दीपक द्विवेदी
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार 9 जुलाई को मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में 30,000 से अधिक भारतीय समुदाय के लोगों की सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारत ‘चिप्स से शिप्स तक’ एक नया मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम खड़ा कर रहा है और घोषणा की कि ‘मेक इन इंडिया’ मिशन के 12 वर्षों ने इस पहल को एक वैश्विक ब्रांड बना दिया है।
इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की छह दिवसीय यात्रा के ऑस्ट्रेलियाई चरण में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की उपस्थिति में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि भारत में बने मोबाइल फोन, वाहन और रक्षा उपकरण आज अंतरराष्ट्रीय पहचान रखते हैं और देश का रक्षा क्षेत्र वैश्विक मंच पर क्षमता और विश्वसनीयता, दोनों का प्रतीक बन चुका है।
मेलबर्न का यह संबोधन उस संदेश की अगली कड़ी था, जिसे प्रधानमंत्री इस सप्ताह पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लेकर पहुंचे। यात्रा की शुरुआत जकार्ता से हुई, जहां मोदी ने इंडोनेशिया की संसद को संबोधित करते हुए भारत-इंडोनेशिया साझेदारी को ‘नया स्वर्णिम अध्याय’ बताया। दोनों देशों ने 20 समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें ‘मेक इन इंडिया’ के प्रमुख रक्षा निर्यात ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली पर सहयोग और महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रंखला को मजबूत करने के लिए इंडोनेशिया में स्टील, निकल और रेयर अर्थ मैग्नेट के विनिर्माण में भारतीय निवेश शामिल हैं।
इस मैन्युफैक्चरिंग पहल को इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो का उल्लेखनीय समर्थन मिला जिन्होंने मोदी से कहा कि उन्होंने भारत के ‘कई कार्यक्रमों की नकल की है’ क्योंकि जो भारत के करोड़ों लोगों के लिए सफल है, वह इंडोनेशिया के लिए भी सफल हो सकता है। राष्ट्रपति सुबियांतो ने मुस्कुराते हुए जोड़ा कि उन्हें खुशी है कि भारत की योजनाओं पर ‘कोई कॉपीराइट नहीं’ है।
मेलबर्न से प्रधानमंत्री यात्रा के अंतिम चरण में ऑकलैंड पहुंचे। यह चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की न्यूज़ीलैंड की पहली यात्रा रही। अप्रैल में हस्ताक्षरित भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते और वार्ता शुरू होने के बाद से द्विपक्षीय व्यापार में 72 प्रतिशत की वृद्धि की पृष्ठभूमि में, मोदी की प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन से वार्ता का विशेष महत्व रहा।
ए डवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग समेत प्रमुख क्षेत्रों के व्यापार शोकेस में कारोबारी नेताओं से मुलाकात और शनिवार को स्पार्क एरिना में ‘किया ओरा मोदी’ समारोह में 10,000 से अधिक प्रवासी भारतीयों को संबोधित करना उनके यात्रा कार्यक्रम का सबसे अहम हिस्सा रहा।
प्रधानमंत्री का यह आत्मविश्वास एक दशक की ठोस उपलब्धियों पर टिका है। सितंबर 2014 में शुरुआत के बाद से ‘मेक इन इंडिया’ के तहत 2014 से 2024 के बीच 667.4 अरब डॉलर का संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आया जो पिछले दशक की तुलना में 119 प्रतिशत अधिक है जबकि विनिर्माण क्षेत्र में एफडीआई इक्विटी 69 प्रतिशत बढ़कर 165.1 अरब डॉलर हो गई।
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत 2014 के 142वें स्थान से 63वें स्थान पर पहुंचा, वित्त वर्ष 2023-24 में वस्तु निर्यात 437 अरब डॉलर रहा, और 2017-18 से 2022-23 के बीच विनिर्माण रोजगार 5.7 करोड़ से बढ़कर 6.44 करोड़ हो गया। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं ने ₹1.32 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित किया और ₹10.9 लाख करोड़ का उत्पादन सृजित किया।
यह परिवर्तन रक्षा क्षेत्र में सबसे अधिक स्पष्ट है। रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 के ₹46,429 करोड़ से तीन गुना से अधिकबढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में रिकॉर्ड ₹1,50,590 करोड़ पर पहुंच गया, जबकि रक्षा निर्यात कुछ सौ करोड़ से बढ़कर ₹23,622 करोड़ हो गया, जो लगभग 100 देशों तक पहुंच रहा है।
इस उछाल की रीढ़ सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम रहे हैं। भारत आज अपने विमानवाहक पोत, पनडुब्बियां, लड़ाकू विमान, मिसाइलें और सेमी-हाई-स्पीड ट्रेनें स्वयं बनाता है, कोचीन शिपयार्ड के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से लेकर एचएएल के तेजस लड़ाकू विमान, मझगांव डॉक की पनडुब्बियों और भारतीय कारखानों से निकलती वंदे भारत ट्रेनों तक।
भारत मोबाइल फोन के शुद्ध आयातक से शुद्ध निर्यातक बन गया है और स्मार्टफोन विनिर्माण उन उभरते क्षेत्रों में शामिल है, जिन्हें प्रधानमंत्री ने मेलबर्न में सेमीकंडक्टर और संचार प्रौद्योगिकी के साथ रेखांकित किया।
मोदी ने विनिर्माण की इस प्रगति को भारत के नवाचार इंजन से भी जोड़ा और कहा कि देश कुछ सौ स्टार्टअप से बढ़कर दो लाख से अधिक स्टार्टअप तक पहुंच चुका है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम जिनमें सैकड़ों स्टार्टअप रक्षा और अंतरिक्ष जैसे उन्नत क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। ’मेक इन इंडिया’ अब अपने 2.0 चरण में 27 क्षेत्रों तक फैला है और आत्मनिर्भर भारत तथा विकसित भारत 2047 के विजन को गति दे रहा है।
जकार्ता की संसद से मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम और ऑकलैंड तक; इस सप्ताह के संबोधनों ने यह संकेत दिया कि भारत की विनिर्माण गाथा अब केवल एक घरेलू नीति कार्यक्रम नहीं, बल्कि विदेशों में भारत का परिचय पत्र बन चुकी है, जो जैसा प्रधानमंत्री ने प्रवासी भारतीयों से कहा, भारत के वैश्विक साझीदारों के लिए नए अवसर पैदा कर रही है।











