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वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट में फैसला सुरक्षित

by ब्लिट्ज़ इंडिया
May 30, 2025
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These cities of the state have the most Waqf properties
ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संशोधन एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर तीन दिनों तक चली सुनवाई पूरी हो गई है। शीर्ष अदालत ने तीन मुद्दों पर अपना अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया। इसमें ‘अदालतों द्वारा वक्फ, वक्फ बाई यूजर या वक्फ बाई डीड’ घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की शक्ति भी शामिल है।

सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने संशोधित वक्फ कानून का विरोध करने वाली याचिकाओं को सुना। इन याचिकाओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, राजीव धवन और अभिषेक सिंघवी और केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें लगातार तीन दिन तक सुनीं, जिसके बाद अपना अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया।

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दृढ़ता से समर्थन
केंद्र ने इस अधिनियम का दृढ़ता से समर्थन करते हुए कहा कि वक्फ अपनी प्रकृति से ही एक धर्मनिरपेक्ष अवधारणा है। संवैधानिकता की धारणा इसके पक्ष में होने की वजह से इस पर रोक नहीं लगाई जा सकती। वहीं, याचिकाकर्ताओं की पैरवी कर रहे कपिल सिब्बल ने इस कानून को ऐतिहासिक कानूनी और संवैधानिक सिद्धांतों से पूर्ण विचलन और गैर-न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से वक्फ पर कब्जा करने का जरिया बताया।

सीजेआई गवई बोले
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धार्मिक दान केवल इस्लाम तक सीमित नहीं है। सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि हिंदू धर्म में भी मोक्ष की अवधारणा है। दान अन्य धर्मों की भी एक मौलिक अवधारणा है। पीठ के दूसरे न्यायाधीश जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने कहा कि ईसाई धर्म में इसी प्रकार के प्रावधान का उल्लेख है। उसमें स्वर्ग की आकांक्षा होती है।

कपिल सिब्बल ने सुनवाई के दौरान क्या कहा
कपिल सिब्बल ने कहा कि यह वक्फ संपत्तियों पर सुनियोजित तरीके से कब्जा करने का मामला है। सरकार यह तय नहीं कर सकती कि कौन से मुद्दे उठाए जा सकते हैं। मौजूदा स्तर पर याचिकाकर्ताओं ने तीन प्रमुख मुद्दों पर अंतरिम आदेश पारित करने का अनुरोध किया है। इनमें से पहला मुद्दा अदालतों की ओर से वक्फ, वक्फ बाई यूजर या वक्फ बाई डीड घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की शक्ति से जुड़ा हुआ है।

शीर्ष कोर्ट में तीन मुद्दों पर चर्चा
दूसरा मुद्दा राज्य वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि पदेन सदस्यों को छोड़कर केवल मुसलमानों को ही राज्य वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में काम करना चाहिए। तीसरा मुद्दा उस प्रावधान से जुड़ा है, जिसमें कहा गया है कि जब कलेक्टर यह पता लगाने के लिए जांच करते हैं कि संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं, तो वक्फ संपत्ति को वक्फ नहीं माना जाएगा।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दिया था हलफनामा
केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने 25 अप्रैल को संशोधित वक्फ अधिनियम 2025 का समर्थन करते हुए 1,332 पन्नों का एक प्रारंभिक हलफनामा दायर किया था। शीर्ष अदालत की ओर से संसद से पास ऐसे कानून पर रोक लगाने का विरोध किया था संवैधानिकता की धारणा जिसके पक्ष में है। केंद्र ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को पिछले महीने अधिसूचित किया था। इसे पांच अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिली थी।

लोकसभा और राज्यसभा से पारित हुआ वक्फ कानून
वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा में 288 सदस्यों के वोट से पास हुआ, वहीं 232 सांसद इसके खिलाफ थे। राज्यसभा में इसके पक्ष में 128 और विपक्ष में 95 सदस्यों ने मतदान किया। सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह भी नए वक्फ कानून को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच के सामने केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें रखीं।

तुषार मेहता की दलील
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किसी भी तरह के अंतरिम आदेश का विरोध करते हुए दलील दी कि अगर अंतिम सुनवाई के बाद कोर्ट को लगता है कि कानून असंवैधानिक है तो कोर्ट इसे रद कर सकता है लेकिन, अगर कोर्ट अंतरिम आदेश से कानून पर रोक लगाता है और इस दौरान कोई संपत्ति वक्फ को चली जाती है, तो उसे वापस पाना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि वक्फ अल्लाह का होता है और एक बार जो वक्फ हो गया, उसे पाना आसान नहीं होगा।

वक्फ बनाना और वक्फ को दान देना अलग हैं
सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि वक्फ बनाना और वक्फ को दान देना दोनों अलग हैं। यही कारण है कि मुसलमानों के लिए 5 साल की प्रैक्टिस की जरूरत रखी गई है, ताकि वक्फ का इस्तेमाल किसी को धोखा देने के लिए न किया जाए।


– केंद्र ने किया वक्फ कानून का सपोर्ट
– सिब्बल ने कानून को वक्फ पर कब्जा करने का जरिया बताया

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