ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमत से जुड़ी दो जनहित याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। एक याचिका वकील किशन चंद जैन ने 2023 में दायर की थी। दूसरी डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की है। इनमें मांग है कि दवा की पहली कीमत पर भी नियंत्रण हो। डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवा लिखना जरूरी हो। मेडिकल उपकरणों पर भी मुनाफे की सीमा तय हो। सभी पक्ष दो हफ्ते में लिखित दलीलें दे सकते हैं।
अदालत ने क्या कहा
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अपने सवाल ठोस उदाहरणों पर रखे। 22 सितंबर को जस्टिस मेहता ने कैंसर की ऐसी जरूरी दवाओं का जिक्र किया, जो दुकानदार को 2,700 रुपये में मिलती हैं और जिन पर एमआरपी 27,000 रुपये छपी है। उन्होंने इसे मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती कहा।27 अक्टूबर को अदालत के सामने कीमोथेरेपी के एक इंजेक्शन का मामला आया। डीलर कीमत पर यह 11,000 रुपये का था। एक निजी अस्पताल ने इसके लिए 1.30 लाख रुपये का बिल बनाया। जस्टिस मेहता ने पूछा, इस लूट का कोई औचित्य बता सकते हैं? यह फर्क क्यों है? पैसा कहां जाता है? पीठ ने कहा कि दवाओं की कीमत तय करने वाला राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) पूरी तरह निष्कि्रय लगता है। कीमतों के इस फर्क पर पूछा, क्या इसे बेलगाम छोड़ दिया जाए? अदालत ने याद दिलाया कि आयुष्मान भारत में इलाज की सीमा 5 लाख रुपये है। पीठ ने यह भी पूछा कि हर दवा पर एक जैसा 16 फीसदी मार्जिन क्यों न हो।
दवा की कीमत तय कैसे होती है
इसका जवाब औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 में है। जरूरी दवाओं की सूची वाली दवाओं की अधिकतम कीमत एनपीपीए तय करता है। इसमें दुकानदार की खरीद कीमत पर 16 फीसदी मार्जिन जोड़ा जाता है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि ऐसी दवाएं मात्रा में बाजार का 35 फीसदी हैं, पर कीमत में सिर्फ 18 फीसदी।
यानी बाजार की 82 फीसदी कीमत वाली दवाओं का पहला दाम कंपनी खुद तय करती है। उसके बाद नियम सिर्फ इतना है कि साल में दाम 10 फीसदी से ज्यादा न बढ़े। दोनों तरीकों में बड़ा फर्क है। ब्लिट्ज ने इसका हिसाब लगाया। खरीद कीमत पर 16 फीसदी मार्जिन, एमआरपी का सिर्फ 13.8 फीसदी बनता है। एमआरपी के 30 फीसदी की सीमा का मतलब है खरीद पर 42.86 फीसदी मुनाफा। और दस गुना एमआरपी का मतलब है 900 फीसदी मुनाफा। केंद्र सरकार के हलफनामे के मुताबिक अस्पताल कैंसर की दवाएं 170 फीसदी से 700 फीसदी से ज्यादा के व्यापार मार्जिन पर खरीदते हैं। अस्पताल के दूसरे सामान पर यह मार्जिन 100 फीसदी से 1,000 फीसदी से भी ज्यादा है।
कैंसर का 80 हजार का इंजेक्शन 7 हजार में मिलेगा
न ई दिल्ली। देश में कैंसर के 543 दवा ब्रांडों और पैक की कीमतों में बदलाव किया गया है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के फैसले के बाद 397 यानी 73% दवाओं के दाम घटाए गए हैं।
इनमें 217 दवाओं की कीमत आधे से भी कम हो गई है। वहीं, 97 ब्रांड की दवाओं की कीमतों में 70% से ज्यादा और 50 में 80% से ज्यादा कटौती हुई है। 5 ब्रांड पैक की कीमतों में 90% से ज्यादा कटौती हुई है। सबसे बड़ी कटौती सैमटेपा इंजेक्शन में हुई है। इसकी कीमत ₹80,071.86 से घटाकर ₹7,150.33 कर दी गई है। वहीं, पैलबोप्रो दवा के 21 कैप्सूल वाले पैक की कीमत ₹40,421 से घटकर ₹2,720 हो गई है। हालांकि, 146 ब्रांड-पैक की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। सरकार ने 137 कैंसर-रोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30% तक सीमित किया था। इसके बाद कंपनियों ने नई कीमतें जारी की हैं। नई कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी।














