ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।जीडीपी का आंकड़ा टीवी पर एक मिनट चलता है और उतर जाता है। 31 अगस्त को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने अप्रैल-जून की तिमाही के जो आंकड़े जारी किए, उनमें असली ख़बर उस मुख्य आंकड़े में नहीं है। वह उस परिशिष्ट में है जिसे कोई नहीं पढ़ता- उन बत्तीस संकेतकों की सूची में, जिनसे यह पूरा हिसाब बनता है।
वहां अर्थव्यवस्था वैसी नहीं दिखती जैसी वह प्रतिशत में दिखती है। वहां वह ट्रैक्टर, तिपहिया, रेल का डिब्बा और खेत की मेड़ बनकर दिखती है।
पहले खेत
खेती और उससे जुड़े कामों का उत्पादन इस तिमाही में 3.6 फ़ीसदी बढ़ा। यह कोई चौंकाने वाला आंकड़ा नहीं है और यही इसकी ख़ूबी है — खेती में स्थिरता ही सबसे बड़ी ख़बर होती है। कुल खाद्यान्न उत्पादन 4.8 फ़ीसदी और चावल 6.2 फीसदी ऊपर है। गेहूं में बढ़त सिर्फ़ 0.5 फ़ीसदी रही, जो कम है, पर घटी नहीं है।
इसके साथ एक और आंकड़ा पढ़िए। यूरिया और पोषक तत्व आधारित खाद की सब्सिडी 57.6 फ़ीसदी बढ़ी है। यानी खेत तक खाद पहुंचाने पर सरकार का ख़र्च डेढ़ गुना से ज़्यादा हो गया। किसान के लिए इसका मतलब सीधा है — बोरी का दाम वही रहा, और अंतर सरकार ने उठाया।
खेती में स्थिरता ही सबसे बड़ी ख़बर होती है। इस तिमाही में खेती ने वही किया जो उससे उम्मीद थी।
फिर सड़क
तिपहिया वाहनों की घरेलू बिक्री 29.7 फ़ीसदी बढ़ी है। यह आंकड़ा जितना छोटा दिखता है, उतना है नहीं। तिपहिया वाहन शौक़ से नहीं खरीदा जाता — वह कमाई का साधन होता है। जब तीस फीसदी ज़्यादा ऑटो और लोडर बिकते हैं, तो तीस फीसदी ज़्यादा परिवार यह मानकर क़र्ज़ उठाते हैं कि अगले साल सवारी और सामान दोनों मिलेंगे।
व्यावसायिक वाहनों की बिक्री 18.3 फीसदी और माल ढोने वाले वाहनों का पंजीकरण 20.1 फीसदी बढ़ा है। एक साल पहले इन्हीं आंकड़ों में हलचल नहीं थी। घरेलू वाहनों का पंजीकरण 15.9 फीसदी ऊपर है।
तिमाही, घर की भाषा में
• खेती और सहायक काम — 3.6% बढ़े
• खाद्यान्न 4.8%, चावल 6.2% ऊपर
• खाद सब्सिडी 57.6% बढ़ी
• तिपहिया बिक्री 29.7% ऊपर
• व्यावसायिक वाहन 18.3% ऊपर
• रेल यात्री किलोमीटर 8.3% बढ़े
• बिजली उत्पादन सूचकांक 9.3% ऊपर
• निर्माण क्षेत्र 7.7% बढ़ा
और फिर पटरी
रेलवे में यात्री प्रति किलोमीटर 8.3 फीसदी बढ़े हैं। पिछले साल इसी तिमाही में यह बढ़त 3.0 फीसदी थी। यह लगभग तिगुनी रफ़्तार है, और इसका मतलब है कि लोग ज्यादा दूर तक जा रहे हैं — काम के लिए, इलाज के लिए, पढ़ाई के लिए। दूसरी तरफ़ माल की ढुलाई में नेट टन किलोमीटर 0.7 फीसदी घटे हैं। एक ही विभाग के दो आंकड़े, दो अलग दिशाएं।
बिजली उत्पादन का सूचकांक 9.3 बढ़ा है, जबकि पिछले साल इसी तिमाही में यह 1.5 फीसदी घटा था। सीमेंट का सूचकांक 8.9 फीसदी और तैयार इस्पात की खपत 8.3 फीसदी ऊपर है। निर्माण क्षेत्र 7.7 फीसदी बढ़ा। बिजली, सीमेंट और लोहा — तीनों एक साथ बढ़ें तो कहीं कुछ बन रहा होता है।
एक आंकड़ा जो ठहरकर पढ़ने लायक़ है
पूरी तिमाही में सबसे बड़ी बात यह है कि निवेश ने खपत की बराबरी कर ली। ब्लिट्ज ने प्रेस नोट के दूसरे विवरण से ख़ुद जोड़कर देखा है — कुल 7.8 फ़ीसदी की बढ़त में परिवारों के ख़र्च का हिस्सा 3.95 प्रतिशत अंक है और स्थायी पूंजी निर्माण, यानी कारख़ाना-मशीन-सड़क-गोदाम बनाने का हिस्सा भी 3.95 प्रतिशत अंक। दोनों बराबर। यह आंकड़ा प्रेस नोट में कहीं छपा नहीं है; यह इसी डेस्क की गणना है।
खपत से बढ़ी अर्थव्यवस्था चीज़ें ख़र्च करके बढ़ती हैं। निवेश से बढ़ी अर्थव्यवस्था आगे ज्यादा बनाने की ताक़त बनाकर बढ़ती है। इस तिमाही में भारत ने दोनों बराबर किए हैं, और दूसरा वाला ही आने वाले सालों में नौकरी बनकर लौटता है।
भारत और भारतवासी को इससे क्या मिलता है
जिस तिमाही में मशीन का आयात 51.5 फीसदी और पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन 15.2 फीसदी बढ़ता है, उस तिमाही में कारख़ाने की नींव पड़ रही होती है। नींव तीन साल बाद निर्यात का ऑर्डर बनती है, और ऑर्डर नौकरी बनता है। दुनिया के पैमाने पर इसका मतलब यह है कि भारत सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ-साथ अब उन गिनी-चुनी अर्थव्यवस्थाओं में है जिनकी बढ़त के पीछे एक ऐसा ढांचा दिखता है जिसे कोई विदेशी निवेश समिति जांच सकती है और भारतवासी के लिए इसका मतलब उतना ही सीधा है — ज्यादा तिपहिया, ज्यादा रेल, ज्यादा बिजली, और खेत पर वही पुरानी क़ीमत।









