नई दिल्ली।हाल ही में नई दिल्ली के ‘भारत मंडपम’ में संपन्न हुआ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 समकालीन भू-राजनीति के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ है और इसने वैश्विक कूटनीति के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। ऐसे समय में जब दुनिया रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिमी एशिया की अस्थिरता और नए अमेरिकी टैरिफ प्रावधानों के कारण गहरे भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है, भारत की अध्यक्षता में आयोजित यह सम्मेलन वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की उम्मीदों का केंद्र बनकर उभरा। नई दिल्ली घोषणापत्र पर तमाम वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद सभी सदस्य देशों की सहमति हासिल करना भारत की निर्विवाद कूटनीतिक और कद्दावर नेतृत्व क्षमता का परिचायक है। जब भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्रिक्स की चौथी अध्यक्षता संभाली थी, तब भी और जब शिखर सम्मेलन हो रहा था, तब भी दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें इस बात पर टिकी थीं कि क्या 11 सदस्यीय इस विविध और विस्तृत समूह को एक मंच पर लाना संभव हो पाएगा लेकिन भारत ने अपनी तटस्थ नीति के बल पर यह कर दिखाया।
भारत के दृष्टिकोण से ऐतिहासिक महत्व और बढ़ती साख
भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन कूटनीतिक संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता का एक उत्कृष्ट उदाहरण रहा। नई दिल्ली ने शुरू से ही ब्रिक्स को किसी पश्चिमी विरोधी खेमे के रूप में पेश करने के बजाय विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज बनाने का प्रयास किया है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) समेत वैश्विक संस्थाओं में सुधारों की मांग को पुरजोर तरीके से उठाया जिसे रूस और चीन का भी समर्थन मिला।
इसके साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) के शस्त्रीकरण पर गहरी चिंता जताकर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। भारत की इस पहल ने वैश्विक स्तर पर यह संदेश दिया कि वह आपूर्ति श्रंखलाओं में निष्पक्षता और संप्रभुता का पक्षधर है। भारत की साख इस बात से भी बढ़ी है कि उसने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों—ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब को एक ही मंच पर लाकर समुद्री सुरक्षा और कूटनीतिक संयम बरतने वाले साझा खंड पर राजी किया।
वैश्विक नेताओं के बयान और उनका महत्व
सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और यूएई के प्रतिनिधिमंडल सहित कई दिग्गज वैश्विक नेता शामिल हुए। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एआई से लेकर व्यापार तक के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की पहल सामने रखी, वहीं पुतिन और अन्य नेताओं ने भारत की अध्यक्षता की मुक्त कंठ से सराहना की।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, इन नेताओं का एक मंच पर आना और दिल्ली घोषणापत्र को स्वीकार करना यह बताता है कि बहुध्रुवीय विश्व (मल्टीपोलर वर्ल्ड) की अवधारणा अब हकीकत बन रही है। आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए घोषणापत्र में पहलगाम हमले की स्पष्ट निंदा दर्ज कराना भी भारत की आतंकवाद के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस नीति की वैश्विक स्वीकृति को दर्शाता है।
मानव केंद्रित विकास को प्राथमिकता
विभिन्न भू-राजनीतिक मुद्दों पर रूस, चीन, ईरान और अन्य विस्तारित ब्रिक्स सदस्यों के हित जहां एक-दूसरे से काफी भिन्न थे, वहीं पीएम मोदी की समावेशी और कूटनीतिक शैली ने करिश्मा कर दिखाया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 10 सूत्रीय प्रस्तावों के माध्यम से भविष्य के वैश्विक शासन (ग्लोबल गवर्नेंस) का खाका खींचा, जिसमें मानव केंद्रित विकास को प्राथमिकता दी गई।
पीएम मोदी ने ‘सहयोग और समावेशी विकास’ के मंत्र पर जोर दिया और यह समझाया कि आपसी टकराव मानवता के विकास को बाधित करता है। वार्ताओं और मध्यस्थता के जरिए भारत ने पश्चिम एशिया के तनावों का मुद्दा सम्मेलन की पटरी से उतरने नहीं दिया, साथ ही ऊर्जा सुरक्षा और पारदर्शी वित्तीय भुगतान प्रणालियों पर आम सहमति भी बना ली। यह प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक परिपक्वता ही थी कि तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ सर्वसम्मति से पारित हुआ।














