ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।भारतीय विज्ञान का सबसे कठिन हिस्सा प्रयोगशाला नहीं है। सबसे कठिन हिस्सा वे बीस मीटर हैं जो एक काम करते नमूने और उसे बनाने को तैयार किसी कंपनी के बीच पड़ते हैं। इस हफ़्ते भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के सूचना पट पर टँगे तीन नोटिस वही बीस मीटर हैं।
तीनों तकनीक हस्तांतरण (ट्रांसफ़र ऑफ़ टेक्नोलॉजी) के लिए रुचि पत्र माँगते हैं, और तीनों की आख़िरी तारीख़ 4 सितंबर 2026 है।
क्या दिया जा रहा है
पहला है डेंगू की जाँच का ड्यूल-ट्यूब वन-स्टेप आरटी मल्टीप्लेक्स पीसीआर एसे। डेंगू चार अलग-अलग प्रकारों (सीरोटाइप) से होता है, और मरीज़ को कौन सा है, यह जानना ज़रूरी होता है — दूसरी बार दूसरे प्रकार का संक्रमण ही ख़तरनाक होता है। मल्टीप्लेक्स का मतलब है एक ही प्रतिक्रिया में एक से ज़्यादा चीज़ें खोजना। वन-स्टेप आरटी का मतलब है कि वायरस के आरएनए को डीएनए में बदलने और फिर उसे बढ़ाने का काम एक ही बंद ट्यूब में हो जाता है — ज़िला स्तर की प्रयोगशाला में यह आधी मेहनत और आधा जोखिम है।
दूसरा है पेट के दो परजीवियों में फ़र्क़ बताने वाला मल्टीप्लेक्स क्यूपीसीआर किट — जिआर्डिया लैंब्लिया और एंटअमीबा। दोनों से लंबा दस्त होता है, दोनों की दवा अलग है, और अब तक दोनों की पहचान माइक्रोस्कोप से होती रही है। डीएनए से पहचान करने वाला किट अनुमान को नतीजे में बदल देता है।
तीसरा है आपस में जुड़े ख़ानों वाली कोशिका संवर्धन प्लेट (सेल कल्चर प्लेट)। साधारण प्लेट में हर ख़ाना अलग रहता है। ख़ाने आपस में जुड़ जाएँ तो एक कोशिका समूह दूसरे को प्रभावित कर सकता है — यहीं से किसी अंग का नमूना बनाना शुरू होता है। यह प्रयोगशाला का वह उपकरण है जो भारत आमतौर पर आयात करता है।
प्रयोगशाला से कारख़ाने तक की स्थिति
यह हिस्सा प्रायः छूट जाता है, इसलिए साफ़ लिखना ज़रूरी है। तकनीक हस्तांतरण का निमंत्रण तब निकलता है जब आविष्कार इतना पूरा हो कि कोई और उसे बना सके, और इतना पूरा न हो कि वह उत्पाद हो। बौद्धिक संपदा परिषद के पास रहती है; निर्माण, नियामक फ़ाइल और वितरण नहीं। दोनों जाँच किटों के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की मंज़ूरी अलग से लेनी होगी, और वह इस हस्तांतरण का हिस्सा नहीं है। परिषद इसके लिए पेटेंट मित्र नाम का अलग रास्ता चलाती है।
यानी सही स्थिति यह है — तीन भारतीय आविष्कार बनने के लिए तैयार हैं, और वे बनेंगे या नहीं, यह इस पर टिका है कि शुक्रवार तक कोई भारतीय कंपनी जवाब देती है या नहीं।
उसी काम का दूसरा आधा हिस्सा
परिषद के दो और खुले प्रस्ताव इसी कहानी के हैं। मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों में वायरस अनुसंधान एवं निदान प्रयोगशालाएँ (वीआरडीएल) स्थापित करने के लिए प्रस्ताव माँगे गए हैं, आख़िरी तारीख़ 30 सितंबर 2026; और पूर्वोत्तर राज्यों में तकनीकी संसाधन केंद्रों के लिए रुचि पत्र, आख़िरी तारीख़ 15 सितंबर। जाँच किट उतनी ही काम की होती है जितनी उसे चलाने वाली प्रयोगशाला। किट बनवाना और प्रयोगशालाओं का जाल फैलाना — ये एक ही काम के दो आधे हिस्से हैं।
भारत और भारतवासी को क्या मिलता है। डेंगू और परजीवी की जो जाँच आज आयातित किट पर होती है, वह विदेशी मुद्रा का भुगतान भी है और किसी और के हाथ की आपूर्ति शृंखला भी। भारत में बनी, भारत में डिज़ाइन की गई आणविक जाँच दोनों की जगह लेती है, और आगे चलकर उन्हीं देशों को जाती है जहाँ भारत पहले से दवा भेजता है। मरीज़ के लिए फ़ायदा और सीधा है — राय के बजाय नाम, और पहली ही बार सही दवा।
केवल सुधारात्मक सुझाव के तौर पर — व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण तीन तकनीक हस्तांतरण प्रस्तावों की समय-सीमा 4 सितंबर रखी गई है, और जिस तकनीकी ब्योरे से कोई कंपनी उन्हें परख सकती है वह नोटिस के बजाय दस्तावेज़ के भीतर है। नोटिस पर ही एक पैराग्राफ़ का तकनीकी सार, और सामान्य निविदा से लंबी अवधि, जवाब देने वालों की संख्या बढ़ा देगी।
स्रोत भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद, What’s New, icmr.gov.in, इस डेस्क द्वारा 2 सितंबर 2026 को पढ़ा गया — तकनीक हस्तांतरण के तीनों रुचि पत्र आमंत्रण, तीनों की आख़िरी तारीख़ 4 सितंबर 2026; वीआरडीएल के लिए प्रस्ताव आमंत्रण, आख़िरी तारीख़ 30 सितंबर 2026; पूर्वोत्तर राज्यों में तकनीकी संसाधन केंद्रों के लिए रुचि पत्र, आख़िरी तारीख़ 15 सितंबर 2026। · जो इस्तेमाल नहीं हुआ, और क्यों: वीआरडीएल का दस्तावेज़ खुला तो सही, पर दोनों बार उसमें पढ़ने योग्य पाठ नहीं मिला, इसलिए कितनी प्रयोगशालाएँ माँगी गई हैं यह यहाँ नहीं छपा है। किसी द्वितीयक रिपोर्ट का उपयोग नहीं किया गया, और तीनों तकनीकों के प्रदर्शन पर परिषद के अपने विवरण से आगे कोई दावा नहीं किया गया।










