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बारिश लौटी, बुवाई अब भी पीछे

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 10, 2026
in the blitz, कृषि
0
दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026

ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।इस साल जून ने डरा दिया था — 1901 के बाद का पाँचवाँ सबसे सूखा जून। जुलाई के आख़िरी हफ़्ते की बारिश ने हालात काफ़ी हद तक संभाल लिए। लेकिन खेत का हिसाब अब भी पूरा नहीं बैठा, और इसका असर आपकी थाली तक आएगा।

जुलाई की शुरुआत में पूरे सीज़न की बारिश क़रीब 40 फ़ीसदी कम चल रही थी। पहले ही हफ़्ते की तेज़ बारिश ने इस कमी को घटाकर लगभग 14 फ़ीसदी कर दिया। फिर दो हफ़्ते सूखे बीते और कमी दोबारा 24 फ़ीसदी तक चढ़ गई। 21 से 24 जुलाई के बीच देश के बड़े हिस्से में बारिश हुई और आँकड़ा फिर घटकर क़रीब 15 फ़ीसदी पर आ गया। महीना ख़त्म हुआ तो जुलाई ख़ुद अपने औसत 280.4 मिलीमीटर से लगभग 10 फ़ीसदी कम पर बंद हुआ। दरअसल इसी उतार-चढ़ाव में असली दिक़्क़त छिपी है — कुल बारिश ठीक-ठाक दिख जाए, पर वह उस हफ़्ते न पड़े जिस हफ़्ते फ़सल को चाहिए थी।

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कुल बारिश बनाम सही वक़्त की बारिश: पूरे सीज़न का औसत ठीक निकल सकता है, और फिर भी एक ज़िले की फ़सल मारी जा सकती है।

देश का औसत आँकड़ा है। किसान के लिए सवाल छोटा है — मेरे ब्लॉक में, फूल आने वाले पखवाड़े में पानी गिरा या नहीं?

एक नज़र में

• जून 2026: 1901 के बाद का पाँचवाँ सबसे सूखा जून
• जुलाई की शुरुआत में: सीज़न की कमी क़रीब 40%
• महीने के दौरान: कमी घटकर 14%, फिर 24%, फिर 21-24 जुलाई की बारिश के बाद क़रीब 15%
• जुलाई का अपना आँकड़ा: औसत 280.4 मिमी से लगभग 10% कम
• 13 जुलाई तक: 741 में से 397 ज़िलों में सामान्य से कम बारिश
• मौसम विभाग का अगस्त अनुमान: औसत का 97%, ऊपर-नीचे 9 फ़ीसदी अंक तक
• बुवाई: तिलहन, मोटे अनाज और दालों का रकबा पिछले साल से कम

अब सीधी बात यह है कि इसका असर कहाँ दिखेगा। जिन फ़सलों का रकबा घटा है — तिलहन, मोटा अनाज और दालें — उन्हीं की क़ीमत सबसे पहले हिलती है। खाने के तेल और दाल पर देश पहले से आयात पर टिका है, इसलिए घरेलू पैदावार कम रहने का मतलब है कि बाज़ार का भाव बाहर की क़ीमत से तय होगा। जून के महँगाई आँकड़ों में खाने-पीने की चीज़ों की महँगाई 5.32 फ़ीसदी थी और गाँवों में कुल महँगाई 4.74 फ़ीसदी — शहरों के 3.92 से साफ़ ज़्यादा। यानी जो घर पहले से खाने पर सबसे बड़ा हिस्सा ख़र्च करता है, बारिश की गड़बड़ी उसी को सबसे पहले लगती है। जुलाई के आँकड़े बुधवार, 12 अगस्त को आएँगे।

बड़ी बात यह है कि अगस्त का अनुमान राहत देने वाला है — मौसम विभाग के मुताबिक़ इस महीने औसत की 97 फ़ीसदी बारिश हो सकती है। जिन किसानों की बुवाई पिछड़ी है, उनके लिए दो काम अब भी हाथ में हैं: कम अवधि वाली क़िस्में, जो देर से बोने पर भी वक़्त पर तैयार हो जाती हैं, और खेत का पानी खेत में रोकने वाले छोटे इंतज़ाम — मेड़बंदी, खेत तालाब, ड्रिप और स्प्रिंकलर। मानसून हर साल अलग रहेगा, यह तय है। जो बदला जा सकता है वह यह है कि जो पानी गिरा, उसमें से कितना छह हफ़्ते बाद भी खेत के काम आए।

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