भारत के व्यापार का सबसे बड़ा दांव इस वक्त तीन मोर्चों पर एक साथ चल रहा है। ब्रिटेन के साथ समझौता (CETA) लागू हो चुका है और पहले ही दिन इससे 14 करोड़ डॉलर (करीब 140 मिलियन डॉलर) से ज़्यादा का सामान बिना टैक्स के ब्रिटेन गया। यूरोपियन यूनियन के साथ समझौता — जो सबसे बड़ा है — अब कानूनी जांच के आखिरी दौर में है, जिसे अफसर एक-दो हफ्ते में पूरा होने की बात कह रहे हैं। और अमेरिका के साथ पहले चरण का समझौता बस “आखिरी एक फीसदी” पर अटका है, जहां अंतरिम टैरिफ राहत जुलाई के आखिर में खत्म होने वाली है।
तीनों समझौते अलग-अलग पड़ाव पर हैं, और यही फर्क समझने लायक है। ब्रिटेन वाला समझौता सबूत है — 15 जुलाई से इसने भारतीय कपड़े पर लगने वाला 12% ब्रिटिश टैक्स एक झटके में हटा दिया, और पहले दिन कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां और जेम्स-ज्वेलरी की खेपें देश की 20 से ज़्यादा जगहों से रवाना हुईं। यूरोप वाला समझौता सबसे बड़ा बाज़ार है, जो अब दस्तखत से पहले की कानूनी जांच में है। अमेरिका वाला समय के लिहाज़ से सबसे कसा हुआ है, भले ही फासला सबसे छोटा हो।
ब्रिटेन ने दिखा दिया कि लागू समझौता पहले दिन कैसा दिखता है। असली काम अब यह है कि दूसरा और तीसरा भी वक्त पर ज़मीन पर उतरे — शर्तों से समझौता किए बिना।
अमेरिका वाले मोर्चे पर अटकाव छोटा पर असली है — भारत चाहता है कि उसके सामान पर टैक्स वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों से ज़्यादा न हो, वहीं अमेरिका चाहता है कि कपड़ा, समुद्री माल और सस्ते सामान की सप्लाई चेन में मज़दूरी के नियमों की पक्की गारंटी मिले। भारत ने साफ कर दिया है कि वह घड़ी देखकर नहीं, सही शर्तों पर समझौता करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले महीने G7 की मुलाकात में अफसरों को यह काम जल्दी पूरा करने को कह चुके हैं।
सीधी बात यह है कि बाज़ार मिल जाना सिर्फ न्योता है; कमाई तो ऑर्डर से आती है। ब्रिटेन (लागू), यूरोप (करीब) और अमेरिका (बाकी) — तीनों साथ हों तो भारतीय निर्यातकों को ऐसा रास्ता मिलेगा जो कम देशों के पास है। पर फायदा तभी दिखेगा जब कारोबारी इसे ज़मीन पर उतारें। आगे का रास्ता छोटे-छोटे इंतज़ाम से होकर जाता है — सामान कहां का बना, इसका सर्टिफिकेट झट से मिले, नियम एक-दूसरे को मंज़ूर हों, और तिरुपुर, सूरत व विशाखापत्तनम के छोटे-मंझोले कारोबारियों तक भी कर्ज़ और मदद पहुंचे।












