ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।रोज़ की खबरों के नीचे भारत का एक बड़ा और लंबा खेल चल रहा है — बिजली बनाने का तरीका बदलने का। देश अब अपनी कुल बिजली क्षमता का आधे से ज़्यादा हिस्सा गैर-कोयला (साफ) स्रोतों से जुटा रहा है। करीब 283 गीगावाट क्षमता लग चुकी है, यानी 2030 तक के 500 गीगावाट लक्ष्य का करीब 57% पूरा। इरादा, जो कभी सबसे मुश्किल हिस्सा था, अब तय हो चुका है; अब मेहनत उस ढांचे पर है जो साफ बिजली को भरोसेमंद सप्लाई में बदले।
रफ्तार सचमुच तेज़ हुई है। बीते वित्त वर्ष में रिकॉर्ड साफ ऊर्जा जोड़ी गई, अकेले सौर (सोलर) की कुल क्षमता 150 गीगावाट पार कर गई, और 2026 की पहली छमाही में ही रिकॉर्ड नई सौर और पवन बिजली लगी — जिसे घरों की छतों पर लगते सोलर पैनल की योजना ने खूब आगे बढ़ाया। साफ ऊर्जा की कुल क्षमता में भारत आज दुनिया के गिने-चुने बड़े देशों में है। मौजूदा रफ्तार से 500 गीगावाट का लक्ष्य गणित के हिसाब से पहुंच के भीतर है।
एक गीगावाट सोलर लगाना अब आसान हिस्सा है। साफ ऊर्जा की अगली दहाई तारों, बैटरियों और ज़मीन के मैदान में तय होगी।
ईमानदारी से देखें तो क्षमता और भरोसेमंद सप्लाई के बीच अब भी कुछ दीवारें हैं। सौर और पवन बिजली तभी बनती है जब धूप हो या हवा चले, ज़रूरी नहीं कि तभी जब मांग सबसे ज़्यादा हो। इसलिए असली अड़चनें अब हैं — दिनभर की बिजली को शाम तक ले जाने वाला भंडारण, उसे धूप वाले राज्यों से खपत वाले शहरों तक पहुंचाने वाली ट्रांसमिशन लाइनें, और बड़े प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन व मंज़ूरियां। ये सब एक और पैनल जोड़ने से कहीं कठिन काम हैं — और यहीं यह बदलाव सचमुच तय होगा।
बड़ी तस्वीर में अच्छी बात यह है कि ये सारी अड़चनें सुलझने वाली और एक-दूसरे को मज़बूत करने वाली हैं। हर बैटरी बैंक, हर नई ट्रांसमिशन लाइन और हर आसान हुई मंज़ूरी अगली साफ बिजली को पिछली से ज़्यादा उपयोगी बना देती है — और उस बिजली की कीमत घटाती है जिस पर कारखाने, खेत और घर चलेंगे। आगे का रास्ता भंडारण और ग्रिड को मुख्य किरदार मानने में है, ताकि आधा सफर 2030 तक चौबीसों घंटे की भरोसेमंद साफ बिजली में बदल जाए।













