ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।जून की ख़राब शुरुआत को जुलाई ने काफ़ी हद तक सँभाल लिया था। अब मौसम विभाग ने जो अनुमान दिया है, वह किसानों से कम बारिश के हिसाब से तैयारी करने को कह रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने शुक्रवार को कहा कि अगस्त में देश के ज़्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने के आसार हैं — यानी दीर्घावधि औसत के 94% से भी कम। विभाग के मुताबिक़ मानसून के बचे हुए दोनों महीनों, अगस्त और सितंबर, में बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना है।
इस अनुमान को समझने के लिए कुछ पैमाने ज़रूरी हैं। अकेले अगस्त का दीर्घावधि औसत 254.9 मिलीमीटर है और अगस्त-सितंबर मिलाकर 422.8 मिलीमीटर — दोनों 1971 से 2020 के रिकॉर्ड के आधार पर। मौसम विभाग ने कुछ इलाक़ों को इससे अलग रखा है, जहाँ सामान्य या उससे ज़्यादा बारिश हो सकती है: प्रायद्वीपीय भारत के पूर्वी हिस्से, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कुछ भाग, और पूर्व तथा पूर्वोत्तर के कुछ छोटे इलाक़े। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अनुमान यह भी कहते हैं कि सितंबर में हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) की सकारात्मक स्थिति बन सकती है, जो आमतौर पर भारतीय मानसून के लिए अच्छी मानी जाती है।
बुआई हो चुकी, दाना भरना बाक़ी है: अगस्त-सितंबर की बारिश अब बुआई नहीं, बल्कि पैदावार तय करेगी।
वक़्त पर मिला अनुमान बुरी ख़बर नहीं होता। यही फ़र्क़ है एक सँभाले गए सीज़न और एक झेले गए सीज़न में।
एक नज़र में
• आईएमडी का अनुमान (31 जुलाई): अगस्त में ज़्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश — दीर्घावधि औसत के 94% से नीचे
• बचा हुआ सीज़न: अगस्त और सितंबर, दोनों में बारिश सामान्य से कम रहने के आसार
• अगस्त का दीर्घावधि औसत: 254.9 मिलीमीटर
• अगस्त-सितंबर का औसत: 422.8 मिलीमीटर
• आधार अवधि: 1971 से 2020
• अपवाद: पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कुछ हिस्से, पूर्व-पूर्वोत्तर के कुछ इलाक़े
• सितंबर का संकेत: हिंद महासागर द्विध्रुव की सकारात्मक स्थिति बनने की संभावना, जो मानसून के लिए अनुकूल मानी जाती है
यह अनुमान अभी आया है, इसीलिए इसे सँभाला जा सकता है। देश के ज़्यादातर हिस्सों में बुआई हो चुकी है। अगस्त-सितंबर की बारिश अब यह तय करेगी कि खेत में खड़ी फ़सल में दाना कितना भरता है — यानी सवाल बुआई का नहीं, पैदावार का है। इससे ज़रूरी काम भी बदल जाते हैं: अब बीज बाँटने से ज़्यादा ज़रूरी है सिंचाई का इंतज़ाम। और इस मोर्चे पर भारत पहले से कहीं बेहतर स्थिति में है — जुलाई की बारिश से जलाशयों में पानी जमा हुआ है, पिछले दो सीज़न में भूजल का स्तर सुधरा है, और सुनिश्चित सिंचाई वाला रक़बा दस साल पहले के मुक़ाबले काफ़ी बड़ा है।
यहाँ से चार काम सबसे ज़्यादा असर करेंगे, और चारों मुश्किल नहीं हैं — बशर्ते अगस्त के पहले हफ़्ते में शुरू हों, आख़िरी हफ़्ते में नहीं। पहला, जलाशयों से पानी छोड़ने की योजना अभी कम बारिश के हिसाब से बने, सितंबर में कमी दिखने के बाद नहीं। दूसरा, दाना भरने के दिनों में पंप सेट के लिए भरोसेमंद बिजली — किसान के लिए इस वक़्त इससे बड़ी कोई मदद नहीं, क्योंकि यही ज़मीन के नीचे जमा पानी को पैदावार में बदलती है। तीसरा, कब और कितना पानी देना है, इसकी सलाह किसान तक नोटिस बोर्ड से नहीं, मोबाइल फ़ोन से पहुँचे। और चौथा, जिन ज़िलों को मौसम विभाग ने चिह्नित किया है, वहाँ फ़सल बीमा का आकलन पहले से तैयार रखा जाए ताकि दावा उसी सीज़न में निपटे। 1 अगस्त को मिला अनुमान असल में छह हफ़्ते की चेतावनी है — और छह हफ़्ते काफ़ी होते हैं।














