ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।1 जून से अब तक देश में बारिश औसत से क़रीब 11 फ़ीसदी कम रही है। पर यह आँकड़ा पूरी बात नहीं बताता। असली सवाल यह है कि आपके ज़िले में कब बरसा, और आपकी बुवाई किस हाल में है।
दरअसल पूरे देश का औसत खेती में काम नहीं आता। इस बार कमी सबसे ज़्यादा उत्तर-पश्चिम में रही है, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीप में हफ़्ते भर की बारिश औसत से ऊपर भी गई है। मध्य और पूर्वोत्तर भारत में बारिश सामान्य के आसपास रही। यही वजह है कि एक ही तारीख़ को एक राज्य में खेत सूखे पड़े हैं और दूसरे में जलभराव है। जुलाई की शुरुआत तक खरीफ़ की बुवाई पिछले साल के मुक़ाबले काफ़ी पीछे चल रही थी, और धान की रोपाई भी कम रक़बे में हुई थी। अरहर, मूँग और उड़द — तीनों दालों का रक़बा पिछले साल से नीचे रहा। कृषि मंत्रालय ने अल नीनो से जुड़े दबाव को देखते हुए क़रीब 200 ज़िलों को निगरानी में रखा है।
औसत नहीं, बँटवारा: देश का कुल आँकड़ा 11 फ़ीसदी कम बताता है, पर हफ़्तेवार तस्वीर में दक्षिण भारत में ज़्यादा और उत्तर-पश्चिम में कम बारिश दर्ज हुई है।
बड़ी बात यह है कि मानसून का पूरे देश का औसत किसी एक किसान के खेत में नहीं गिरता। गिरती है तारीख़, और उसी से फ़सल तय होती है।
एक नज़र में
• अब तक की बारिश: 1 जून से अगस्त की शुरुआत तक औसत से क़रीब 11 फ़ीसदी कम
• कहाँ सबसे कम: उत्तर-पश्चिम भारत; दक्षिणी प्रायद्वीप में हफ़्तेवार बारिश औसत से ऊपर
• बुवाई: जुलाई की शुरुआत में खरीफ़ का रक़बा पिछले साल से काफ़ी कम
• दालें: अरहर, मूँग और उड़द — तीनों का रक़बा पिछले साल से नीचे
• निगरानी में: अल नीनो से जुड़े दबाव के चलते क़रीब 200 ज़िले
• मौसम विभाग का अनुमान: अगस्त की बारिश औसत के 97 फ़ीसदी के आसपास, नौ अंक ऊपर-नीचे की गुंजाइश के साथ
• राहत की बात: अगस्त-सितंबर का दूसरा हिस्सा कुल मिलाकर सामान्य रहने की उम्मीद
अब काम की बात। जिन ज़िलों में बुवाई पिछड़ गई है, वहाँ देर से बोई जाने वाली और कम अवधि वाली क़िस्में सबसे भरोसेमंद रास्ता हैं — धान की जगह मक्का, बाजरा, अरहर या तिल, जो कम पानी में और कम दिनों में तैयार हो जाते हैं। दूसरा, जहाँ बारिश देर से आई है वहाँ खेत में नमी बचाना उतना ही ज़रूरी है जितना पानी देना: मेड़बंदी, पलवार (मल्चिंग) और खेत तालाब इसी काम आते हैं। तीसरा, फ़सल बीमा और मौसम आधारित सलाह — ये दोनों तभी काम करते हैं जब समय पर पंजीकरण हुआ हो, इसलिए तारीख़ें कृषि विज्ञान केंद्र से पूछकर नोट कर लीजिए।
और एक बात जो घबराहट कम करती है। मौसम विभाग का अनुमान अगस्त की बारिश को औसत के 97 फ़ीसदी के आसपास रखता है और सीज़न के दूसरे हिस्से को कुल मिलाकर सामान्य मानता है। यानी अभी सीज़न ख़त्म नहीं हुआ। रबी की तैयारी के लिहाज़ से अगस्त-सितंबर की बारिश और भी अहम है, क्योंकि वही ज़मीन के नीचे का पानी और तालाब भरती है, जिस पर अक्टूबर के बाद की बुवाई टिकती है। सरकार की तरफ़ से ज़िलेवार निगरानी चल रही है और बीज-उर्वरक की व्यवस्था पर नज़र है। किसान के हाथ में जो है, वह है क़िस्म का चुनाव और नमी की बचत — और इस साल इन्हीं दो फ़ैसलों पर सबसे ज़्यादा फ़र्क़ पड़ेगा।














