ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।चालीस साल पहले बनी एक योजना, जो किसी कारख़ाने को पूरा संयंत्र एक ही सरल बिल पर मँगाने देती है, अब एक अड़चन में फँसी है। अड़चन का शुल्क दरों से कोई लेना-देना नहीं। कहीं यह लिखा ही नहीं गया कि यह काम कब तक ख़त्म होना है।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की निष्पादन लेखापरीक्षा रिपोर्ट संख्या 27, 2026 — विषय प्रोजेक्ट इम्पोर्ट्स योजना, संघ सरकार, राजस्व विभाग (अप्रत्यक्ष कर — सीमा शुल्क), 31 मार्च 2024 को समाप्त वर्ष के लिए — 12 अगस्त 2026 को संसद में प्रस्तुत की गई। लेखा-परीक्षक ने इस पर अपनी प्रेस टिप्पणी अगले दिन जारी की।
रिपोर्ट में 36 लेखापरीक्षा टिप्पणियाँ और 11 सिफ़ारिशें हैं। इसका राजस्व प्रभाव ₹128.58 करोड़ बताया गया है, और प्रक्रियागत अनियमितताएँ ₹2,979.33 करोड़ की हैं — ब्लिट्ज़ की अपनी गणना में, राजस्व वाले आँकड़े का 23.17 गुना। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड तथा क्षेत्रीय कार्यालयों के उत्तर रिपोर्ट में शामिल किए जा चुके हैं।
योजना बनी किसलिए थी
प्रोजेक्ट इम्पोर्ट रेगुलेशंस, 1986 के तहत कोई औद्योगिक परियोजना लगाने वाला आयातक पूरे अनुबंध को सीमा शुल्क के पास पंजीकृत करा सकता है और मशीनरी, उपकरण, कल-पुर्ज़े सब एक ही वर्गीकरण पर, एक ही दर से मँगा सकता है — हर वस्तु का अलग वर्गीकरण और अलग आकलन कराने के बजाय। दस हज़ार मदों वाले संयंत्र के लिए यह अंतर परियोजना और काग़ज़ी क़वायद के बीच का अंतर है।
शर्त यह है कि रियायत परियोजना से बँधी है। सामान उसी संयंत्र में लगना चाहिए, और अनुबंध अंत में इस प्रमाण के साथ बंद होना चाहिए कि वह लगा — संस्थापन प्रमाणपत्र, संयंत्र स्थल सत्यापन, समाधान विवरण, प्रवेश बिल, चालान और अंतिम भुगतान प्रमाणपत्र।
जिस रियायत की कोई अंतिम तिथि न हो, वह रियायत नहीं, खुली फ़ाइल है।
एक आँकड़ा जो हमने नहीं छापा
• इस रिपोर्ट के एक व्यापक रूप से प्रसारित द्वितीयक सारांश में राजस्व प्रभाव ₹2,128.58 करोड़ और प्रक्रियागत अनियमितताएँ ₹22,979.33 करोड़ बताई गईं।
• लेखा-परीक्षक की अपनी 13 अगस्त 2026 की प्रेस टिप्पणी में ₹128.58 करोड़ और ₹2,979.33 करोड़ दर्ज हैं।
• ब्लिट्ज़ ने लेखा-परीक्षक के आँकड़े छापे हैं। जहाँ सारांश और मूल दस्तावेज़ में अंतर हो, दस्तावेज़ ही चलेगा।
लेखा-परीक्षा ने क्या पाया
सबसे पहली और सबसे बड़ी बात कोई चूक नहीं, एक अभाव है। 1986 के नियम कोई समय-सीमा तय नहीं करते — न परियोजना के पंजीकरण के लिए, न पंजीकृत अनुबंध के तहत आयात पूरा करने के लिए। लेखा-परीक्षा दर्ज करती है कि तय समय-सीमा न होने से परियोजना की कार्य-योजना प्रभावित होती है, प्रक्रियागत अक्षमता झलकती है, आयात अनुपालन पर नियंत्रण कमज़ोर पड़ता है, और इससे शुल्क की चोरी, माल का हिसाब न रहना तथा सरकार को राजस्व की हानि हो सकती है (अनुच्छेद 2.1 और 2.2)।
बाक़ी बातें इसी एक अभाव से निकलती हैं। लेखा-परीक्षा ने पाया कि रियायत ऐसी परियोजनाओं और ऐसी मशीनरी को भी मिली जो अधिसूचित या पात्र नहीं थीं, जिसकी जड़ आकलन के समय पात्रता की जाँच में कमी है (अनुच्छेद 2.4 और 2.7)। जाँची गई 383 अंतिम रूप दी गई फ़ाइलों में से 57 में — ब्लिट्ज़ की गणना में 14.88 प्रतिशत — आठ आयुक्तालयों में अनुबंध बिना अनिवार्य संस्थापन प्रमाणपत्र, बिना निर्धारित संयंत्र स्थल सत्यापन और बिना दूसरे ज़रूरी दस्तावेज़ों के बंद कर दिए गए (अनुच्छेद 2.11 और 2.12)।
फिर देरी। योजना के तहत माल की निकासी में 3 से 1,149 दिन तक लगे — यानी उस उद्देश्य के ठीक उलट जिसके लिए सरलीकरण की योजना बनी थी, और राष्ट्रीय व्यापार सुविधा कार्य योजना के लक्ष्यों पर बोझ (अनुच्छेद 3.1)। अनुबंध पूरा होने के बाद भी प्रवेश बिल देर से और असंगत ढंग से अंतिम किए गए, और कुछ मामलों में अनुबंध बंद होने से पहले ही बिल अंतिम कर दिए गए (अनुच्छेद 3.3)। जहाँ अनुबंध लंबित थे वहाँ बैंक गारंटी और बॉण्ड नवीनीकृत नहीं हुए (अनुच्छेद 4.1), और पुष्ट माँगों की वसूली लंबित रही, जिससे सीमा-अवधि बीत जाने पर वसूली कठिन हो सकती है (अनुच्छेद 4.3)।
सिफ़ारिशें ग्यारह हैं, विचार एक
ग्यारहों सिफ़ारिशें साथ पढ़नी चाहिए, क्योंकि वे ग्यारह विचार नहीं हैं। एक ही विचार को ग्यारह जगह लगाया गया है — जाँच को व्यवस्था के भीतर डालिए, बाहर मत रखिए।
बोर्ड से कहा गया है कि पूरा आवेदन मिलने के बाद पंजीकरण पूरा करने की समय-सीमा तय करे, और 1986 के नियमों में संशोधन कर आयात पूरा करने तथा परियोजना बंद करने की समय-सीमा लिखे। इसके अलावा — आईसीईएस के पंजीकरण मॉड्यूल में स्वतः दस्तावेज़ जाँच, ताकि अनिवार्य दस्तावेज़ के बिना पंजीकरण हो ही न सके; ऐसी जाँच कि संस्थापन प्रमाणपत्र और स्थल सत्यापन रिपोर्ट अपलोड और सत्यापित हुए बिना कोई फ़ाइल अंतिम न हो; पंजीकरण की तिथि और वर्गीकरण से अपात्र अनुबंधों की स्वतः पहचान; हर प्रवेश बिल के ठहराव-समय की निगरानी; अनुबंध बंद होते ही उससे जुड़े बिलों का स्वतः सत्यापन; बॉण्ड और गारंटी की समाप्ति से पहले चेतावनी; संबंधित-पक्ष आयातों का विशेष मूल्यांकन शाखा को स्वतः संदर्भ; और पुष्ट माँगों तथा उन पर की गई वसूली का केंद्रीकृत डिजिटल ट्रैकर।
ग्यारहवीं सिफ़ारिश सबसे सीधी है। क्षेत्रीय कार्यालय परिपत्र संख्या 22/2011-सीमा शुल्क, दिनांक 4 मई 2011 में पहले से तय रिपोर्टिंग और निगरानी व्यवस्था का कड़ाई से पालन करें; प्रोजेक्ट इम्पोर्ट रजिस्टर डिजिटल रूप में रखे और समय-समय पर देखे जाएँ; और निष्पादन प्रबंधन महानिदेशालय आईसीईएस से जुड़ा एक स्वचालित डैशबोर्ड बनाए जो सभी आयुक्तालयों की लंबित स्थिति तत्क्षण दिखाए। यानी ढाँचा पंद्रह साल से मौजूद है। कमी सिर्फ़ इतनी रही कि रजिस्टर मशीन पढ़ने लायक़ नहीं था और उसे देखने के लिए कोई स्क्रीन नहीं थी।
रचनात्मक समापन
यह साफ़ कह देना चाहिए कि यह रिपोर्ट किसी ग़लत काम की नहीं है, और लेखा-परीक्षक उसे वैसे पेश भी नहीं करता। यह उस सुविधा-योजना की रिपोर्ट है जो अपने काग़ज़ी डिज़ाइन से आगे निकल आई है। हर सिफ़ारिश व्यवस्था को संबोधित है, किसी व्यक्ति को नहीं; बोर्ड के उत्तर रिपोर्ट अंतिम होने से पहले उसमें शामिल किए गए; और लगभग हर उपाय उस सॉफ़्टवेयर में एक जाँच-नियम जोड़ने भर का है जो पहले से चल रहा है।
दो बातें इसे और आगे ले जाएँगी, और दोनों बोर्ड की पहुँच में हैं। पहली, 1986 के नियमों में वही संशोधन जो लेखा-परीक्षक माँग रहा है — आयात पूरा करने और परियोजना बंद करने की एक तय समय-सीमा। चालीस साल किसी रियायत के बिना अंतिम तिथि के रहने के लिए लंबा समय है, और संशोधन लिखने में छोटा काम है। दूसरी, प्रकाशन। जब लेखा-परीक्षक का सुझाया आईसीईएस डैशबोर्ड बन जाए, तो आयुक्तालय-वार पंजीकृत, अंतिम और लंबित अनुबंधों का समय-समय पर सार्वजनिक विवरण आयातक को अपनी क़तार दिखा देगा। जो आयातक अपनी क़तार देख लेता है, वह अपनी फ़ाइल ख़ुद आगे बढ़वाता है। इससे सस्ता अनुपालन का तरीक़ा कोई नहीं।














