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लेजर लाइट से चलेगी सबमरीन

भारत ने बनाई रिंग लेजर जिरोस्कोप तकनीक

by ब्लिट्ज़ इंडिया
December 20, 2025
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। भारत ने पनडुब्बियों के लिए अत्याधुनिक रिंग लेजर जिरोस्कोप (आरएलजी) तकनीक के विकास की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सबमरीन कार्यक्रमों के लिए नेविगेशन टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता की ओर यह एक महत्वपूर्ण छलांग मानी जा रही है। अब तक यह क्षेत्र उन्नत विदेशी सप्लायर्स के हाथों में रहा है। आरएलजी आधारित इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम विकसित करने के बाद भारत पानी के नीचे अत्यधिक सटीक नेविगेशन में स्वदेशी समाधान पर निर्भर हो सकेगा।
पनडुब्बियों में जीपीएस सिग्नल नहीं पहुंचता। इसलिए उन्हें सही लोकेशन और दिशा बनाए रखने के लिए इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम पर ही निर्भर रहना पड़ता है। दुनिया की आधुनिक सबमरीन आरएलजी-आधारित आईएनएस का इस्तेमाल करती हैं क्योंकि यह बिना किसी बाहरी संदर्भ के हफ्तों से लेकर महीनों तक बेहद सटीक नेविगेशन प्रदान करती है। भारत में यह तकनीक विकसित होने से रणनीतिक स्वायत्तता के साथ-साथ नेवी की मौजूदा और आने वाली पनडुब्बी फ्लीट की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।
आरएलजी एक हाई-प्रिसीजन डिवाइस है जो किसी भी घूमने वाली गति को लेजर लाइट की मदद से मापती है। पुराने मैकेनिकल जाइरोस्कोप जहां घूमते हुए रोटर्स पर आधारित थे। वहीं आरएलजी पूरी तरह सॉलिड-स्टेट टेक्नोलॉजी है। इसमें कोई चलने वाला हिस्सा नहीं होता। इसमें एक बंद ऑप्टिकल पाथ के भीतर दो लेजर बीम उल्टी दिशाओं में घूमती हैं। जैसे ही पूरा सेटअप घूमता है, दोनों बीम में फ्रीक्वेंसी का अंतर पैदा होता है। इसी अंतर से घुमाव की गति मापी जाती है।
भारत जिन आरएलजी-आईएनएस पर काम कर रहा है, वे तीन ऑर्थोगोनल आरएलजी यूनिट और हाई-ग्रेड एक्सेलेरोमीटर के संयोजन से एक पूरी स्ट्रैप-डाउन नेविगेशन प्रणाली बनाते हैं। यह सिस्टम कई हफ्तों तक बिना जीपीएस या किसी बाहरी इनपुट के पनडुब्बी को मार्गदर्शन दे सकता है।
एसएसबीएनएस के लिए गेम-चेंजर
परमाणु मिसाइल पनडुब्बियां 70-90 दिनों तक पूरी तरह साइलेंट मोड में रहती हैं। यहां तक कि जीपीएस सिग्नल लेना भी उनकी लोकेशन उजागर कर सकता है। आरएलजी-आईएनएस उनके लिए जरूरी है क्योंकि इसमें नेविगेशन ड्रिफ्ट बेहद कम होता है। इसके मुकाबले फाइबर-ऑप्टिक जाइरो (एफओजी), जो स्कॉर्पीन-क्लास में लगा है, ज्यादा कंपन-संवेदनशील है। इतना सटीक नहीं माना जाता। आरएलजी शॉक-प्रूफ है। किसी वार्म-अप टाइम की जरूरत नहीं होती। टॉरपीडो ब्लास्ट होने पर भी प्रदर्शन प्रभावित नहीं होता।
एलिट क्लब में शामिल हुआ भारत
आरएलजी तकनीक को डिजाइन और इंडस्ट्री-ग्रेड आईएनएस में बदल पाने की क्षमता अभी केवल कुछ देशों के पास है। इनमें अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन शामिल हैं। यह भारत की तकनीकी परिपक्वता को दर्शाता है। विदेशी सप्लायर पर निर्भरता या युद्धकाल में सिस्टम के साथ छेड़छाड़ की आशंका समाप्त हो जाएगी। यह कदम भारत की पनडुब्बी क्षमता को नए आयाम देने वाला साबित होगा।

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