ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। प्याज का बफर स्टॉक एक साथ नहीं, नपी-तुली मात्रा में निकाला जा रहा है। यही तरीक़ा इस खबर का असली हिस्सा है।
नासिक से प्याज की एक रेलगाड़ी चली है। नाम है कांदा एक्सप्रेस। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने कहा है कि देश में प्याज की उपलब्धता पर्याप्त है, और मौसमी दाम को काबू में रखने के लिए बफर स्टॉक की नपी-तुली और लक्षित निकासी शुरू कर दी गई है — रेल से भी, सड़क से भी।
ख़बर की असली बात इस एक शब्द में है: नपी-तुली। सरकार के पास प्याज का भंडार है और वह चाहे तो एक साथ बाज़ार में उतार सकती है। ऐसा करने पर दाम तुरंत गिरेंगे — और गिरकर वहां पहुंच जाएंगे जहां नासिक और अहमदनगर का किसान अपनी लागत भी न निकाल पाए। भंडार को थोड़ा-थोड़ा करके निकालना दो तरफ का संतुलन साधने की कोशिश है: शहर की रसोई में दाम न भागें, और खेत में दाम न बैठें।
बफर स्टॉक असल में है क्या
बफर स्टॉक कोई गोदाम भर देने की कवायद नहीं है। यह एक किस्म की बीमा-व्यवस्था है। फसल के मौसम में जब आवक ज़्यादा होती है और दाम गिरते हैं, तब सरकारी एजेंसियां किसान से खरीदकर भंडार बनाती हैं — इससे उस वक्त दाम को नीचे गिरने से रोका जाता है। फिर जब आवक घटती है और दाम चढ़ने लगते हैं, वही भंडार बाज़ार में उतारा जाता है। एक ही स्टॉक साल में दो बार काम आता है, और दोनों बार उलटी दिशा में।
प्याज के मामले में यह और भी नाजुक है, क्योंकि प्याज न गेहूं है नु चावल। वह जल्दी खराब होता है, उसका भंडारण महंगा है, और उसमें नमी और तापमान का जरा-सा फेर पूरी खेप बिगाड़ देता है। इसीलिए प्याज का बफर उतना बड़ा नहीं हो सकता जितना अनाज का, और इसीलिए उसे निकालने का समय और तरीक़ा उतना ही मायने रखता है जितनी उसकी मात्रा।










