ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।केंद्र ने गोबरधन योजना को 23,731 करोड़ रुपये के साथ मंज़ूरी दे दी है। पर असली बात रक़म नहीं है। असली बात यह है कि अब गोबर और पराली का ख़रीदार तय हो गया है, और दस साल के लिए।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गोबरधन — कंप्रेस्ड बायोगैस की राष्ट्रीय एकीकृत योजना — को मंज़ूरी दी है। कुल ख़र्च 23,731 करोड़ रुपये, और अवधि 2026-27 से 2035-36 तक, यानी पूरे दस साल। योजना पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय चलाएगा। मक़सद है देश में कंप्रेस्ड बायोगैस का उत्पादन क़रीब दस गुना बढ़ाना — खेत की पराली, गोबर, शहर का गीला कचरा और चीनी मिल की प्रेस मड से।
देश में 200 से ज़्यादा सीबीजी संयंत्र पहले से चल रहे हैं। फिर दो हज़ार क्यों नहीं बने? वजह तकनीक नहीं थी। वजह यह थी कि संयंत्र लगाने वाले को यह पक्का नहीं होता था कि उसकी गैस कौन ख़रीदेगा और किस दाम पर। बैंक ऐसे प्रोजेक्ट को क़र्ज़ देने में हिचकता है। अब योजना में जो चीज़ें दी गई हैं — तय ख़रीद, स्थिर दाम, पूँजी सहायता, पाइपलाइन, क़र्ज़ में मदद और तकनीक — उनमें से आधी बैंक के सवालों के जवाब हैं। दस साल की योजना और दस साल के क़र्ज़ का मेल ही इस फ़ैसले की सबसे काम की लाइन है।
कच्चा माल कभी कम नहीं था: गोबर, पराली, शहरी गीला कचरा और प्रेस मड — गोबरधन योजना इन्हीं से गैस और जैविक खाद बनाने की दस साल की व्यवस्था है।
जो चीज़ अब तक मुफ़्त में दी जाती थी या जला दी जाती थी, उसका अब दाम बनेगा।
एक नज़र में
• योजना: गोबरधन — कंप्रेस्ड बायोगैस की राष्ट्रीय एकीकृत योजना
• ख़र्च: 23,731 करोड़ रुपये
• अवधि: 2026-27 से 2035-36 तक
• मंत्रालय: पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
• लक्ष्य: सीबीजी उत्पादन में क़रीब दस गुना बढ़ोतरी
• कच्चा माल: पराली, गोबर, शहरी गीला कचरा, प्रेस मड
• क्या मिलेगा: तय ख़रीद, स्थिर दाम, पूँजी सहायता, पाइपलाइन, क़र्ज़ सहायता
• पहले से: 200 से ज़्यादा सीबीजी संयंत्र चालू
• दूसरी कमाई: जैविक खाद, जो खेत में वापस जाती है
• पिछली योजनाएँ: सतत, एमडीए, बीएएम और डीपीआई
किसान के लिए इसका सीधा मतलब क्या है। पहला — पराली जलाने के बजाय बेचने का रास्ता। हर टन पराली जो संयंत्र तक जाती है, वह अक्टूबर में खेत में नहीं जलती। दूसरा — गोबर का दाम। जो चीज़ अब तक घर के पीछे पड़ी रहती थी या मुफ़्त दे दी जाती थी, उसकी अब क़ीमत बनेगी। तीसरा, और शायद सबसे ज़रूरी — संयंत्र से निकलने वाली जैविक खाद वापस उसी खेत में जाती है। पचास साल से हमारी मिट्टी से पोषक तत्व अनाज बनकर बाहर जाते रहे और यूरिया बनकर वापस आते रहे। यह उस चक्र का एक हिस्सा गाँव के भीतर ही बंद कर देता है।
अब ईमानदारी की बात, ताकि उम्मीद हक़ीक़त पर टिके। इस तरह की योजनाओं में सबसे बड़ी अड़चन गैस बनाने में नहीं आती — कच्चा माल इकट्ठा करने में आती है। एक संयंत्र को रोज़, सैकड़ों छोटे किसानों से, इतने सस्ते में माल चाहिए कि मुनाफ़ा बचा रहे। इसका सबसे व्यावहारिक हल किसान उत्पादक संगठन हैं, जो गाँव-गाँव से माल जुटाकर एक जगह पहुँचाएँ। दूसरी बात, गैस का ख़रीद रेट हर साल जल्दी तय होना चाहिए, वरना एक निर्माण मौसम निकल जाता है। और तीसरी, जैविक खाद का बाज़ार बने, क्योंकि दूसरी कमाई ही इस कारोबार को टिकाऊ बनाती है। ये तीनों हो जाएँ तो 23,731 करोड़ रुपये से सिर्फ़ गैस नहीं बनेगी — गाँव में एक उद्योग बनेगा, जिसका रेट कार्ड दस साल के लिए तय है।














