ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।इस साल के कमज़ोर मानसून को सही ढंग से पढ़िए तो वह इस मौसम से आगे एक स्थायी काम की ओर इशारा करता है। भारत में दुनिया की करीब 18% आबादी बसती है, पर उसके पास मीठे पानी का महज़ करीब 4% है — और वह भी अधिकतर कुछ ही मानसून महीनों में बरसता है। भारत की असली जल-चुनौती एक सूखा जुलाई नहीं; वह इस बेहद मौसमी संसाधन को साल भर और उपमहाद्वीप-भर सहेजना, भंडारना और बाँटना सीखना है। यह पीढ़ियों का काम है, और चुपचाप जारी है।
रणनीति के तीन मोर्चे हैं। अधिक भंडारण — जलाशयों, खेत-तालाबों, चेक-डैम और भूजल-पुनर्भरण के ज़रिये। कम बर्बादी — टपक (ड्रिप) और फुहार सिंचाई से, क्योंकि खेती आज भी भारत के पानी का बड़ा हिस्सा लेती है, और शहरी आपूर्ति के रिसाव रोककर। और पुनःउपयोग — गंदे पानी को शोधित कर फिर काम में लाना, ताकि वही बूँद एक से अधिक बार काम आए। हर एक अनाकर्षक है; मिलकर ये तय करते हैं कि विकास अपनी ही प्यास से आगे निकले या नहीं।
सहेजो, भंडारो, बाँटो: जलाशय, पुनर्भरित भूजल और कुशल सिंचाई उस संसाधन का ढाँचागत उत्तर हैं जो एक साथ बरसता है पर पूरे साल चलना चाहिए।
बादलों से मोल-भाव नहीं होता। पर दशकों में जो वे देते हैं उसे भंडारा जा सकता है और उसकी बर्बादी घटाई जा सकती है। यही जल सुरक्षा है — विकास की सबसे धैर्यवान नींव।
दीर्घ-दृष्टि
• असंतुलन: दुनिया की ~18% आबादी, पर ~4% मीठा पानी
• भंडारण: जलाशय, खेत-तालाब, चेक-डैम, भूजल-पुनर्भरण
• बचत: ड्रिप व फुहार सिंचाई; शहरी आपूर्ति के रिसाव कम करना
• पुनःउपयोग: उद्योग व कृषि के लिए शोधित गंदा पानी
यह कुछ भी स्वतः नहीं होगा, और ईमानदार हिसाब कमियाँ भी गिनाता है: कई खेती-पट्टियों में भूजल का अति-दोहन हो रहा है, शहरों में सीवेज-शोधन अब भी पाइप से आते पानी से पीछे है, और क़ीमत के संकेत मितव्ययिता को शायद ही पुरस्कृत करते हैं। ये कठिन इंजीनियरिंग और शासन की समस्याएँ हैं, नारे नहीं — और इन्हें पाटना ठीक वही राष्ट्रीय परियोजना है जिसे पूरा करने का संकल्प एक सूखा दौर फिर से जगा देना चाहिए।
रचनात्मक, दीर्घ-दृष्टि वाला पाठ यह है कि जल सुरक्षा कुछ ही निवेशों की तरह चक्रवृद्धि लाभ देती है। हर पुनर्भरित भूजल भंडार, हर ड्रिप-सिंचित खेत, हर पुनः-उपयोगित लीटर अगले कमज़ोर मानसून के विरुद्ध बीमा है और खेतों, कारख़ानों व शहरों की साझा नींव। जिस बारिश पर भारत का वश नहीं, वही उस पानी में महारत हासिल करने का सबसे स्पष्ट तर्क है जिस पर वश है — और एक बार-बार लौटती चिंता को टिकाऊ ताक़त में बदलने का।












