्ड प्रोफेशनल्स के बीच एक तर्कहीन माइक्रो-क्लासिफिकेशन बनाता है। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि बैचलर/मास्टर डिग्री डिप्लोमा से उच्च योग्यता है, इसलिए इसे डिप्लोमा जैसी कम योग्यता पर वरीयता मिलनी चाहिए। अपीलकर्ताओं के तर्कों का विरोध करते हुए राज्य ने नियम का समर्थन किया, यह तर्क देते हुए कि डिप्लोमा धारकों को सार्वजनिक स्वास्थ्य भूमिकाओं के लिए महत्वपूर्ण केंद्रित, व्यावहारिक अस्पताल प्रशिक्षण (500 अनिवार्य घंटे) मिलता है,
जबकि डिग्री धारकों के पास व्यापक, उद्योग-उन्मुख पाठ्यक्रम होते हैं और नौकरी के अधिक अवसर होते हैं, उन्हें केवल 150 घंटे का व्यावहारिक अस्पताल प्रशिक्षण मिलता है।
अपीलकर्ता के तर्क को खारिज करते हुए और राज्य के तर्क में दम पाते हुए जस्टिस एससी शर्मा द्वारा लिखे गए फैसले ने फिर से पुष्टि की कि नौकरी की योग्यता तय करना एक नीतिगत मामला है, जो नियोक्ता (राज्य) के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है, जिस पर बहुत सीमित न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। कोर्ट ने कहा, भारत के संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत नियम बनाने की शक्ति राज्य को अपने स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर सार्वजनिक पदों के लिए सबसे उपयुक्त योग्यता तय करने का अधिकार देती है। इसलिए यह लगातार माना गया है कि क्वालिफिकेशन की प्रासंगिकता और उपयुक्तता तय करना एम्प्लॉयर का काम है।
भर्ती के मामलों में न्यायिक समीक्षा की शक्ति, अगर कोई हो, तो सिर्फ़ कानूनी क्षमता, मनमानी या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की जांच तक सीमित है। कोर्ट सर्विस नियमों को दोबारा नहीं लिख सकते, क्वालिफिकेशन की बराबरी तय नहीं कर सकते, या एम्प्लॉयर के आकलन की जगह अपना आकलन नहीं दे सकते। सरकारी नौकरी के मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा किसी सरकारी पद के लिए न्यूनतम पात्रता की ज़रूरतों को तय करने में राज्य की समझदारी या नीति पर सवाल उठाने तक नहीं फैलता है।

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