ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।अमेरिका में पढ़ रहे तीन लाख से ज़्यादा भारतीय बच्चों के लिए नियम बदल गया है। चार साल की सीमा की चर्चा तो हुई, पर जो चार बातें असल में जेब और वक़्त पर भारी पड़ेंगी, उनकी चर्चा कहीं नहीं हुई।
पहले यह साफ़ कर लें कि यह कोई प्रस्ताव नहीं है। अमेरिका के गृह सुरक्षा विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी) ने 17 जुलाई 2026 को आख़िरी नियम छाप दिया था — फ़ेडरल रजिस्टर में 91 FR 44976, डॉकेट संख्या ICEB-2025-0001, कुल 156 पन्ने। नियम में ही लिखा है कि यह 15 सितंबर 2026 से लागू होगा।
अब तक क्या था? एफ़-1 वीज़ा पर गया छात्र “ड्यूरेशन ऑफ़ स्टेटस” पर जाता था — यानी जब तक पढ़ाई चल रही है और रिकॉर्ड ठीक है, तब तक रुकने की छूट। यह पूरा वाक्य नियम से हटा दिया गया है। पंद्रह सितंबर से छात्र को तय समय के लिए दाख़िला मिलेगा, ज़्यादा से ज़्यादा चार साल। इससे आगे रुकना हो तो अलग से अर्ज़ी देनी होगी और मामला नए सिरे से देखा जाएगा।
चार बातें, जिन पर किसी की नज़र नहीं गई
चार साल वाली बात हर जगह छप गई। नियम के भीतर की चार बातें कहीं नहीं छपीं, और घर वालों के लिए वही ज़्यादा मायने रखती हैं।
पहली। मास्टर्स या उससे ऊपर पढ़ रहा छात्र अब बीच पढ़ाई में न अपना विषय बदल सकेगा, न संस्थान। छूट सिर्फ़ तब, जब SEVP ख़ास हालात मानकर इजाज़त दे। जो बच्चा पहले सेमेस्टर में समझ जाता था कि लैब उसके काम की नहीं और दूसरी जगह चला जाता था — अब वह ऐसे नहीं जा सकेगा।
दूसरी। पढ़ाई या ट्रेनिंग ख़त्म होने के बाद मिलने वाली मोहलत साठ दिन से घटाकर तीस दिन कर दी गई है। यानी अब एक महीना है, दो नहीं — इसी में या तो देश छोड़ना है या आगे रुकने की अर्ज़ी लगानी है।
तीसरी। अगर किसी वजह से पढ़ाई या ट्रेनिंग बीच में छोड़नी पड़े, तो उस तारीख़ से तीस दिन के भीतर लौटना होगा या दर्जा बचाने के लिए कुछ करना होगा। साथ रह रहे परिवार पर भी यही लागू है।
चौथी। फ़ॉर्म आई-20 पर लिखी तारीख़ तक कोर्स पूरा न हो पाना अब आगे समय माँगने की “आम तौर पर स्वीकार्य वजह नहीं” मानी जाएगी — भले ही देर अकादमिक प्रोबेशन या निलंबन की वजह से हुई हो।
एक राहत भी है, और वह असली है। जो छात्र पढ़ाई के बाद की ट्रेनिंग — ओपीटी या स्टेम ओपीटी — के लिए काम करने की इजाज़त माँग रहे हैं, उन्हें नियम लागू होने की तारीख़ से छह महीने की छूट दी गई है।
ब्लिट्ज़ डेटा कार्ड · इस विषय की कॉपीराइट-मुक्त तस्वीर उपलब्ध नहीं
| नियम / प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| नियम | 91 FR 44976, 17 जुलाई 2026 |
| लागू | 15 सितंबर 2026 |
| दाख़िले की अवधि | तय, ज़्यादा से ज़्यादा 4 साल |
| पढ़ाई के बाद मोहलत | 30 दिन, पहले 60 |
| संस्थान या विषय बदलना | मास्टर्स और ऊपर पर रोक |
| ओपीटी / स्टेम ओपीटी में छूट | 6 महीने |
| अमेरिका में भारतीय छात्र (2024/25) | 3,63,019 |
| कुल विदेशी छात्रों में हिस्सा | 30.8 प्रतिशत |
नियम का ख़र्च कौन उठाएगा
नियम के साथ अमेरिकी विभाग ने अपना ख़र्च का हिसाब भी छापा है, और सबसे पढ़ने लायक़ आँकड़ा वहीं है। सालाना ख़र्च 44.31 से 44.86 करोड़ डॉलर बताया गया है (2027 से 2036 तक, तीन और सात प्रतिशत की दो दरों पर)। इसमें से सिर्फ़ अमेरिकी पक्षों पर पड़ने वाला बोझ 11.99 से 12.51 करोड़ डॉलर है।
ब्लिट्ज़ इंडिया ने बाक़ी रक़म ख़ुद जोड़कर देखी। तीन प्रतिशत की दर पर अंतर 32.32 करोड़ डॉलर बैठता है, सात प्रतिशत पर 32.35 करोड़। यानी इस नियम का लगभग बहत्तर से तिहत्तर प्रतिशत ख़र्च — तीन प्रतिशत की दर पर ठीक 72.94 प्रतिशत — विदेशी नागरिकों की जेब से जाएगा, किसी अमेरिकी पक्ष की नहीं। नियम को अंतिम रूप देने से पहले विभाग को क़रीब बाईस हज़ार सुझाव मिले थे।
इस बोझ का सबसे बड़ा हिस्सा भारत उठाएगा। ओपन डोर्स 2025 के मुताबिक़ 2024/25 के अकादमिक साल में अमेरिका में 3,63,019 भारतीय छात्र थे — वहाँ के कुल 11,77,766 विदेशी छात्रों का 30.8 प्रतिशत। हमने दोबारा जोड़ा तो 30.82 प्रतिशत निकला। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हर तीन विदेशी छात्रों में लगभग एक भारतीय है।
एक सावधानी भी ज़रूरी है। भारतीय छात्रों की दो अलग गिनतियाँ चल रही हैं और उन्हें आपस में घटाना नहीं चाहिए। एक ओपन डोर्स का सर्वे है, दूसरी 3,52,644 की संख्या SEVIS रिकॉर्ड की एक तारीख़ की गिनती है। दोनों अलग चीज़ें, अलग समय पर नापती हैं। दोनों में से कोई भी आँकड़ा अपनी शृंखला के नाम के साथ छापा जा सकता है, पर एक में से दूसरा घटाकर “गिरावट” बताना ग़लत होगा।
ब्रिटेन ने छापा कि व्यापार समझौते से भारत को क्या मिलेगा। अमेरिका ने छापा कि उसका वीज़ा नियम भारतीयों को क्या पड़ेगा। भारत ने दोनों में से कुछ नहीं छापा।
एक नज़र में
• नियम : 91 FR 44976, डॉकेट ICEB-2025-0001
• छपा : 17 जुलाई 2026 · लागू : 15 सितंबर 2026
• लंबाई : 156 पन्ने; क़रीब 22,000 सुझाव मिले
• सालाना ख़र्च : 44.31–44.86 करोड़ डॉलर
• अमेरिकी पक्षों पर : 11.99–12.51 करोड़ डॉलर
• विदेशी नागरिकों पर : क़रीब 32 करोड़ डॉलर सालाना — 72.94 प्रतिशत
• भारतीय छात्र : 3,63,019 (ओपन डोर्स 2025)
नियम के लागू होने की तारीख़ अमेरिका की एक अदालत में विचाराधीन है और सुनवाई 3 सितंबर 2026 को तय है। ब्लिट्ज़ इंडिया अदालत में चल रहे मामले पर कोई टिप्पणी नहीं करता; पाठक इतना भर जान लें कि तारीख़ पत्थर की लकीर नहीं है। नियम में एक धारा यह भी है कि उसका कोई हिस्सा रुक जाए तो बाक़ी फिर भी लागू रह सकता है।
अगले पंद्रह दिन में भारत क्या कर सकता है
जो बच्चा पहले से तैयारी कर ले, उसके लिए इस नियम में कुछ भी नाक़ाबिल-ए-हल नहीं है। नियम का पूरा पाठ सार्वजनिक है, तारीख़ें तय हैं और ओपीटी वाली छूट असली है। कमी रियायत की नहीं, एक साफ़ हिदायत-नामे की है — सीधी भाषा में, भारतीय समय में, और ज़रूरत पड़ने से पहले।
यह काम विदेश मंत्रालय का अमेरिका प्रभाग, वॉशिंगटन का भारतीय दूतावास और न्यूयॉर्क, शिकागो, सैन फ़्रांसिस्को, ह्यूस्टन, अटलांटा तथा सिएटल के वाणिज्य दूतावास पहले से करने में सक्षम हैं; साथ में शिक्षा मंत्रालय का अंतरराष्ट्रीय सहयोग विभाग। तीस दिन वाली बात, संस्थान बदलने पर रोक और ओपीटी की छह महीने की छूट — बस इन तीन बातों की एक सलाह 15 सितंबर से पहले निकल जाए, तो वह किसी भी बहस से ज़्यादा घरों तक पहुँचेगी। दूसरा काम इससे भी छोटा है : यह पता किया जाए कि संस्थान बदलने पर लगी रोक के बारे में भारत की ओर से कोई बात रखी गई या नहीं। पढ़ाई के हिसाब से यही प्रावधान सबसे कमज़ोर है, और यही वह बात है जो हमारा दूतावास सबसे अच्छे ढंग से उठा सकता है।













