ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह चीन के प्रचार तंत्र और उसकी बनाई हुई कहानियों को चुनौती देती है। चीन ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया, कूटनीतिक मंचों और सोशल मीडिया के माध्यम से तिब्बत की वास्तविक स्थिति को लंबे समय से दबाने की कोशिश की है।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह चीन के प्रचार तंत्र और उसकी बनाई हुई कहानियों को चुनौती देती है। चीन ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया, कूटनीतिक मंचों और सोशल मीडिया के माध्यम से तिब्बत की वास्तविक स्थिति को लंबे समय से दबाने की कोशिश की है।
पुस्तक: चीन के तिब्बत में औपनिवेशिक खेल
अंग्रेज़ी शीर्षक: चाइना’ज कोलोनियल गेम्स इन तिब्बत
संपादक : विजय क्रांति
प्रकाशक: वीके मीडिया ग्रुप एंड सेंटर फॉर हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट (चेज), नई दिल्ली।
पृष्ठ: 486, मूल्य: ₹2,500
शब्दों का है ये हथियार
आज के समय में, जब ताकतवर सरकारें सच को दबाने और चुप्पी थोपने के लिए हर तरह के साधनों का इस्तेमाल करती हैं, तब लिखा हुआ शब्द सबसे बड़ा हथियार बन जाता है। वरिष्ठ पत्रकार और तिब्बत मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ विजय क्रांति द्वारा संपादित पुस्तक “चीन के तिब्बत में औपनिवेशिक खेल” ऐसा ही एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
यह पुस्तक केवल लेखों का संग्रह नहीं है, बल्कि तिब्बत की दबाई गई आवाज को दुनिया के सामने रखने का एक गंभीर और साहसी प्रयास है। 486 पृष्ठों की इस पुस्तक में 39 विशेषज्ञों के 60 लेख शामिल हैं। इन लेखों के माध्यम से तिब्बत के इतिहास, संस्कृति, धर्म, राजनीति, मानवाधिकार, पर्यावरण और चीन की औपनिवेशिक नीतियों को विस्तार से समझाया गया है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह चीन के प्रचार तंत्र और उसकी बनाई हुई कहानियों को चुनौती देती है। चीन ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया, कूटनीतिक मंचों और सोशल मीडिया के माध्यम से तिब्बत की वास्तविक स्थिति को लंबे समय से दबाने की कोशिश की है। ऐसे माहौल में विजय क्रांति का यह संपादित कार्य तिब्बत के सच को मजबूती, संवेदनशीलता और शोधपूर्ण दृष्टि के साथ सामने लाता है।
विद्वत्ता का महत्वपूर्ण दस्तावेज
यह पुस्तक उन अंतरराष्ट्रीय वेबिनारों और विचार-विमर्शों का परिणाम है, जिन्हें विजय क्रांति ने लगभग तीन वर्षों तक आयोजित और संचालित किया। इसमें दुनिया भर के प्रमुख विद्वानों, राजनयिकों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और तिब्बत विशेषज्ञों के विचार शामिल हैं।
इनमें प्रोफेसर रॉबर्ट डेस्ट्रो, प्रोफेसर सम्धोंग रिनपोछे, पेनपा छेरिंग, अंतरराष्ट्रीय कानून के विद्वान प्रोफेसर माइकल वान वाल्ट वान प्राग, जयदेव रानाडे, क्लॉड अर्प्री और पियरे अंटोनी डोन्नेट जैसे महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं। इन विशेषज्ञों की उपस्थिति पुस्तक को और अधिक विश्वसनीय, गंभीर और उपयोगी बनाती है।
पुस्तक को 12 विषयगत खंडों में विभाजित किया गया है। इन खंडों के माध्यम से पाठक तिब्बत की ऐतिहासिक पहचान, दलाई लामा की संस्था, तिब्बती समाज, चीन की राजनीतिक रणनीति, सांस्कृतिक दमन, धार्मिक हस्तक्षेप और मानवाधिकार संकट को क्रमबद्ध रूप से समझ पाता है।
यह पुस्तक आम पाठकों के लिए भी उपयोगी है और नीति-निर्माताओं, पत्रकारों, शोधकर्ताओं, कूटनीतिज्ञों तथा मानवाधिकार मामलों में रुचि रखने वालों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पहचान मिटाने की साजिश
पुस्तक का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा चीन की सांस्कृतिक आत्मसात नीति पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि किस तरह राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन तिब्बती पहचान को धीरे-धीरे कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
विशेष रूप से आवासीय विद्यालयों से जुड़े अध्याय बहुत गंभीर सवाल उठाते हैं। इन अध्यायों में बताया गया है कि कैसे तिब्बती बच्चों को उनकी भाषा, धर्म, परिवार और सांस्कृतिक जड़ों से दूर किया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि आने वाली पीढ़ी बाहरी रूप से भले ही तिब्बती दिखे, लेकिन उसकी सोच और मानसिकता चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुसार ढल जाए।
यह कोई सामान्य प्रशासनिक नीति नहीं है। पुस्तक के अनुसार, यह एक सुनियोजित प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से पूरी तिब्बती पीढ़ी को अपनी असली पहचान से काटने का प्रयास किया जा रहा है।
शी जिनपिंग की ‘जातीय एकता और प्रगति संवर्धन’ नीति को भी पुस्तक गंभीरता से परखती है। यह नीति सतह पर एकता और विकास की बात करती है, लेकिन पुस्तक बताती है कि इसके पीछे तिब्बतियों, उइगरों, मंगोलों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की अलग पहचान को कमजोर करने की रणनीति छिपी है।
महिलाओं, पर्यावरण और धर्म पर हमला
पुस्तक में तिब्बती महिलाओं की स्थिति पर भी गंभीर चर्चा की गई है। तीन अध्याय तिब्बती महिलाओं के दमन, सामाजिक चुनौतियों और अधिकारों पर केंद्रित हैं। यह हिस्सा पाठक को बताता है कि राजनीतिक नियंत्रण का असर केवल शासन व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह परिवार, समाज और महिलाओं के जीवन तक गहराई से पहुंचता है।
तिब्बत के पर्यावरण पर भी पुस्तक में विस्तार से चर्चा की गई है। सात अध्याय तिब्बत के नाज़ुक पर्यावरण पर चीन की नीतियों के प्रभाव को उजागर करते हैं। तिब्बत को एशिया का जल-स्रोत माना जाता है। ऐसे में वहां की नदियों, पर्वतों, ग्लेशियरों और प्राकृतिक संसाधनों पर कोई भी आघात केवल तिब्बत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत सहित पूरे एशिया को प्रभावित कर सकता है।
छह अध्यायों में यह भी बताया गया है कि कोरोना महामारी के दौरान चीन ने किस तरह तिब्बत पर अपनी पकड़ और मजबूत की। पुस्तक यह सवाल उठाती है कि क्या महामारी का इस्तेमाल केवल स्वास्थ्य नियंत्रण के लिए हुआ या राजनीतिक निगरानी और दमन के लिए भी किया गया।
धार्मिक स्वतंत्रता पर चीन के हस्तक्षेप को भी पुस्तक गंभीरता से उठाती है। विशेष रूप से दलाई लामा और पंचेन लामा की पुनर्जन्म परंपरा में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के दखल को पुस्तक तिब्बती धर्म और संस्कृति पर सीधा हमला मानती है। चीन ने कानूनों और प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से पुनर्जन्म जैसी पवित्र धार्मिक परंपरा को भी अपने राजनीतिक नियंत्रण में लेने की कोशिश की है।
सबसे भयावह अध्याय: जबरन अंग निकालने का आरोप
पुस्तक का सबसे विचलित करने वाला हिस्सा उन अध्यायों में है, जो चीन में जबरन अंग निकालने के आरोपों पर केंद्रित हैं। चार अध्याय इस विषय को विस्तार से उठाते हैं।
इन अध्यायों में दावा किया गया है कि जेलों और बंदी शिविरों में रखे गए तिब्बतियों, उइगरों और अन्य समुदायों के लोगों की डीएनए प्रोफाइलिंग की जाती है। उन्हें इस तरह रखा जाता है मानो वे किसी भयावह ‘जीवित अंग-भंडार’ का हिस्सा हों।
पुस्तक के अनुसार, दुनिया के कई संपन्न ग्राहकों को कुछ ही दिनों के भीतर दिल, लीवर, किडनी या अन्य अंगों के प्रत्यारोपण की सुविधा उपलब्ध हो जाती है। यह आरोप बेहद गंभीर हैं और मानवता के खिलाफ अपराधों की ओर इशारा करते हैं।
यह हिस्सा पाठक को झकझोर देता है। यह केवल चीन की राजनीति की बात नहीं करता, बल्कि मानव सभ्यता, नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सामने खड़े एक गहरे संकट की ओर ध्यान खींचता है।
जमीर को जगाने वाली किताब
‘चीन के तिब्बत में औपनिवेशिक खेल’ तिब्बत, चीन और मानवाधिकारों पर लिखे गए साहित्य में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। यह इतिहास का दस्तावेज भी है, राजनीतिक विश्लेषण भी है और नैतिक चेतावनी भी।
विजय क्रांति ने इस पुस्तक के माध्यम से उन आवाज़ों को मंच दिया है, जिन्हें लंबे समय से दबाने की कोशिश की गई। उन्होंने तिब्बत की पीड़ा, प्रतिरोध और सच्चाई को विद्वानों, पत्रकारों और मानवाधिकार समर्थकों की दृष्टि से दुनिया के सामने रखा है।
यह पुस्तक नीति-निर्माताओं, पत्रकारों, कानूनी विद्वानों, राजनयिकों, शोधकर्ताओं और हर संवेदनशील पाठक के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह हमें याद दिलाती है कि सच को दबाया जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए मिटाया नहीं जा सकता। यह ऐसी पुस्तक है जिसे बीजिंग शायद कभी नहीं चाहेगा कि दुनिया पढ़े और शायद यही इसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।
परिचय : संपादक विजय क्रांति
विजय क्रांति भारत के वरिष्ठ पत्रकारों, तिब्बत विशेषज्ञों और वृत्तचित्र फोटोग्राफरों में एक प्रमुख नाम हैं। पांच दशकों से अधिक के लंबे पेशेवर जीवन में उन्होंने इंडिया टुडे, बीबीसी टीवी, ज़ी न्यूज़, आज तक, डीडी न्यूज़, डॉयचे वेले और वॉयस ऑफ अमेरिका जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है।
उनका विशेष अध्ययन क्षेत्र तिब्बत, चीन, हिमालयी बौद्ध संस्कृति और जम्मू-कश्मीर रहा है। तिब्बत पर उनके गंभीर कार्य के लिए उन्हें वर्ष 1992 में प्रतिष्ठित केके बिड़ला फाउंडेशन फेलोशिप से सम्मानित किया गया।
चीन-तिब्बत मामलों के एक अग्रणी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ के रूप में उन्हें दुनिया भर के सम्मेलनों, संगोष्ठियों और टेलीविजन चर्चाओं में आमंत्रित किया जाता रहा है। तिब्बती बौद्ध संस्कृति पर उनका फोटोग्राफिक संग्रह पचास वर्षों की मेहनत का परिणाम है और इसे किसी एक व्यक्ति द्वारा तैयार किए गए सबसे बड़े निजी संग्रहों में गिना जाता है। इसकी प्रदर्शनियां भारत, जर्मनी, ऑस्टि्रया, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन और स्विट्ज़रलैंड में लग चुकी हैं।
विजय क्रांति एक दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखक, संपादक और सह-लेखक रहे हैं। उनका लेखन पत्रकारिता, जीवनी, सांस्कृतिक इतिहास और राजनीतिक विश्लेषण तक फैला हुआ है।
‘चीन के तिब्बत में औपनिवेशिक खेल’ उनके जीवनभर के उस समर्पण की मजबूत अभिव्यक्ति है, जिसके केंद्र में तिब्बत की सच्चाई को दुनिया के सामने लाने का संकल्प रहा है।













