ब्लिट्ज ब्यूरो
डिब्रूगढ़। अरुणाचल प्रदेश में लोंगडिंग कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) की एक टीम ने जेडुआ गांव के रूटीन फील्ड विजिट के दौरान एक पीले पफबॉल मशरूम को देखा और रिकॉर्ड किया। यह जिले में इस प्रजाति को देखे जाने और रिकॉर्ड किए जाने के शुरुआती मामलों में से एक हो सकता है और अरुणाचल प्रदेश की ज्ञात फंगल विविधता में एक महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हो सकती है।
केवीके के प्लांट पैथोलॉजी एक्सपर्ट डॉ. दीप नारायण मिश्रा ने इसके खास पीले, गोले के आकार के फ्रूटिंग बॉडी और पफबॉल जैसी बनावट के आधार पर इस नमूने की पहचान शुरुआती तौर पर ‘बोविस्टा कोलोराटा’ के रूप में की।
पहली बार दिखा ऐसा मशरूम
डॉ. मिश्रा ने कहा कि उपलब्ध लिक्ट्रेचर की शुरुआती समीक्षा से पता चलता है कि लोंगडिंग जिले से इस प्रजाति का कोई रिकॉर्ड अभी तक मौजूद नहीं है। यह जानकारी अरुणाचल प्रदेश की ज्ञात मैक्रो-फंगल विविधता में एक महत्वपूर्ण बढ़ोतरी हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि पक्क ी टैक्सोनॉमिक पुष्टि के लिए माइक्रोस्कोपिक जांच और मॉलिक्यूलर कैरेक्टराइज़ेशन जरूरी होगा।
खूब हेल्दी होता है येलो पफबॉल मशरूम
पफबॉल मशरूम में प्रोटीन, डाइटरी फाइबर, जरूरी अमीनो एसिड, मिनरल और एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड होते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में एंटीमाइक्रोबियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी और संभावित फार्मास्युटिकल गुणों वाले बायोएक्टिव मेटाबोलाइट्स की मौजूदगी भी दर्ज की गई है।
जहरीला भी हो सकता है
इतिहास में, पफबॉल स्पोर का इस्तेमाल कुछ पारंपरिक संस्कृतियों में घाव पर लगाने के लिए प्राकृतिक मैटीरियल के तौर पर किया जाता रहा है, क्योंकि इनमें नमी सोखने और खून का थक्क ा जमाने के गुण होते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट चेतावनी देते हैं कि जंगली मशरूम को कभी भी एक्सपर्ट की सही पहचान के बिना नहीं खाना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी कच्ची जहरीली किस्में खाने योग्य पफबॉल जैसी ही दिख सकती हैं।














