ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।सिर्फ़ एक शब्द बदला — “प्रतिबंधित” की जगह “मुक्त”। पर पंजाब की आटा चक्की और मध्य प्रदेश के गेहूं किसान के लिए इस एक शब्द की क़ीमत किसी भी सब्सिडी से ज़्यादा है।
विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफ़टी) ने 24 अगस्त 2026 को दो अधिसूचनाएं जारी कर गेहूं, ड्यूरम गेहूं, और इसके पूरे परिवार — आटा, मैदा, सूजी/रवा, होलमील आटा और रिज़ल्टेंट आटा — को “प्रतिबंधित” श्रेणी से हटाकर “मुक्त” श्रेणी में डाल दिया, वह भी तत्काल प्रभाव से। भारत ने गेहूं के निर्यात पर रोक मई 2022 में लगाई थी, जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया भर में अनाज की सप्लाई गड़बड़ाई थी और घरेलू दाम चढ़ रहे थे। उसी साल आगे चलकर आटे पर भी पाबंदी लगा दी गई थी।
अब रोक हटाने की वजह सीधी है — गोदाम भरे हैं। सरकार का कहना है कि देश में पर्याप्त स्टॉक है, और यह क़दम किसानों को आगे गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने की दिशा में है। 2026-27 के विपणन सत्र के लिए गेहूं की पैदावार करीब 12 करोड़ टन रहने का अनुमान है — लगातार चौथा रिकॉर्ड।
चार साल बंद रहा दरवाज़ा। पंजाब में गेहूं की फ़सल के लिए खेत की तैयारी। मई 2022 में लगी निर्यात रोक 24 अगस्त 2026 की दो डीजीएफ़टी अधिसूचनाओं से हट गई।
निर्यात पर रोक एक ऐसा टैक्स है जो किसान चुकाता है, पर बजट में कहीं दिखता नहीं। उसे हटाना सबसे सस्ता समर्थन मूल्य है।
एक नज़र में
• क्या हुआ: डीजीएफ़टी की दो अधिसूचनाएं, 24 अगस्त 2026, तत्काल प्रभाव से
• क्या-क्या शामिल: गेहूं, ड्यूरम गेहूं, आटा, मैदा, सूजी, होलमील आटा, रिज़ल्टेंट आटा
• बदलाव: प्रतिबंधित → मुक्त
• रोक कब लगी थी: मई 2022 (गेहूं), उसी साल आगे आटे पर
• पैदावार: 2026-27 सत्र के लिए करीब 12 करोड़ टन
• मक़सद: पर्याप्त स्टॉक; उत्पादन बढ़ाने का प्रोत्साहन
अब सूची को ध्यान से पढ़िए, क्योंकि उसी से तय होता है कि फ़ायदा किसे मिलेगा। अगर सिर्फ़ गेहूं खोला जाता, तो कमाई अनाज के व्यापारी और बंदरगाह तक सीमित रहती। लेकिन सरकार ने एक ही झटके में आटा, मैदा, सूजी और रिज़ल्टेंट आटा भी खोल दिया — यानी पिसा हुआ माल भी बाहर जा सकेगा। और पिसाई ही वह जगह है जहां वैल्यू एडिशन होता है, रोज़गार बनता है और पैकिंग का मुनाफ़ा टिकता है। भारत की रोलर फ़्लोर और चक्की आटा इंडस्ट्री पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में फैली है, और इसमें ज़्यादातर मझोली कंपनियां हैं, बड़ी कॉरपोरेट नहीं।
एक तकनीकी बात, जिसका असर कारोबारी है। “रिज़ल्टेंट आटा” — यानी मैदा और सूजी निकालने के बाद बचने वाला आटा — का नाम अलग से लिखा जाना मामूली बात नहीं है। पहले इसी वर्गीकरण पर सीमा शुल्क विभाग में झगड़ा होता था और खेप बंदरगाह पर अटक जाती थी। नाम लिख देने से वह झगड़ा ख़त्म हो गया।
आगे दो सवाल हैं। पहला — ख़रीदार कहां हैं। भारत के स्वाभाविक बाज़ार पड़ोस और खाड़ी हैं: बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, यूएई, ओमान और पूर्वी अफ्रीका। चार साल की गैरहाज़िरी में ये बाज़ार दूसरे देशों के पास चले गए। ग्राहक खोना जितना आसान है, वापस लाना उतना ही धीमा। दूसरा — नीति टिकेगी या नहीं। मिल मालिक साल भर का सौदा तभी करेगा जब उसे भरोसा हो कि बीच में फिर रोक नहीं लगेगी। 2022 की याद अभी ताज़ा है।
इसका रचनात्मक हल भरोसे में है, रियायत में नहीं। सरकार पहले से बता दे कि किस हालत में — कितने स्टॉक या किस घरेलू भाव पर — पाबंदी लौट सकती है। इससे किसान, मिल और ख़रीदार, तीनों एक जाने-पहचाने नियम के हिसाब से योजना बना सकेंगे, और सरकार का एक रुपया भी ख़र्च नहीं होगा। साथ ही आटा एक खाद्य उत्पाद है, इसलिए गुणवत्ता और प्रमाणन की सुविधा बंदरगाह के बजाय मिल के पास चाहिए। दरवाज़ा खुल गया है। अब कारोबार बनाना बाकी है।












