ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।पिछले कुछ हफ़्तों से यह बात फैल रही थी कि E20 पेट्रोल में क्लोराइड और नमी बहुत ज़्यादा है और इससे इंजन ख़राब हो रहा है। तेल कंपनियों ने देश भर में सैंपल जाँचे। जो आँकड़े आए, वे साफ़ हैं।
इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने साझा बयान में बताया कि पूरी सप्लाई चेन में रैंडम जाँच हुई और दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला। आँकड़े इस तरह हैं: रिफ़ाइनरी से लिए गए 100 से ज़्यादा सैंपल में क्लोराइड 1 पीपीएम या उससे कम मिला। 80 डिस्टिलरी से पिछले दस दिन में लिए गए एथेनॉल के सैंपल में यह 3 पीपीएम से नीचे रहा। और 160 पेट्रोल पंपों से लिए गए सैंपल में क्लोराइड 0 से 3 पीपीएम के बीच निकला। यानी जो दावा सैकड़ों पीपीएम का था, ज़मीनी जाँच उससे बहुत दूर है। दो जगह मात्रा ज़्यादा मिली, वहाँ सप्लाई तुरंत रोक दी गई और वजह पता लगने तक बंद रखी गई।
तीन जगह जाँच: रिफ़ाइनरी, डिस्टिलरी और पेट्रोल पंप — तीनों स्तर पर सैंपल लिए गए, ताकि पता चले कि गड़बड़ी कहीं है भी तो किस कड़ी में है।
अफ़वाह एक लाइन में फैलती है, जाँच तीन सौ सैंपल में होती है। और यही फ़र्क़ आपकी गाड़ी और आपकी जेब, दोनों के काम का है।
एक नज़र में
• किसने जाँचा: इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम — साझा बयान
• रिफ़ाइनरी सैंपल: 100 से ज़्यादा, क्लोराइड 1 पीपीएम या उससे कम
• डिस्टिलरी सैंपल: 80 डिस्टिलरी से लिए गए एथेनॉल सैंपल, क्लोराइड 3 पीपीएम से नीचे
• पेट्रोल पंप सैंपल: 160 सैंपल, क्लोराइड 0 से 3 पीपीएम के बीच
• दावा क्या था: क़रीब 500 पीपीएम क्लोराइड और नमी की मौजूदगी — जाँच में पुष्टि नहीं हुई
• अपवाद: दो जगह मात्रा ज़्यादा मिली, वहाँ सप्लाई तुरंत रोकी गई
• E20 है क्या: पेट्रोल में 20 फ़ीसदी तक एथेनॉल मिलाया गया ईंधन
इसका आप पर क्या असर पड़ता है? दो तरह से। पहला, गाड़ी का। एथेनॉल मिले ईंधन को लेकर सबसे आम चिंता माइलेज और इंजन के पुर्ज़ों की होती है, और पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि E20 से माइलेज में बड़ी गिरावट नहीं आती। जो गाड़ियाँ E20 के लिए बनी हैं, उनके लिए कंपनी की मैनुअल ही अंतिम सलाह है — पुरानी गाड़ियों के मालिक अपने सर्विस सेंटर से एक बार पूछ लें, यह सबसे भरोसेमंद रास्ता है। दूसरा, जेब का। एथेनॉल गन्ना और अनाज से बनता है, यानी हर लीटर एथेनॉल कच्चे तेल के आयात की जगह लेता है और उसका पैसा देश के भीतर, अक्सर किसान तक जाता है।
यहाँ रचनात्मक रास्ता भी साफ़ है। ऐसे मामलों में भरोसा बयान से नहीं, आँकड़े से बनता है — और तेल कंपनियों ने सैंपल की संख्या और नतीजे दोनों सार्वजनिक करके सही तरीक़ा अपनाया है। आगे यह और मददगार होगा अगर जाँच के नतीजे नियमित अंतराल पर, ज़िलेवार, वेबसाइट पर डाले जाएँ, ताकि कोई भी ग्राहक अपने शहर का आँकड़ा ख़ुद देख सके। जहाँ दो जगह गड़बड़ी मिली, वहाँ सप्लाई रोकने का फ़ैसला बताता है कि निगरानी काम कर रही है। एथेनॉल मिलाने का कार्यक्रम देश के तेल आयात का बोझ घटाता है और गन्ना किसान को दूसरा ख़रीदार देता है — इसे मज़बूत रखने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि जाँच की रिपोर्ट अफ़वाह से तेज़ चले।














