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23 पदक, जूडो में पहला सोना और दस मुक्केबाज़ जिन्हें आज एक-एक करके जीतना है

by ब्लिट्ज़ इंडिया
August 1, 2026
in the blitz, खेल, खेल-फ़िल्म
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली।ग्लासगो में भारत का अभियान आख़िरी मोड़ पर है — और इस बार सबसे बड़ी ख़बर उस खेल से आई है जिसमें भारत ने आज तक कभी सोना नहीं जीता था। राष्ट्रमंडल खेलों के आठवें दिन तक भारत के खाते में 23 पदक आ चुके हैं — 5 स्वर्ण, 12 रजत और 6 कांस्य। खेल कल यानी 2 अगस्त को ख़त्म हो रहे हैं। दस भारतीय मुक्केबाज़ फ़ाइनल में पहुँचे हैं, जो किसी भी राष्ट्रमंडल खेल में भारत का सबसे बड़ा आँकड़ा है — और मुक़ाबला शुरू होने से पहले ही इन सबका कम से कम रजत पक्का है।

दिन की सबसे यादगार कहानी जूडो की है। अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलो वर्ग के फ़ाइनल में कनाडा की हेइडी क्वाच को युको से हराया। मुक़ाबला बराबरी पर पहुँचा, गोल्डन स्कोर यानी जूडो का सडन डेथ लगा, और उसी में अस्मिता ने बाज़ी मार ली। वह राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो का स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं। कुछ ही मिनट बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किलो वर्ग में ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ काट्ज़ को वाज़ा-आरी से हरा दिया — काट्ज़ ओलंपियन हैं और चार बार के ओशिनिया चैंपियन। यामिनी मौर्या ने 57 किलो वर्ग में रजत जीतकर भारत के अब तक के सबसे अच्छे जूडो अभियान को पूरा किया।

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जिस खेल में कभी सोना नहीं मिला था: अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने कुछ ही मिनटों के अंतर पर जूडो के स्वर्ण जीते, और यामिनी मौर्या ने रजत।
किसी नए खेल का पहला सोना, पुराने खेल के पाँचवें सोने से ज़्यादा मायने रखता है। वह देश को उसके बारे में कुछ ऐसा बताता है जो उसे पहले पता नहीं था।

एक नज़र में

• आठवें दिन तक भारत: 23 पदक — 5 स्वर्ण, 12 रजत, 6 कांस्य
• जूडो: अस्मिता डे (महिला 48 किलो) और हर्ष सिंह (पुरुष 60 किलो) — भारत के पहले जूडो स्वर्ण; यामिनी मौर्या को 57 किलो में रजत
• अस्मिता का फ़ाइनल: कनाडा की हेइडी क्वाच को गोल्डन स्कोर में युको से हराया
• हर्ष का फ़ाइनल: ऑस्ट्रेलिया के ओलंपियन जोशुआ काट्ज़ को वाज़ा-आरी से हराया
• भाला फेंक: नीरज चोपड़ा को रजत, सर्वश्रेष्ठ थ्रो 85.83 मीटर — 2018 के स्वर्ण के बाद उनका दूसरा राष्ट्रमंडल पदक
• कांस्य: यश वीर सिंह, 85.41 मीटर — निजी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
• स्वर्ण: श्रीलंका के रुमेश थरंगा पथिराज, 89.75 मीटर
• मुक्केबाज़ी: दस भारतीय फ़ाइनल में — सभी के कम से कम रजत पक्के
• खेल ख़त्म: 2 अगस्त

भाला फेंक का फ़ाइनल स्कोरबोर्ड पर जैसा दिखता है, असल में उससे बेहतर नतीजा है। नीरज चोपड़ा ने 85.83 मीटर फेंककर रजत जीता। स्वर्ण श्रीलंका के रुमेश थरंगा पथिराज को मिला, जिन्होंने दूसरे ही प्रयास में 89.75 मीटर की दूरी नाप ली। यश वीर सिंह ने 85.41 मीटर के साथ अपना अब तक का सबसे अच्छा थ्रो फेंका और कांस्य जीत लिया। एक ही पोडियम पर दो भारतीय — यह किसी एक शाम की क़िस्मत नहीं, बल्कि कोचिंग और तैयारी के ढाँचे का नतीजा है। और यश वीर का निजी रिकॉर्ड बड़े फ़ाइनल में आया, जो खेल की सबसे मुश्किल जगह मानी जाती है। नीरज का अपना सफ़र अब आठ साल में गोल्ड कोस्ट के स्वर्ण से ग्लासगो के रजत तक फैला है — उस खेल में, जिसे एक पीढ़ी पहले भारत गंभीरता से खेलता ही नहीं था।

आज का दिन मुक्केबाज़ी का है, और यहाँ जो हो चुका है उसे ठीक से समझना ज़रूरी है। दस फ़ाइनलिस्ट का मतलब है दस अलग-अलग ड्रॉ, दस बार सेमीफ़ाइनल का दबाव झेलना, और एक ऐसी टीम जो ऊपर से नहीं, जड़ से मज़बूत है। पूरे दल के 12 रजत और 5 स्वर्ण भी यही बात दूसरी तरह से कहते हैं — भारत फ़ाइनल तक बड़ी संख्या में पहुँच रहा है, और यही वह हिस्सा है जिसे बनाने में दस साल की कोचिंग, सुविधाएँ और अंतरराष्ट्रीय अनुभव लगते हैं। फ़ाइनल जीतना उसके मुक़ाबले आसान काम है, क्योंकि वह अनुभव अपने आप जुड़ता जाता है। ग्लासगो के बाद सबसे उपयोगी काम बिल्कुल साफ़ है: जूडो और मुक्केबाज़ी संघों ने पिछले चार साल में जो किया — कोच चुने, कैलेंडर बनाया, खिलाड़ियों को विदेश भेजा, स्पोर्ट्स साइंस जोड़ी — उसे लिखकर दर्ज किया जाए और दो-तीन दूसरे खेलों में वैसे ही लागू किया जाए। तरीक़ा काम कर रहा है, यह ग्लासगो ने दिखा दिया है। अब इसे संयोग मानना बंद करने का समय है।

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