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अब सर्टिफ़िकेट पर नहीं, नौकरी पर पैसा

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 10, 2026
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।आपके घर में कोई बच्चा ITI में दाख़िला लेने की सोच रहा है, तो इस हफ़्ते हुई एक तकनीकी-सी घोषणा उसके आने वाले चार साल बदल सकती है। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) ने 530 करोड़ रुपये के एक नए फ़ंड पर दस्तख़त किए, जिसका नाम है स्किल्स आउटकम्स फ़ंड। इसमें सरकारी पैसा है, कंपनियों का CSR पैसा है और दान का पैसा भी। दो लाख से ज़्यादा नौजवानों को ट्रेनिंग देने का इरादा है। लेकिन ख़ास बात रकम नहीं है। ख़ास बात यह है कि इस फ़ंड से पैसा तब निकलेगा जब ट्रेनिंग लेने वाले को नौकरी मिलेगी — कोर्स ख़त्म होने पर नहीं।

यह छोटा-सा फ़र्क़ असल में बहुत बड़ा है। भारत में ट्रेनिंग की कमी नहीं रही। कौशल विकास मंत्रालय की तीन बड़ी योजनाओं में अब तक 2.27 करोड़ से ज़्यादा लोग आ चुके हैं। अकेले पीएमकेवीवाई 4.0 में 2023 से 30 जून 2026 तक 5,44,383 लोगों ने ट्रेनिंग ली, जिनमें ज़्यादातर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीक के कोर्स थे। कॉलेज की पढ़ाई में भी तस्वीर अच्छी है — 2023-24 में उच्च शिक्षा में दाख़िले रिकॉर्ड 4.50 करोड़ पहुँचे और 18 से 23 साल के युवाओं में दाख़िले का अनुपात 30 हो गया, जो दस साल पहले 23.7 था। लड़कियों का आँकड़ा तो और तेज़ी से बढ़ा — 22.9 से 31.2। लेकिन असली बात 29 जुलाई को संसद में रखे गए एक आँकड़े से समझ आती है। पीएमकेवीवाई के पहले तीन संस्करणों में, यानी 2015-16 से 2021-22 के बीच, कुल 1.11 करोड़ लोगों को सर्टिफ़िकेट मिला — और उनमें से 24.38 लाख को नौकरी मिलने की जानकारी दर्ज हुई। दाख़िला भी हो रहा था, ट्रेनिंग भी। जो सवाल अधूरा रह जाता था वह यही था कि इन सर्टिफ़िकेटों में से कितने आख़िर में तनख़्वाह की पर्ची बने।

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मशीन वही, हिसाब नया: PM-SETU के तहत 1,000 सरकारी ITI को 200 क्लस्टर में बाँटकर नया रूप दिया जाएगा — हर क्लस्टर में एक हब ITI और चार स्पोक। राज्यों ने अब तक 822 ITI चुन लिए हैं।

सर्टिफ़िकेट इस बात की रसीद है कि आप क्लास में बैठे। एक साल बाद की तनख़्वाह पर्ची इस बात की रसीद है कि हुनर काम आया। सरकारी पैसा अब पहली नहीं, दूसरी रसीद देखकर चलने लगा है।

एक नज़र में

• PM-SETU: कुल 60,000 करोड़ रुपये — केंद्र 30,000, राज्य 20,000, उद्योग 10,000 करोड़
• 1,000 सरकारी ITI, 200 क्लस्टर; 822 ITI राज्यों ने चुन लिए
• भुवनेश्वर, चेन्नई, हैदराबाद, कानपुर और लुधियाना के पाँच NSTI बनेंगे नेशनल सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस
• पैसा छह नतीजों (DLI) पर निकलेगा; जाँच IIM इंदौर करेगा। पहला नतीजा — पास होने वालों को नौकरी मिली या नहीं
• PM-VBRY: 99,446 करोड़ रुपये; पहली नौकरी पर 15,000 रुपये तक, दो किस्तों में
• पुराना हिसाब: पीएमकेवीवाई 1.0 से 3.0 तक (2015-16 से 2021-22) 1.11 करोड़ को सर्टिफ़िकेट, 24.38 लाख को नौकरी मिलने की जानकारी
• जून 2026 में बेरोज़गारी दर 5.5%; महिलाओं की श्रम भागीदारी 32.7%, साल भर में 0.7 अंक ऊपर
असली बदलाव ITI में हो रहा है। PM-SETU — पूरा नाम प्रधानमंत्री स्किलिंग एंड एम्प्लॉयबिलिटी थ्रू अपग्रेडेड ITI — 60,000 करोड़ रुपये की योजना है। इसमें 30,000 करोड़ केंद्र देगा, 20,000 करोड़ राज्य और 10,000 करोड़ उद्योग। केंद्र के हिस्से का आधा पैसा एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक बराबर-बराबर लगा रहे हैं। 1,000 सरकारी ITI को 200 क्लस्टर में बाँटा जाएगा — हर क्लस्टर में एक हब ITI और चार स्पोक ITI। पुरानी योजनाओं से फ़र्क़ पैसे का नहीं, हिसाब का है। इस बार पैसा छह तय नतीजों पर निकलता है, और उनकी जाँच सरकार ख़ुद नहीं करती — यह ज़िम्मा IIM इंदौर को दिया गया है। छह में पहला नतीजा यही है कि ITI से निकले बच्चों को नौकरी मिली या नहीं।

दूसरी शर्त और दिलचस्प है। कोई भी क्लस्टर तब तक मंज़ूर नहीं होता जब तक कोई कंपनी उसमें साझेदार बनकर न आए। जुलाई में जो पाँच क्लस्टर मंज़ूर हुए, उनमें कंपनियों के नाम साफ़ लिखे हैं — सूरत के सरकारी ITI में आर्सेलरमित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया, ओडिशा के बारबिल में जिंदल, और तेलंगाना में अपोलो मेडस्किल्स, न्यूलैंड फ़ाउंडेशन और श्री सिद्धार्थ इंफ़्राटेक। कुल रकम 1,237.58 करोड़ रुपये। मतलब यह कि जो कंपनी आगे चलकर इन बच्चों को नौकरी देगी, वही आज तय कर रही है कि उन्हें सिखाया क्या जाए।

नौकरी देने वालों के लिए भी यही तरीक़ा अपनाया गया है। प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना (PM-VBRY) — जिसे पहले ELI कहा जाता था — का बजट 99,446 करोड़ रुपये है और यह 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच बनी नौकरियों पर लागू है। पहली बार EPFO से जुड़ने वाले कर्मचारी को 15,000 रुपये तक मिलते हैं, लेकिन एक साथ नहीं: पहली किस्त छह महीने नौकरी करने के बाद, दूसरी बारह महीने पूरे होने और वित्तीय साक्षरता का एक छोटा कोर्स करने के बाद। यानी सरकार जॉइनिंग लेटर पर नहीं, टिकी हुई नौकरी पर पैसा दे रही है। अगस्त 2025 से अब तक 63 लाख से ज़्यादा लोग औपचारिक नौकरी में आ चुके हैं, जिनमें क़रीब 30 प्रतिशत महिलाएँ हैं, और जिन 80 प्रतिशत से ज़्यादा प्रतिष्ठानों को यह मदद मिली उनमें 25 से कम कर्मचारी हैं — यानी असली फ़ायदा छोटी दुकानों और छोटे कारख़ानों को हुआ है। जून में प्रधानमंत्री ने 15 लाख से ज़्यादा लोगों के खातों में क़रीब 2,400 करोड़ रुपये भेजे थे।

अब आँकड़े क्या कहते हैं। जून के श्रम सर्वेक्षण (PLFS) के मुताबिक़ 15 साल से ऊपर के लोगों में बेरोज़गारी दर 5.5 प्रतिशत रही — पिछले महीने जितनी ही। गाँवों में यह 5.0 प्रतिशत है और शहरों में 6.6, जो साल भर पहले 7.1 थी। सबसे बड़ी उम्मीद महिलाओं के आँकड़े में दिखती है: उनकी श्रम भागीदारी 32.7 प्रतिशत है, साल भर में 0.7 अंक ऊपर, और गाँवों में तो 1.4 अंक चढ़कर 36.6 प्रतिशत। यही वह जगह है जहाँ सबसे ज़्यादा गुंजाइश बची है।

और माँग तो इंतज़ार नहीं कर रही। इसी हफ़्ते कपड़ा और परिधान उद्योग की स्किल काउंसिल ने बैठक कर हिसाब लगाया कि 2030 तक उसे 1.4 करोड़ अतिरिक्त हुनरमंद कामगार चाहिए। गांधीनगर में भारत-ऑस्ट्रेलिया रूफ़टॉप सोलर ट्रेनिंग अकादमी में तकनीशियनों का पहला बैच बैठा — दो साल में 2,000 लोगों को तैयार करने का लक्ष्य है। NSDC ने ड्रोन तकनीक के 350 एडवांस्ड स्किल सेंटर खोलने का समझौता किया, नाबार्ड के साथ मिलकर गाँव के नौजवानों के लिए ‘ग्रामोद्यम’ शुरू किया। राजस्थान ने इस सत्र से ITI में फ़ाइबर-टू-होम, IoT और हेल्थकेयर जैसे नए ट्रेड जोड़े हैं; आंध्र प्रदेश 1,599 सरकारी स्कूलों में हर बच्चे को कम से कम एक कमाऊ हुनर देने जा रहा है; और किआ इंडिया ने पेनुकोंडा के सरकारी ITI को सुधारने के लिए 12 करोड़ रुपये का करार किया है। आगे का रास्ता सीधा है और मुश्किल भी नहीं: हर क्लस्टर के नतीजे — कितने बच्चों को नौकरी मिली, किस तनख़्वाह पर — सार्वजनिक कर दिए जाएँ, ताकि किसी भी माँ-बाप को ITI चुनते वक़्त सुनी-सुनाई बात पर नहीं, आँकड़े पर भरोसा करना पड़े। भारत ने दस साल यह साबित करने में लगाए कि वह बड़े पैमाने पर ट्रेनिंग दे सकता है। अगले दस साल यह साबित करने में लगेंगे कि ट्रेनिंग काम आई — और यह कहीं बेहतर बहस है।

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